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Saturday, December 26, 2009

प्लास्टिक कचरे का बढ़ता खतरा


महानगरीय जीवन की विभीषिकाओं की चर्चा हो तो प्रदूषण का नंबर पहला होगा। देश के हर शहर की हालत एक सी है, हवा में फैला धुंध धुआं, शोर, नालों में तब्दील होती नदियां, प्लास्टिक थैलों और पाउचों से पटे कूड़ेदान और जलती आंखें, बढ़ती बीमारियों  से हाल-बेहाल नागरिक। वायु प्रदूषण को निलंबित करने के लिए सरकारें तरह तरह के परिवहन नियम कानून, प्रदूषण नियंत्रण विधियां अपना रही हैं तो जल प्रदूषण के लिए गंगा एक्शन प्लान जैसे कार्यक्रम है। पर शहरों में पालीथीन के बढ़ते प्रचलन पर नियंत्रण के सारे उपाय अब तक विफल हो रहे हैं।


महानगरों से निकलने वाले कूड़े में गंदगी के अलावा भारी तादाद में कागज, कपड़ा तथा प्लास्टिक आदि होता है। खासतौर से सामान की पैकिंग में उपयोग आने वाली प्लास्टिक कूड़े में मुख्य रूप से पायी जाती है। करीब 10 वर्ष पहले शहर में जो कूड़ा निकलता था, उसमें पालीथीन बैग की मात्रा आधा प्रतिशत से भी कम होती थी। लेकिन इन वर्षों में कूड़ा करकट में अप्रत्याशित रूप से पालीथीन बैग की मात्रा बढ़ी है और कुल कूड़े कचरे में इसकी मात्रा करीब 60 प्रतिशत होती है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक कूड़े में करीब 60 प्रतिशत पालीथीन बैग तथा 5 प्रतिशत शीशे के टुकड़े और अन्य सामान होता है। इसमें पालीथीन बैग निस्तारण एक गंभीर समस्या बन चुकी है क्योंकि यह किसी भी हालत में नष्ट नहीं होते हैं। कूड़ा करकट निकलने वाले काफी पदार्थ तो अपने आप नष्ट हो जाते हैं। कुछ खाद के रूप में प्रयोग कर लिया जाता है। सिर्फ पोलीथीन ही ऐसी चीज है जो न तो नष्ट होती है, न इसका सड़ना गलना संभव है और इसको जलाया भी नहीं जा सकता है। क्योंकि जलाये जाने परयह विषाक्त गैस पैदा करता है।


प्लास्टिक में मुख्य रूप से जो रसायन होते हैं, उनमें पाली एथीलीन अर्थात पालीथीन होती है जो एथिलीन गैस बनाती है। पालीथीन में पालीयूरोथेन नामक रसायन पाया जाता है। इसके अतिरिक्त पालीविनायल क्लोराइड (पीवीसी) भी पाया जाता है। प्लास्टिक अथवा पालीथीन में पाये जाने वाले इन रसायनों को किसी भी प्रकार से नष्ट नहीं किया जा सकता है। प्लास्टिक अथवा पालीथीन को जमीन में दबाने, आग में जलाने और पानी में बहाने से रसायन को प्रभाव समाप्त नहीं होता है। प्लास्टिक को जलाने से रसायन के तत्व वायुमंडल में घुलकर उसे प्रदूषित करते हैं। प्लास्टिक अथवा पालीथीन को जमीन के अंदर दबाने से गर्मी पाकर रसायन जहरीली गैस पैदा कर देते हैं। जमीन के अंदर गर्मी पाकर यह गैस विस्फोट भी कर सकती है।

पोलीस्टीरीन नामक प्लास्टिक को जलाने से क्लोरोफ्लोरो कार्बन बाहर आ जाते हैं जो ओजोन के जीवन रक्षक कवच को नष्ट कर देते हैं। ओजोन की जीवन रक्षक परत नष्ट होने से धरती पर प्रलयकारी स्थिति पैदा हो सकती है। इसीलिए संसार के अनेक देशों में प्लास्टिक कचरे को जलाने पर रोक लगा दी गयी है। पालीथीन नष्ट न होने की वजह से सफाई कार्य में काफी व्यवधान उत्पन्न होता है। सीवर चोक की जितनी घटनाएं होती हैं उनमें 70 प्रतिशत पोलीथीन बैग की वजह से होती है। मानव स्वास्थ्य के लिए भी इनका प्रयोग हानिकारक है। नगर के जिन क्षेत्रों में कूड़ा करकट डाला जाता है वहां का बहुत बड़ा भाग विषाक्त गैस के प्रभाव में रहता है। गर्मी के दिनों में प्लास्टिक पदार्थों की विषाक्तता बढ़ जाती है। इसीलिए ऐसे स्थानों से गुजरने वालों को दुर्गंध का सामना करना पड़ता है। ऐसे क्षेत्रों के पास किसी आबादी का रहना या कुछ घंटों तक लोगों का नियमित कार्यवष रहना भी जीवन के लिए काफी घातक होता है। इस प्रकार प्लास्टिक पदार्थों का उपयोग इसी प्रकार बढ़ता रहा और इसके निस्तारण की व्यवस्था नहीं हुई तो इसकी रासायनिक प्रक्रिया खतरनाक हो सकती है।


भारत में प्लास्टिक जमीन में गाड़ भी देते हैं। जमीन के अंदर गाड़ देना नष्ट करने का आदर्श  और उचित ढंग नहीं है क्योंकि एक तो जमीन भी कम है, दूसरे यह प्राकृतिक ढंग से अपघटित नहीं होता है। इसको अपघटित होने में 500 वर्ष लग जाते हैं। साथ ही मिटटी को प्रदूषित करती है और सतही जल को बेकार कर देती है। इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए ‘वेस्ट प्लास्टिक’ तकनीक का विकास किया जा रहा है। भारत में प्लास्टिक वेस्ट को पुनः उपयोग में लाने वालों के पास प्रतिदिन 1500 टन वेस्ट प्लास्टिक एकत्र होता है। इसका 75 प्रतिशत हिस्सा सस्ती चप्पलों के बनाने में काम आ जाता है।


प्लास्टिक के कचरे को पूर्णतया नष्ट नहीं किया जा सकता है। इसीलिए वैज्ञानिक कोशिश कर रहे हैं कि इसे कुछ तकनीकों से गलाकर फिर से उपयोग में लाया जा सके। यह क्रिया रिसाइक्लिंग कहलाती है। परंतु यह क्रिया कठिन भी है और इसमें धन भी बहुत व्यय होता है। इसके अतिरिक्त इस क्रिया से प्रदूषण भी बढ़ता है। जर्मनी के पर्यावरण वैज्ञानिक के अनुसार यदि 50000 पोलीथीन बैग्स तैयार किये जाते हैं तो 17 किलो सल्फर डाईआक्साइड गैस वायुमंडल में घुल जाता है। इसके अतिरिक्त मोनो आक्साइड, नाइट्रोजन और हाइड्रोकार्बन्स का वायु में रिसाव होता है और पानी में कुछ जहरीले पदार्थ भी आकर मिलते हैं। इसी प्रकार जब फाइबर बनाये जाते हैं तो कम से कम उसमें 13 किलो नाइट्रोजन आक्साइड और 12 किलो सल्फर डाइआक्साइड निकलकर वायुमंडल में मिलती है। गैसों के पेड़ पौधों एवं फसलों को नुकसान पहुंचता है। उनकी बाढ़ प्राकृतिक तरीके से नहीं हो पाती है। इस प्रकार प्लास्टिक के द्वारा पर्यावरण भी प्रभावित होता है।


पर्यटन स्थलों व पहाड़ियों पर पर्यटक लोग विभिन्न प्रकार के सामान से भरकर प्लास्टिक की थैलियां ले जाते हैं। वे सामान को समाप्त करने के उपरांत थैलियों को ऐसे ही फेंक देते हैं। पहाड़ों पर स्थित सभी पर्यटन स्थलों पर बुरी तरह यह समस्या बनी हुई है क्योंकि फेंक  देने के उपरांत भी वे ऐसे ही बने रहते हैं और हवा में उड़ती रहती हैं। इनको कबाड़ी व मैला इकटठा करने वाले भी हेय दृष्टि से देखते हैं। रद्दी समेटने वाले बच्चे भी इसे नहीं उठाते। इनको पुनः ढालकर किसी अन्य काम में नहीं लिया जा सकता क्योंकि प्लास्टिक की थैलियां घटिया क्वालिटी के प्लास्टिक से तैयार की जाती हैं। ये प्लास्टिक चूरे के पांचवे ग्रेड से निर्मित की जाती हैं। इसीलिए इनका पुनः उपयोग नहीं हो सकता। ये टाक्सिक पदार्थ से तैयार होती है। यह जल को प्रदूषित कर देता है और इससे पेट की बीमारियां फैल जाने के खतरे भी हैं। यह पाली विन्याल क्लोराइड से बनता है जो कालान्तर में विष फैलाता है।

सामान्यतः घरों में थैलियां उड़ती नजर आती हैं। दिल्ली में पांच सितारा होटल, तीन सितारा होटल एवं सामान्य रेस्तरां से क्रमश: 800, 600, 200 किलोग्राम प्लास्टिक की थैलियां प्रतिदिन निकलती हैं। अमेरिकी स्वायत्त शासन  संस्थानों ने प्लास्टिक की थैलियों को नष्ट करने हेतु विभिन्न वैज्ञानिकों तथा व्यापारिक संस्थानों से टेण्डर आमंत्रित किए। लेकिन  आश्चर्य तो उस वक्त हुआ कि किसी वैज्ञानिक तथा व्यापारिक संस्थान ने इसके लिए किसी भी प्रकार की प्रौद्योगिकी एवं रसायन विकसित नहीं किया है, जिससे उन्हें नष्ट किया जा सके। निरन्तर प्रयत्नशील रहने के उपरांत भी प्लास्टिक को नष्ट करने की प्रविधि हासिल करने में वैज्ञानिक सफल नहीं हुए हैं। भारत में हिमाचल प्रदेश एकमात्र प्रांत है जिसने अपनी राजधानी शिमला में प्लास्टिक की थैलियों पर प्रतिबंध लगाया है। ठीक इसी प्रकार केन्द्र व राज्यों की सरकारों को पतली प्लास्टिक की थैलियों के उपयोग पर कानूनी रूप से प्रतिबंध लगा देना चाहिए, जिससे स्वास्थ्य एवं पर्यावरण पर दुष्प्रभाव न पड़े।

प्लास्टिक की थैलियों को पाबन्द करने हेतु देश के विभिन्न भागों में चेतना जाग्रत हो रही है। यह सड़ने व गलने पर नष्ट नहीं होता। यह पर्यावरण को अत्यधिक नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ पशुधन द्वारा गलियों में अज्ञानतावश  निगल लिए जाने से पशुओं के गंभीर जानलेवा बीमारियों से ग्रसित होने के तथ्य एवं सत्य प्रकाश में आ रहे हैं। सन 2000 में लखनऊ शहर में ऐसे कई मामले प्रकाष में आए। स्थानीय जानकीपुरम में स्थित गो सदन में कई गायों के पेट का आपरेशन कर आठ से दस किलो तक प्लास्टिक का कचरा निकाला गया। कस्बों,  शहरों एवं महानगरों के नाले प्लास्टिक के कारण अवरूद्व होने से प्रदूषण फैल रहा है। नदियां, तालाब व झीलें, प्रदूषित होने के सबसे बड़े कारणों में यह प्लास्टिक भी है। खासतौर पर रंगीन पालीथीन तथा कैरीबैग को प्रयोग में लाने व सार्वजनिक स्थलों पर फेंक देने के घटना बहुत ही गंभीर समस्या है। सफेद कैरीबैग व थैलियां जिनमें दूध या अन्य खाने का सामान, मिष्ठान भण्डार वाले पैकिंग के रूप में उपयोग में लाते हैं, वे अपेक्षाकृत कम नुकसान दायक होती हैं। सफेद प्लास्टिक की थैलियां सबसे सुधरा हुआ रूप् है। इसके विपरित रंगीन पालीथीन बैग सबसे निकृष्ट श्रेणी का होता है। रंगीन प्लास्टिक की थैलियों के निर्माण में काम में लिए जाने वाले केमिकल मानव ष्षरीर में कैंसर जैसे भयंकर रोग उत्पन्न कर सकते हैं। यदि हलवाई गर्म मिठाइयों अथवा गर्म खाद्यान्न वस्तुओं को रंगीन प्लास्टिक की थैली में पैक करके ग्राहक को देते हैं तो क्रय करने वाले उक्त वस्तुओं के उपयोग से दस्त जैसी व्याधियों से ग्रसित होकर निर्जल डिहाइड्रेशन बीमारी की चपेट में आ सकते हैं। इंसान तो क्या, रंगीन प्लास्टिक की थैलियां वर्षा के पानी के साथ बहकर भूमि की उर्वरा शक्ति को कम कर देने में सक्षम हैं। मृदा प्रदूषण के अन्य कारकों में पालीथीन की थैलियां भी बहुत हानिकारक भूमिका अदा करती हैं।


आज देश के विभिन्न भागों में प्लास्टिक कचरे के दुष्प्रभावों के प्रति नागरिक जाग्रत होकर इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने हेतु आन्दोलनरत हैं। भारत में केन्द्रीय सरकार ने रिसाइक्लड, प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर एण्ड यूसेज रूल्स के अन्तर्गत 1999 में 20 माइक्रोन से कम मोटाई के रंगयुक्त प्लास्टिक बैग के प्रयोग तथा विनिर्माण पर प्रतिबंध लगाया गया है। दुर्भाग्यवश ये प्रतिबंध केवल कागजों पर ही रह गया है क्योंकि प्रत्येक बैग की मोटाई की जांच करने के लिए अब संरचना पूरी तरह से अपर्याप्त है। परिणाम यह है कि विभिन्न राज्यों द्वारा छः माह की कड़ी सजा के प्रावधान किये जाने, उद्योगों की बिजली काट दिये जाने, और पालन न किये जाने की स्थिति में प्रतिष्ठान को बंद किये जाने जैसे प्रावधानों के होने के बावजूद, महीन प्लास्टिक बैग अभी भी परिचालन में है। नियमों को प्रभावी रूप् से लागू करने के लिए कुछ बिंदुओं पर ध्यान दिए जाने की महती आवष्यकता है यथा रिसाइक्लड प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर एण्ड यूसेज रूल्स में संषोधन किया जाना। उद्योगों के लिए उचित पैकेजिंग नीति तथा पैकेजिंग दिषा निर्देष जारी किये जाए तथा पुनः खरीद विकल्प को लागू किया जाना चाहिए जिसमें उद्योगों के लिए पीईटी बोतलों तथा पाली बैगस को खरीदना अनिवार्य किया तथा उनका पुनः उपयोग किया जाए। हालांकि प्लास्टिक उद्योग उचित एनटीलिटरिंग उपाय की सिफारिष की गई है लेकिन सम्पूर्ण प्लास्टिक कचरा प्रबंध नही इस समस्या का सर्वोत्तम विकल्प है।


परम्परागत काम में लिए जाने वाले कागज, कपड़े और जूट की थैलियों को पुनः शुरू कर देना चाहिए। यदि हमें प्लास्टिक की थैलियों से ही प्रेम हो गया है तो हमे जैविक प्लास्टिक का उपयोग करना चाहिए। देश में केन्द्रीय कंदमूल शोध संस्थान द्वारा केरल के टोपियोका केंद के स्टार्च पर आधारित प्लास्टिक का प्रयोग करने से वातावरण में दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी कड़ी में सेन्ट्रल ट्यूबर क्राप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट, त्रिवेन्द्रम द्वार स्वदेशी रूप से विकसित जैविक रूप से नष्ट होने वाले प्लास्टिक का भी विकास किया गया है लेकिन ऐसा संशोधित प्लास्टिक काफी मंहगा होता है। लेकिन इसका उपयोग किए जाने से पर्यावरणीय एवं स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रभावों से निजात मिल सकती है। विश्वभर में अनेक संगठन जो कि प्लास्टिक के प्रयोग के विरूद्व लड़ाई लड़ रहे हैं तथा उनमें से अनेक पेपर बैग्स बनाने तथा पारिस्थितिकी अनुकूल प्रतिस्थापकों को तैयार करने के लिए स्वयं सेवकों को प्रशिक्षण दे रहे हैं।

Tuesday, December 08, 2009

पर्यावरण बचाने के नाम पर हो-हल्ला ही ज्यादा

पर्यावरण संरक्षण वर्तमान में चर्चा का सबसे प्रिय विषय है। पर्यावरण प्रदूषण व संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण, कचरा प्रबन्धन व वृक्षारोपण ‘फैशन‘ का हिस्सा है। हाई प्रोफाइल पार्टियो, मीटिंगों से लेकर कालेज, यूनिवर्सिटी में पर्यावरण की चर्चा करना ‘स्टेटस सिम्बल‘ है। वहीं इन विषयों पर चर्चा करना जागरूक होने का आभास भी कराता है। लेकिन सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर पर्यावरण बचाने के नाम पर जो हो-हल्ला मचाया जा रहा है अगर उसका अंश मात्र काम भी जमीन पर कर लिया गया होता तो तस्वीर कुछ दूसरी ही होती। हकीकत यह है कि पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण व कचरा प्रबन्धन के लिए 200 से अधिक कानून होने व हर वर्ष करोड़ों खर्चे करने के बावजूद भी पर्यावरण प्रदूषण की समस्या दिनों-दिन गहराती जा रही है। बिडम्बना यह है कि जो जमात पर्यावरण संरक्षण, कचरा प्रबंधन की बातें करती है वही जमात विकास की दुहाई देकर पर्यावरण तहस-नहस करने में जरा भी हिचकते नहीं हैं। सामाजिक संस्थाएं, कार्यकर्ता या आम जनता चाहे जितना चिल्लाती रहे सरकार व सरकारी मशीनरी निजी स्वार्थो, और तुच्छ लाभों के लिए पर्यावरण से जुड़े विभिन्न गंभीर मुद्दों की अनदेखी कर देते है परिणामस्वरूप पर्यावरण, वन, नदियां, भूमिगत जल स्त्रोत, वायु, भूमि व ध्वनि प्रदूषण बढ़ रहा है।

पर्यावरण प्रदूषण ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत का क्षरण, ग्रीन गैसों का प्रभाव कचरा प्रबंधन पर समय-समय पर खबरें व विशेषज्ञ कमेटियों की रिपोर्ट प्रकाशित होती रहती हैं। पर्यावरण प्रदूषण के वर्तमान आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो यह स्पष्ट है कि हमारे आज से ज्यादा खतरनाक हमारा आने वाला कल होगा। जिस तेजी से धरती के तापमान में बढ़ोत्तरी हो रही है, मौसम चक्र गड़बड़ाता जा रहा है। नदियों का जलस्तर कम हो रहा है, ग्लेशियर  पिघलते जा रहे है, नदियों जहरीले नालों का रूप धारण कर रही है, पीने के पानी के लिए देश में हाहाकार मचा हुआ है कचरे के ढेर लगातार बढ़ रहे है, प्लास्टिक का प्रयोग बंद नहीं हो रहा है असलियत यह है कि सब कुछ ठीक नहीं है और असलियत भी शायद यही है।

नदियो की बात की जाए तो राष्ट्रीय नदी गंगा अत्यधिक प्रदूषण का शिकार है। पतित पावनी गंगा में रोजाना लाखो टन कचरा बिना किसी शोधन के सीधे धकेल दिया जाता है। देश में हाइड्रोपावर प्रोजेक्टों की आई बाढ़ के कारण गंगा सुरंगों में कैद हो रही है। नदी का जल इतना प्रदूषित हो चुका है कि ऋषिकेश व हरिद्वार को छोड़कर अन्य किसी स्थान पर गंगा में स्नान या आचमन करना जोखिम का काम है। गंगा की भांति यमुना, गोदावरी, गोमती, वरूणा, महानंदा आदि सैकड़ो छोटी-बड़ी नदियां प्रदूषण के कारण जहरीली‘ हो चुकी हैं। बढ़ता औद्योगीकरण व शहरीकरण कोढ़ में खाज का काम कर रहा है। देश में कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रफल दिनोदिन कम हो रहा है। फसलों में यूरिया, डीएवी व कीटनाशकों के लगातार बढ़ते प्रयोग से भूमि प्रदूषण बढ़ रहा है व भूमि की ऊर्वरा शक्ति भी क्षीण हो रही है। यह जहरीले रसायन भूमि बंजर तो बना ही रहे हैं वहीं इन की वजह से पक्षियो व तमाम अन्य वनस्पतियों के अस्तित्व भी संकट में पड़ गया है।

खुली औद्योगिक नीति से प्रदूषण का स्तर और धरती के तापमान में दिनों दिन बढ़ौतरी हो रही है। उद्योगों को बढ़ावा देने की खुली व मुक्त नीति के चलते उत्तरांचल राज्य में पिछले पांच सालों में प्रदूषण के स्तर में बेहिसाब बढ़ोत्तरी हुई है। हरिद्वार, पंतनगर, उधमसिंह नगर आदि जिलों में तमाम कंपनियों ने अपने छोटे बड़े प्लांट स्थापित किए हैं। सबसे बुरी हालत हरिद्वार जिले की है। शांत, सुरम्य व साफ-सुथरी धर्मनगरी आने वाले समय में उद्योग नगरी के नाम से जानी जाएगी। उद्योगों की स्थापना से शहर में जनसंख्या में भी काफी वृद्वि हुई है। परिणामस्वरूप बुनियादी सुविधाएं व अन्य व्यवस्थाएं चरमरा गई है। परिणामस्वरूप धर्मनगरी के बाशिंदों को पानी व बिजली की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। वहीं शहर में हवा, भूमि, जल प्रदूषण की मात्रा में रिकार्ड बढोत्तरी दर्ज की गई है। चमड़े व शराब की फैक्टरियों ने ही कानपुर में गंगा को इतना जहरीला कर दिया है कि गंगा पर बने जाजमऊ पुल से गुजरने वाले यात्री नाक पर रूमाल रखकर ही गुजरते हैं। उत्तरांचल की भांति देवताओं की भूमि हिमाचल प्रदेश का बद्दी जिला भी उद्योगों के भारी दबाव के कारण बर्बादी की कगार पर पहुच चुका है। कारखानों की चिमनियों से निकलने वाले धुएं ने बद्दी के प्राकृतिक सौन्दर्य व वातावरण को तहस नहीस कर दिया है। बददी में प्रदूषण के आंकड़े मानकों से कई गुणा अधिक दर्ज किए गए हैं। हरियाणा से सटे हिमाचल के सिरमौर जिले के काला अम्ब औद्योगिक क्षेत्र में बोन चाइना के बर्तनों व कागज के कारखाने के चलते मारकण्डा अन्य बरसाती नदियों को पानी काला व जहरीला हो चुका है। इन नदियों का पानी इतना बदबूदार है कि कई किलोमीटर पहले ही उसे महसूस किया जा सकता है। यमुना नदी के किनारे बसा हरियाणा राज्य का छोटा सा जिला यमुना नगर उ़द्योगों के लिए देश भर में जाना जाता है। स्टील, कागज, शराब व चीनी के कारखानों ने शहर की आबोहवा में जहर भहर दिया है। रही सही कसर अभी हाल ही में लगे थर्मल पावर प्लान्ट ने पूरी कर दी है। शहर में प्रवेश करते ही आपको इसका आभास हो जाएगा। थर्मल पावर प्लान्ट की चिमनियों से निकलने वाली राख ने सारे शहर पर काले रंग की चादर सी तान दी है। हवा में उड़ रही राख के कारण आसपास के इलाकों में सांस व आंख के रोगों में बढ़ी तेजी से इजाफा हुआ है।


मानाकि देश की आबादी व जरूरतों के हिसाब से उद्योग अनिवार्य हैं। उद्योग धंधे लगाना कोई बुरी बात भी नहीं है। यह खुला तथ्य है कि औद्योगिक विकास और पर्यावरण सुरक्षा में बिल्कुल उलटा संबंध है। आज शयद एक कोई ऐसा आधुनिक उद्योग हो जो पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाला न हो। इसलिए कोई उद्यमी यह गांरटी नहीं ले सकता कि उसके उद्योग से पर्यावरण को क्षति नहीं पहुचेंगी। इसलिये किसी नये उद्योग की स्थापना में केवल यह देखा जाता है कि इससे पर्यावरण को कम से कम से नुकसान हो। लेकिन इसका फार्मूला तय करना भी कठिन है। फिर भी यदि केंद्र और राज्य सरकार ईमानदारी से चाहे तो इस प्रक्रिया को और सरल और पारदर्शी बनाया जा सकता है और पर्यावरण का नष्ट करने से बचाया जा सकता है।

प्रदूषण नियंत्रण के लिए जिम्मेदार सरकारी व गैर सरकारी एजेंसिया कागजी कार्रवाई में अधिक विश्वास करती हैं। विकास की दुहाई देकर कहीं नदियो का बहाव रोक दिया जाता है, तो कहीं हरे भरे वृक्षों का सफाया कर दिया जाता है अपवाद स्वरूप कुछ   ऐजेंसियों संस्थाओं को किनारे रख दिया जाए तो पर्यावरण के नाम पर फर्जी संस्थाएं व संगठन लाखो करोड़ो हर साल डकार जाते है। प्रदूषण जैसी बड़ी समस्या को महज पौधारोपण, पेन्टिग प्रतियोगिता या पैदल मार्च कर निपटाने की कोशिशे ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही हैं। सरकारी मशीनरी असलियत से बखूबी वाकिफ है, लेकिन जिम्मेदारियों से भागने की प्रवृत्ति के चलते जानबूझकर आंखें बंद किए रहती है। ज्यादा हुआ तो किसी कारण स्टार होटल के एसी हाल या रूम में बैठकर ग्लोबल वार्मिंग पर चर्चा कर ली जाती है। देश की नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए समय-समय पर आंदोलन, अनशन या फिर मोटी-मोटी रिपोर्ट प्रकाशित की जाती है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। देश में नदी प्रदूषण लगातार गंभीर हो रहा है और सरकार गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करके ही झूठी वाहवाही लूट रही है।

पर्यावरण संरक्षण व प्रदूषण की रोकथाम के लिए हमारे पास कानून व नियम तो हैं लेकिन उनकी सख्ती से लागू करने की इच्छा शक्ति का सर्वथा अभाव है। सरकार व पर्यावरण से जुड़ी संस्थाओं, गैर सरकारी संगठनों व पर्यावरणविदों को देश भर में जनजागरण अभियान चलाकर आम आदमी को पर्यावरण से जुड़े मसलों में प्रति जागरूक करना होगा क्योंकि जब तक जनता जागरूक नहीं होगी तब तक सारे उपाय निष्फल व निरर्थक ही होंगे। वहीं सरकारी मशीनरी के पेंच कसना भी निहायत जरूरी है, अगर समय रहते प्रदूषण की रोकथाम के लिए प्रभावी व कारगर कदम नहीं उठाए गए तो बढ़ते प्रदूषण का कहर हमें और आने वाली पीढ़ियों को निगल जाएगा।

Friday, November 27, 2009

जहरीली होती नदियां

जहरीली होती नदियां

पर्यावरण प्रदूषण आज पूरे विशव  के समक्ष सबसे बड़ी समस्या बन कर उभरा है। परमाणु खतरे से भी बड़ा व भयानक खतरा पर्यावरण प्रदूषण का है। जल, वायु, पृथ्वी सभी बड़ी तेजी से प्रदूषण की चपेट में आ रहे हैं। प्रदूषण की सबसे बड़ी मार हमारे जल स्त्रोतों पर पड़ी है। जल प्रदूषण के कहर से असंख्य महामारिया उत्पन्न हो रही हैं। जल प्रदूषण का घातक प्रभाव पूरी मानव जाति पर दिखाई देने लगा है। बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण व नगरीकरण ने देष की लगभग हर छोटी बड़ी नदी को जहरीले व गंदे नाले के रूप में परिवर्तित कर दिया है सच्चाई यह है कि देश की जीवन धारा कहलाने वाली परम पवित्र नदियों का जल इतना अधिक प्रदूषित हो चुका है कि उनमें स्नान करना तो दूर उस जल से आचमन करना भी स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यन्त हानिकारक है। हालात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विकसित शोधन  प्रक्रियाओं के उपरांत भी जल का शुद्विकरण नहीं हो पा रहा है।

देश  की सबसे परम पवित्र नदी गंगा के बारे में अगर बात की जाए तो गंगा नदी की स्थिति भी बहुत नाजुक है। यह तो गोमुख से ही प्रदूषित होने लगी जोकि पर्यटन स्थल तथा पिकनिक केन्द्र के रूप में विकसित किया जा चुका है। वहां प्रदूषण नियन्त्रण की कोई व्यवस्था है ही नहीं। लोग वहां इधर-उधर मल-मूत्र त्यागते हैं, बोतलें, कागज, प्लास्टिक की थैलियां आदि कूड़ा-कचरा नदी में डाल देते हैं। गंगा में लगभग 15 करोड़ लीटर गंदा पानी प्रतिदिन गिरता है किन्तु जल-मल शोधन संयन्त्रों के द्वारा दस करोड़ लीटर पानी ही शोधित हो पाता है। इस शुद्विकरण के बाद भी पानी में बड़ी संख्या में आंत्र जीवाणु अभी भी देखे जा सकते है। इससे साफ है कि नदी का जल प्रदूषण बरकरार है।

हिन्दुओं में मान्यता है कि मृत्यु के उपरान्त शव को यदि गंगा के हवाले कर दिया जाय तो सीधा स्वर्ग मिलता है। इस धार्मिक विश्वास के अन्तर्गत हरिद्वार तथा वाराणसी (काशी) में प्रतिवर्ष करीब 50 हजार शवों को जलाया जाता है। दूर दराज के लोग भी यहां लाकर मृतकों का दाह संस्कार करते है। इन शवों को जलाने में 20 हजार टन लकड़ी और उससे बनने वाली राख करीब दो हजार टन होती है। यह भी गंगा जैसी पवित्र नदियों को अपवित्र (प्रदूषित) करने का प्रमुख कारण है। हिमालय की हिमाच्छादित चोटी से बंगाल की खाड़ी तक की यात्रा में स्वार्थी मानव ने गंगा को पूर्ण रूप से स्वच्छ (पवित्र) से पूर्ण रूप से मैली (अपवित्र) कर दिया है।

बनारस में  गंगा तट पर स्थित संकट मोचन निधि की प्रयोगशाला जो पूर्णतया सरकारी है, में प्रति सौ सी0सी0 पानी के आंत्र जीवाणुओं की संख्या 80 से 1 लाख 30 हजार के बीच पाई जाती है जो कि बड़ी से बड़ी महामारी फैलने की सूचक है जबकि सरकार बनारस और कानपुर में गंगा के साफ होने का दावा करती है। बनारस और कानपुर में औद्योगिक कचरा आज भी ज्यों का त्यों बहाया जाता है तो ऐसी स्थिति में गंगा साफ कैसे रह सकती है। गंगा तो अपने उद्गम स्थल से ही प्रदूषित होती हुई अपने किनारे बसे लगभग 115 नगरों की गन्दगी को लेकर चलती है। ऐसे में किसी क्षेत्र विशेष में गंगा को साफ कैसे रखा जा सकता है। यह केवल सरकार की नासमझी और उद्देश्यहीनता का नमूना है। साथ ही समाज में फैली निरक्षरता, अविद्या तथ अज्ञान एवं जनसंख्या विस्फोट ही इसके मुख्य कारण हैं।

राजधानी दिल्ली की जीवन धारा कही जाने वाली यमुना नदी के अस्तित्व पर संकट के घने बादल छाए हुए हैं। यमुनोत्री से निकलकर इलाहबाद (प्रयाग) तक की 1376 किलोमीटर की यात्रा में नदी जिस भी राज्य से होकर गुजरती है वहां लाखों  टन घरेलु व औद्योगिक कचरा उसके साथ बहा दिया जाता है। दिल्ली के सेंटर फॉर साइसं एंड इंवायरमेंट (सीएसई) ने पर्यावरण की स्थिति पर एक श्रृंखला प्रकाषित की है। दिल्ली के जल प्रदषण से संबंधित प्रकाशन होमिसाइड बाय पेस्टीसाइड में यमुना के जल प्रदूषण को लक्ष्य बनाया गया है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि हरियाणा के खेतों में प्रयोग में लाए जा रहे जहरीले कीटनाशक और रासायनिक उर्वरक एवं शहरों के घरेलु और औद्योगिक कचरे यमुना को दूषित कर रहे हैं।  पश्चमी यमुना नहर के दिल्ली पहुंचने तक हरियाणा के यमुनानगर, करनाल और पानीपत के अनेक उद्योगों के जहरीले कचरे की दोस्ती इस नगर के पानी के साथ हो जाती है। मसलन इस पानी में प्रतिदिन 8051 किलोग्राम सस्पेंडेड पदार्थ, 3288 बीओडी (बायोलोजिकल आक्सिजन डैमेज) 16245 सीओडी (केमिकल आकिस्जन डैमेज) की मात्रा मिलती रहती है जो पानी के उपभोगकत्र्ता के लिए घातक है।

यमुना दिल्ली की प्यास बुझाने का एकमात्र सबसे बड़ी स्त्रोत है। अनेक अध्ययनों से पता चलता है कि दिल्ली पहुंचते- पहुंचते यमुना जहरीली हो जाती है लेकिन हम फिर भी यमुना को नहीं छोड़ते। दिल्ली में वजीराबाद बांध से इंद्रप्रस्थ बांध तक लगभग 18 अधिकृत गंदे नाले यमुना में हर रोज दिल्ली के लोगों का मल और गंदा डाल रहे हैं। सीएसई के अध्ययन के अनुसार कोई 1800 मिलियन लीटर जहरीला गंदा पानी प्रतिदिन यमुना में बहाया जाता है। विडंबना यह कि दिल्ली के हिस्से में यमुना का केवल 2 प्रतिषत भाग ही रहता है। जबकि दिल्ली यमुना को 71 प्रतिशत गंदा पानी देकर सबसे ज्यादा प्रदूषित करती है। यमुना दिल्ली के 93045 छोटे बड़े उद्योगों के कचड़ों को झेलती है।

यमुना को सबसे ज्यादा पीड़ा दिल्ली की मलिन बस्तियां पहुंचा रही हैं। खासतौर से वे जो इसके किनारे बसी हैं। दिल्ली में यूं तो कोई छह लाख झुग्गियां हैं जिनमें 30 लाख लोग रहते हैं, पर इनमें से तीन लाख लोग ठीक यमुना के किनारे बसे हैं। ये अपनी घरेलु गंदगी सीधे यमुना को भेंट चढ़ा देते हैं। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रपट के अनुसार दिल्ली की 45 फीसदी घरेलु गंदगी बिना किसी उपचार के सीधे यमुना के हवाले कर दी जाती है।

उत्तर प्रदेष की राजधानी लखनऊ गोमती के किनारे बसी है। आदि गंगा कही जाने वाली गोमती भी प्रदूषण की मार को झेल रही है। पीलीभीत जनपद के माधोटाण्डा ग्राम के गोमत ताल से निकलकर लगभग 960 किमी प्रवाह के बाद गाजीपुर जिले के औडियार नामक गांव के पास गंगा नदी में मिल जाती है। अपने इस लम्बे प्रवाह के दौरान नदी षाहजहांपुर, सीतापुर, हरदोई, बाराबंकी, सुल्तानपुर, जौनपुर, होती हुयी प्रवाहित होती है। कथना, सरायन, सई एवं रेठ आदि इसकी सहायक नदियां है। गोमती नदी के जल का प्रयोग लगभग सभी प्रयोजनों हेतु किया जाता है जिसमें मुख्य रूप से पीने हेतु, सिंचाई हेतु, औद्योगिक प्रयोजनों हेतु तथा मत्स्य पालन आदि है।

उद्योगों का कचरा और घरेलु गंदा जल, प्रदूषण का मुख्य कारण है। खेतों से सिंचाई के बाद निकला पानी तथा भूमि का कटाव भी जल की आवशयकता और वास्तविक खपत में बहुत अंतर होता है। अनुमान है कि जितने जल का उपयोग किया जाता है उसके मात्र 20 प्रतिषत का ही खपत हो पाता है और षेष 80 प्रतिशत भाग सारा कचरा समेटे बाहर आ जाता है। इसे ही अपशिष्ट जल या मल-जल कहा जाता है और गोमती नदी में मिलकर उसे प्रदूषित करता है। देष की अन्य नदियों की तरह गोमती नदी में प्रदूषण का मुख्य कारण औद्योगिक निस्त्राव नहीं है। उद्योग धंधे तो केवल 20 प्रतिशत प्रदूषण के लिये जिम्मेदार हैं। षेष 80 प्रतिशत मल-जल और शहरी कचरे के कारण होता है। शहरी कचरे या मल जल में मुख्य रूप से कार्बनिक पदार्थ होते हैं जो पानी में मिलने पर आक्सीकृत होते हैं। इस आक्सीकरण क्रिया में आक्सीजन की बड़ी मात्रा में खपत होती है। चूंकि पानी में घुलित आक्सीजन की मात्रा सीमित होती है अतः पानी आक्सीजन विहीन हो जाता है तथा उसमें रहने वाले जीव जन्तुओं को जीना दूभर हो जाता है। मल-जल में कार्बनिक पदार्थों के अलावा सूक्ष्म जीव भी प्रचुर मात्रा में पाये जाते हें, जिनमें कुछ रोगाणु भी होते हैं। इन रोगाणुओं की उपस्थिति में यह पानी उपयोग लायक नहीं रह जाता है। कई बार लोग अनभिज्ञता के कारण ऐसे पानी का उपयोग कर लेते हैं एवं रोग ग्रस्त हो जाते हैं। कई बार तो यह महामारी का रूप भी ले लेता है। एक तरफ नदियों का अत्यधिक उपयोग दूसरी तरफ अनुपचारित मल-जल के निर्बाध गति से नदी में मिलने के कारण प्रदूषण की समस्या जटिल हो गयी है।

हरित क्रांति से कृषि उत्पादन तो बढ़ाया है परन्तु कृषि क्षेत्र में कीटनाशकों की तथा रासायनिक पदार्थों का उपयोग भी बढ़ा है। कीटनाशकों के अधिक व अनुचित प्रयोग के कारण भी जल प्रदूषित हो रहा है क्योंकि रासायनिक कारखानों का अविशष्ट नदियों में प्रवाहित कर नदियों को प्रदूषित किया जा रहा है। जल में क्रमशः रासायनिक प्रदूषण बढ़ रहा है। जल में डिटरजेन्ट, साल्वेन्ट, साइनाइड, हैवीमेटल, कार्बनिक रसायन, ब्लीचिंग पदार्थ, डाई तथा अनेक प्रकार के रसायन मिलते हैं जो स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक होते हैं। गंगा दुनिया की दस बड़ी और प्रमुख नदियों में से एक है। रिपोर्ट के अनुसार यह नदी कोई 50 करोड़ लोगों को पेयजल, खाद्य, वनस्पति और हराभरा वातावरण देती है सन् 2030 के बाद धीरे-धीरे इन सबका क्षय होने लगेगा। रिपोर्ट में व्यक्त की गई अंशकाओं पर यकीन करें तो आने वाले वर्षों में भारत को अन्न-जल के संकट से जूझने के लिए तैयार रहना चाहिए।

देश में नदी प्रदूषण की समस्या कोई नयी नहीं है और न ही यह बात सरकार अथवा जनसाधारण से छिपी है। नदी जल प्रदूषण निवारण के नाम पर अब तक कई योजनाएं बनी हैं, करोड़ों रूपये भी खर्च हो चुके हैं परन्तु नदियों का प्रदूषण अभी तक दूर नहीं किया जा सका है। गंगा, जमुना, गोमती, कावेरी, नर्मदा, चेलियार, साबरमती, हुगली, पेरियार, दामोदर आदि अधिकांश नदियां आज भी प्रदूषित हैं और प्रदूषण लगातार गहराता जा रहा है। पिछले दिनों इस सम्बन्ध में सामने आई वैज्ञानिको की रिपोर्ट देखकर यही लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब गंगा और यमुना की स्थिति आस्टेªलिया की हडसन नदी जैसी ही हो जाएगी जिसके दोनों किनारों पर वहां की सरकार ने बोर्ड लगाकर यह चेतावनी लिखी है कि ‘पानी जहरीला है, इसे न छुएं।’ उस पानी से बचने के लिए नदी के किनारों पर बाढ़ लगानी पड़ी है। हमारे यहां नदी जल प्रदूषण की भयावह स्थिति होने के बावजूद इसका कोई तत्काल समाधान नहीं दीख रहा है। इस मामले में सरकारी कार्य प्रणाली महज औपचारिकता ही दर्शाती है।


Thursday, November 26, 2009

कैसे मिलेगा जल

कैसे मिलेगा जल

63वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र के नाम अपने संबोधन को प्रधानमंत्री ने पूरी तरह देश  की समस्याओं के इर्द-गिर्द ही केन्द्रित रखा। प्रधानमंत्री ने पर्यावरण व उससे जुड़े अन्य मुद्दों पर अपनी चिंता जताई और देशवासियों से जल बचाने का आहवान किया। देश में जल स्त्रोतों के प्रदूषण और पीने के पानी की कमी पर प्रधानमंत्री की चिंता जायज भी है। सरकारी आंकड़ों की माने तो देष में ‘जल प्रदूषण संकट’ से जूझ रहा हैं। हालात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देश की आधी आबादी के पास पीने के लिए स्वच्छ जल नहीं है। नदियां प्रदूषण का शिकार हैं, भूमिगत जल के मीठे स्त्रोत प्रदूषित हो रहे हैं, जल स्तर तेजी से गिर रहा है। मौजूदा हालातों में यह समझ पाना मुशकिल है कि सरकार कैसे देशवासियो  को पीने व अन्य कार्यो के लिए जल उपलब्ध करवा पाएगी।

पृथ्वी का दो-तिहाई से भी अधिक भाग पानी से युक्त है जहां हिम पर्वत, सागर तथा महासागरों में अथाह जलराशी विद्यमान है लेकिन इस जलराशी का मात्र 2 प्रतिशत  अंश ही जीवनदायी है। षेष पानी खारा अथवा अन्य कारणों से उपयोगी नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार ‘‘ यदि विशव  के कुल जल को आधा गैलन मान लिया जाए तो उसमें शुद्ध एवं पेयजल मात्र आधा चम्मच के बराबर है तथा धरती की ऊपरी सतह पर महज बूंद भर पानी है, शेष  भूमिगत है।‘‘ केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार भारत में विभिन्न क्षेत्रों की जल आवश्कता 750 अरब घन मीटर है जो सन 2025 तक 1050 अरब घन मीटर हो जाएगी जबकि हमारे पास 500 अरब घन मीटर पानी उपलब्ध करवाने की क्षमता भी नहीं है। परिणामस्वरूप सिंचाई, घरेलू उपयोग तथा अन्य कार्यो के लिए निरन्तर पानी की किल्लत बनी रहती है। प्रति वर्ष की प्रचंड गर्मी से तपते भारतीय भू-भाग मे अपैल से जुलाई माह तक पानी की समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है। भारत में पानी का तीन चैथाई मानसून पर ही निर्भर है। वस्तुतः पानी की समस्या इसकी कमी, दुरूपयोग तथा कुप्रबंधन से जुड़ी हुई है। भारत में बढ़ती हुई जनसंख्या, सिंचाई क्षेत्र के विस्तार के साथ-साथ आम व्यक्ति एवं प्रषासनिक लापरवाहियों के कारण पानी की अनावश्वक तथा कृत्रिम किल्लत भी उत्पन्न हो जाती है। सन 1947 को भारत की जनसंख्या महज 36 करोड़ थी जो आज सवा अरब का आंकड़ा छू रही है। जनसंख्या में स्वतंत्रता के पश्चात  ढाई गुना से अधिक वृद्धि हुई है जबकि जलस्रोत यथावत है बल्कि कुछ क्षेत्रों में तो जल स्रोत घट गए है।

औद्योगिक इकाइयां वायु में तो धुएं का जहर घोलती ही हैं, उनके अपशिष्ट  जब पानी में बहा दिये जाते हैं तो पानी का भी शीलभंग  हो जाता है। नगरपालिका व नगरपरिषद क्षेत्रों का समूचा कूड़ा-करकट, गंदा पानी और कीचड़ भी अंततः नदियों के पानी में ही मिलता है। नदियां और अन्य जल प्रवाह धीरे-धीरे प्रदूषित होते चले जा रहे हैं। शहरों में औद्योगिक इकाइयों का कचरा, रासायनिक द्रव्य, पेस्टीसाइड्स, दूषित जल आदि भूमिगत नालियों के जरिए समीप की नदियो में बहा दिए जाते है। नदी के उस पानी को ज्यादातर शहरों मे शुद्ध करके पीने के पानी की आपूर्ति की जाती है। किन्तु चाहे इस पानी को कितना भी शुद्ध कर  पीने के उपयोग मे लाया जाए, फिर भी कुछ प्रतिशत तो वह प्रदूषित रह ही जाता है। ऐसे जल का उपयोग करने से अनेक रोग व बीमारियां होने लगती हैं। यहीं पानी खेती के काम में लिया जाता है तो फसलों को नुकसान होता है। नदियों में रहने वाले जीव-जन्तुओं के लिए भी यह दूषित पानी नुकसानदेह है। एक अनुमान के मुताबिक विभिन्न प्रकार की औद्योगिक इकाइयों द्वारा दामोदर घाटी में प्रतिदिन लगभग 50 बिलयन प्रदूषित कचरा प्रवाहित किया जाता है। जो घाटी को बहुत ज्यादा प्रभावित करता है। धार्मिक अंधविश्वास भी नदियों के प्रदूषण को बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण कारक हैं।

सरकार ने राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना 1995 में प्रारम्भ की, जिसमें केवल गंगा नदी ही नहीं बल्कि यमुना, दामोदर और गोमती प्रदूषण विमुक्त करने की व्यवस्था रखी गई है। लेकिन सरकारी बेरूखी, लाल फीताशाही, भ्रष्टाचार, व जनता की अज्ञानता की वजह से योजना प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाई। गंगा एक्षन प्लान और यमुना एक्शन  प्लान पर करोड़ों खर्च करने के बाद भी स्थिति यथावत है प्रतिदिन करोड़ों टन गंदगी, कूड़ा-करकट बिना किसी उपचार के इन नदियों में धकेल दिया जाता है। देष की लगभग सभी जीवनदायिनी नदियां गंदे, काले व जहरीले नालों में तब्दील हो रही है। इन नदियों के किनारे बसे गांव, नगर व महानगरों में जल के अन्य स्त्रोत भी दूषित हो रहे हैं। देश में अनियमित मानसून के कारण भूमिगत जल स्त्रोत सूख रहे हैं या फिर जल स्तर काफी नीचे होता जा रहा है। राजधानी दिल्ली हो या फिर मध्यप्रदेश का कोई मोहल्ला कमोबेश पूरे देश में एक से हालात हैं।

देष के उत्तर पश्चमी राज्यों में लगातार भूजल का स्तर गिरता जा रहा है। यह बात ‘नेचर’ पत्रिका ने अपने सर्वेक्षण के आधार पर कही है। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने उपग्रहों के जरिए किए गए अध्ययन में बताया है कि देष के उत्तर पश्चमी राज्यों में भूजल के स्तर में 4 सेमी0 प्रतिवर्ष की कमी आ रही है। इन क्षेत्रों में पंजाब और हरियाणा आते हैं जहां कभी हरित क्रांति हुई थी। वैसे हरित क्रांति के दौरान दलहनों को नजरअंदाज करना भी मौजूदा भूजल समस्या का बड़ी वजह है। यही हाल रहा तो भविष्य में पीने के पानी और खाद्यान्न का संकट गहरा जाएगा। केंद्र सरकार द्वारा 1970 और 1992 में लाए गए माडल ग्राउंड वाटर बिल का तब तक कोई मतलब नहीं निकलता जब तक उस पर अमल नहीं किया जाए।

भारत के शहरों का आकार बढ़ता जा रहा है। आज विश्व में शहरी आबादी की दृष्टि से भारत का चैथा स्थान है। अनुमान है कि आज बड़े शहरों में लगभग 35 करोड़ लोगों ने रहना शुरू कर दिया है। कहां से आएंगे इनके लिए आवास और परिवहन के इतने साधन ? कहां से ला पाएंगे हम प्रचुर मात्रा में पेयजल ? देश में छोटे-मोटे शहरों की संख्या 4,700 है। इनमें से केवल 2,500 कस्बों  एवं शहरों में पेयजल की सही व्यवस्था है। सन् 1947 में भारत में प्रति व्यक्ति सालाना पानी की उपलब्धता 6,000 घनमीटर थी। 1947 में घटकर यह 2,300 घनमीटर हो गई। अगर यही गति रही तो 2017 तक यह मात्रा प्रति व्यक्ति घटकर मात्र 1600 घनमीटर ही रह जाएगी। भू-गर्भ से लगातार पानी निकाले जाने के कारण देष के कई हिस्सों में परिस्थिकीय असंतुलन की स्थिति पैदा हो गई है। बढ़ते प्रदूषण ने नगरवासियो से शुद्ध वायु व जल छीनकर उन्हें नई-नई असाध्य बीमारियों की ओर धकेल दिया है।

परीक्षणों से पता चला है कि पिछले एक दषक में हर साल एक से पांच फुट तक जलस्तर नीचे की ओर खिसकता जा रहा है। भूमि में निरन्तर गिर रहे जल स्तर में वृद्वि के लिए केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड एक व्यापक योजना तैयार करने पर विचार कर रहा है। भूमि में लगातार गिर रहे जलस्तर का मुख्य कारण भूमि के अंदर के जल का अत्यधिक दोहन हे। शहरों में बन रही नयी नयी कालोनियों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में फैल रहे पम्पसेटों एवं नलकूपों के कारण भूमि के जल का दोहन बढ़ता जा रहा है जिससे जलस्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है। इससे ष्षहरी क्षेत्र तो प्रभावित होगा ही कृषि के लिए तो भयावह संकट उत्पन्न हो जायेगा। राष्ट्रीय भूमि जल अधिवेशन 2007 में जाने माने कृषि वैज्ञानिक और सांसद एम0एस0 स्वामीनाथन ने कहा कि भूजल हमारी 80 से 90 फीसदी पेयजल की जरूरत पूरी करता है। सिंचाई में उसका योगदान लगभग 70 फीसदी का है। तरह-तरह के प्रदूषण से भूजल की गुणवत्ता खराब हो रही है, यह भी हमारे लिए चिंता का विषय है। भूजल स्तर नीचे जा रहा है, क्योंकि उसका लगातार दोहन हो रहा है।

गौरतलब है कि देष के लगभग हर राज्य में शुद्ध पेयजल का संकट है। पहाड़ी और रेगिस्तानी इलाकों में तो जीवन और पानी के बीच संघर्ष सा चल रहा है। यहां लोगों को पानी के लिए मीलों भटकना पड़ता है। गर्मियों में हालात और भी खराब हो जाते हैं। देष के बहुत से राज्यों में पानी के बंटवारे को लेकर विवाद और तनातनी है। पानी के मामले में उत्तर प्रदेष की स्थिति सबसे बुरी है। विडम्बना यह है कि समस्या के समाधान के नाम पर हजारों, करोड़ों रूप्ये खर्च करने के बावजूद हालात जस के तस हैं, बल्कि और भी खराब हो गए हैं। ऐसा लगता है कि पेयजल संकट से छुटकारे के लिए बनी तमाम योजनाएं कागज पर ही षुरू और मुकम्मल होती रही है। वर्ना यह कैसे मुमकिन है कि हर योजना के बाद संकटग्रस्त बस्तियों की तादाद घटने के बजाए बढ़ती ही गयी है।

राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जल प्रदूषण से निपटने व जल स्त्रोतों को बचाने के लिए उल्लेखनीय कार्य किए गए हैं परन्तु अभी भी इनमें गत्यात्मकता लाना वांछित है। इतना होने के बावजूद भी जल प्रदूषण की समस्या दिन प्रतिदिन गम्भीर, जटिल और विशव्व्यापी होती जा रही है। यद्यपि विश्व के सभी देश जल प्रदूषण की समस्या के समाधान के लिए प्रयासरत हैं, फिर भी औद्योगिक विकास, नागरीकरण, वनों का विनाश और जनसंख्या में अतिशय वृद्वि होने के कारण यह समस्या निरन्तर गंभीर होती जा रही है। और अगर समय रहते संभला नहीं गया तो इस धरती पर तीसरा विशव्  युद्व जल व जल के अधिकार के लिए ही होगा।

Wednesday, November 25, 2009

जल ही जीवन है


आदमी तो आदमी.......जनाब अब तो जानवरों को भी पता चल चुका है कि.........पीने को शुद्ध जल नहीं बचा है। क्या करें प्यास तो बुझानी ही है.........चलो मिनरल वाटर से ही काम चलाया जाए..............

Tuesday, November 24, 2009

परियोजनाओं ने रोकी गंगा की गति

परियोजनाओं ने रोकी गंगा की गति

आज से लगभग 100 साल पहले अंग्रेजो ने हरिद्वार में बैराज बनाकर गंगा को बांधना चाहा था। लेकिन पंडित मदनमोहन मानवीय ने इस तर्क के साथ वहां डेरा जमा दिया कि बंधे हुए जल में हिन्दुओं के श्राद्ध और तर्पण नहीं हो सकते। भारी जनविरोध के कारण अंग्रेजो को वह योजना रद्द करनी पड़ी थी। मालवीय जी ने अपनी मृत्यु के समय अपने शिष्य  जस्टिस कैलाषनाथ काटजू से कहा था, ‘मुझे आशंका है कि मेरे बाद गंगा को फिर से बांधा जाएगा।‘ अंग्रेज तो वह साहस नही कर पाए, लेकिन मालवीय जी की आशंका  स्वतंत्र भारत में सही साबित हुई। जब देश  और प्रदेशो  में हमारी ही सरकारें थीं। गंगा के प्रति हिंदुओं की आस्था एक विषय है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गंगा पर सिर्फ हिंदुओं का ही एकाधिकार हो। वह हम सभी भारतवंषियों के लिए प्रेरक भी है और प्रेरणा भी। पुण्यसलिला गंगा की सतत प्रवाही पीयूषधारा भारतीय संस्कृति का प्रत्यक्ष आधार एवं जीवन्त प्रेरणा का अजस्त्र स्त्रोत रही हैं। लेकिन चंद स्वार्थो की पूर्ति के लिए आज गंगा का अमर प्रवाह रोका जा रहा है उसे सुरंगों में कैद किया जा रहा है। वह भी विकास के नाम पर।

ऊर्जा उत्पादन के लिए गंगा को गंगोत्री से उत्तरकाषी के बीच कई जगह सुरंगें से गुजारे जाने के विरोध में पर्यावरणविद जेडी अग्रवाल जोर-षोर से आवाजा उठा चुके हैं। टिहरी में भागीरथी पर बने एषिया के सबसे ऊंचे बांध के अलावा अब गंगोत्री से उत्तरकाषी तक गंगा और उसकी सहायक नदियों पर सात बांध बनाए जा रहे हैं। इसके अलावा देवप्रयाग से ऊपर 20 और बांध बनाए जा रहे हैं। योजना के मुताबिक इन परियोजनाओं में गंगा को 15 किलोमीटर से अधिक लंबी सुरंगों के आप्राकृतिक मार्ग से गुजरना होगा। उत्तराखण्ड सरकार ने कमरोली, (140 मेगावाट, जाड़गंगा, उत्तकाषी) गोहना ताल (60 मेगावाट, विरहीगंगा, चमोली) जाड़गंगा (जाड़गंगा, उत्तकाषी), मलेरी झेलम, (55 मेगावाट, धौलीगंगा, चमोली) झेलम तमक (60 मेगावाट, धौलीगंगा, चमोली) बोकांग बालिंग (330 मेगावाट, धौलीगंगा पिथौरागढ़) परियोजनाओं को विकास के लिए टिहरी जल विकास निगम को सौंपा है। उत्तराखंड की 14 नदी घाटियों में 230 सुरंग बांधों से नदी काा अस्तित्व ही संकट में है।

उत्तरकाशी  में गंगा को उसके उद्गम से ही सुरंगो में डालने की परियोजनाएं प्रस्तावित तथा निर्माणाधीन है। गंगोत्री से 14 किलोमीटर दूर ऊपरी क्षेत्र में चलने वाली पनबिजली परियोजनाओं से स्थानीय जल स्त्रोत सूख गए हैं। इससे गंगा के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो गया है। गंगा को रोककर सुरंगों में कैद किया जा रहा है। 90 मेगावाट वाली पाला मनेरी परियोजना के पहले चरण के लिए गंगा को मनेरी में 14 किलोमीटर लम्बी सुरंग में कैद कर दिया है। जबकि मनेरी परियोजना के कारण वह पहले ही पंद्रह किलोमीटर तक अपने स्वाभाविक पथ को छोड़कर सुरंग में बहने को अभिषप्त है। इसका द्वितीय चरण भी पूरा हो चुका है। भैरों घाटी से ऐसी सुरंग का सिलसिला षुरू होता है। 600 मेगावाट की लोहारी नागपाला व 480 मेगावाट की पाला मनेरी जल विद्युत परियोजना निर्माणधीन हैं। भैरोंघाट प्रथम व द्वितीय पर काम षुरू होने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। ऐसा लगता है कि इस पर्वतीय राज्य की पनबिजली परियोजनाओं से गंगा का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। पर्यावरण प्रेमियों की मांग है कि सरकार 90 मेगावाट वाली मनेरी भाली परियोजना के गेट खोल दे और लोहारी नागपाला व पालामनेरी परियोजनाओं का निर्माण रद्द करें। भैरोंघाटी और पाला मनेरी जलविद्युत योजनाओं को रोकने का आष्वासन सराकर ने प्रसिद्व पर्यावरणविद्व प्रो0 गुरूदास अग्रवाल को दिया था लेकिन सरकार ने वादाखिलाफी की और काम बदस्तूर जारी है।

बांध बनाने से जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। यहीं नहीं बांधों के कारण कई प्रकार की मछलियों का अस्तित्व भी संकटमय जो जता है जो अपने प्राकृत आवास से हजारों मील दूर जाकर प्रजनन करती हैं। उत्तराखंड में पाई जाने वाली महाषीर मछली भी इस समय संकटापन्न है। जिला मत्स्य अधिकारी ने बताया कि गंगा पर बांध बनने से रूके पानी से महषीर जैसी मछली की ब्रिडिंग व फीडिंग प्रभावित हो सकती है। उन्होंने बताया कि रूके पानी में प्रायः आक्सीजन की मात्रा कम होकर पानी का तापमान बढ़ जाता है। आस्ट्रिया के प्रसिद्ध जल विज्ञानी विक्टर षाबर्गर ने अपने प्रयोगों से यह सिद्ध कर दिखाया था कि पहाड़ों से टकराकर सर्पाकार गति से घूम-घूमकर बहने वाली नदी अपने को षुद्ध करती चलती है, लेकिन बांधे जाने से उसकी यह षक्ति समाप्त हो जाती है। गंगा से कई तरह की अप्राकृतिक छेड़छाड़ करके हमने असल में उसका अस्तित्व ही खतरे में डाल दिया है। प्रसिद्व ग्लशिएर विज्ञानी प्रो0 एम हसनैन करीब दस साल पहले ही कह चुके हैं कि तापनमान बढ़ने तथा पर्यटकों की अपार भीड़ के कारण गोमुख ग्लेषियर सिमट रहा है और यदि यही गति रही तो अगले 25 वर्ष में गंगा का मूल स्वरूप ही मिट जाएगा।

वैज्ञानिक अनुसंधानों से सिद्ध हो चुका है कि गंगा जल मे ऐसे प्राकृतिक तत्व मिश्रित होते हैं, जो उसे हमेषा षुद्ध बनाए रखते हैं। आप क्या सोचते हैं कि बांधो तथा सुरंगो में बांधे जाने के बाद भी गंगा जल का यह गुण विद्यमान रह पाएगा? नदियों के साथ हमारा यह जो दुव्र्यवहार है, असल में पष्चिमी सभ्यता की देन है। हमने बिजली पैदा करने के लिए पाष्चात्य ढांचे की नकल की। निस्संदेह, बिजली विज्ञान की एक श्रेष्ठ उपलब्धि है। लेकिन उसका उत्पादन निरापद भी होना चाहिए। नदियों को बांधने और तोड़ने-मरोड़ने के अतिरेक में पूर्व सोवियत संघ अपना एक समुद्र अराला सागर (अरब नहीं) ही सुखा चुका है। चीन ने भी अपनी पीली नदी का अब यह हश्र कर दिया है कि वह साल में तीन सौ दिन तक समुद्र का मुंह नहीं देख पाती। नदी की स्वाभाविक गति बांधों व सुरंगो में नहीं, बल्कि समुद्र में विसर्जित होने की है, ताकि वह बादलों के रूप में पुनर्जन्म लेकर फिर से धरती को ष्यामल और सजल बना सके। नदी से नहरें निकलना लोक मंगल का एक उपक्रम है, लेकिन समूची नदी को नहर में बदल देना अनिष्ट का द्योतक हैं। आखिर गंगा को मीलों तक सुरंग में डालकर हम उसे नहर में ही तो बदल रहे हैं।

देष के दूसरे क्षेत्रों में जो भी प्रमुख पनबिजली परियोजनाओं से सम्बन्धित जलाषयों का जलस्तर लगातार गिर रहा है। वर्तमान में देष में 4300 बड़े बंाध हैं। केन्द्रीय जलविद्युत् आयोग के अनुसार इस वर्ष गर्मी के मौसम में देष के 76 प्रमुख जलाषयों मे से अधिकांष में जलस्तर पिछले वर्ष की तुलना में कम है। अगले वर्ष इनमें और कमी की सम्भावना है। कम जलस्तर के कारण इन संयंत्रों में कुछ संयंत्र क्षमता से आधी या कहीं-कहीं इससे भी कम बिजली बना रहे है, उदाहरण के लिए, पंजाब में भाखड़ा जलाषय का निर्धारित जलस्तर 513 मीटर है। लेकिन इस समय इसका जलस्तर मात्र 436 मीटर ही है। फलतः जहां भांखड़ा संयंत्र से 2990 मिलियन यूनिट बिजली बननी चाहिए, वहां केवल 21.21 मिलियन यूनिट ही बिजली बन रही है, यही स्थिति देश की सभी जलविद्युत परियोजनाओं की है। ग्लोबल वार्मिंग से उपजी चुनौतियों ने जलविद्युत परियोजनाओं पर प्रष्नचिन्ह लगा दिया है, उत्तराखण्ड में हजारों करोड़ खर्च करके जो जलविद्युत परियोजनाएं लगाई जा रही हैं, वे कितने वर्षों तक बिजली पैदा कर पाएगी, यह किसी को नहीं पता, क्योंकि बहुत शीघ्र ही ऐसी स्थिति आ सकती है, जब इन परियोजनाओं को पानी नहीं मिल पाएगा। संयुक्त राष्ट्र संघ के एक नवीन अध्ययन के अनुसार अगले कुछ दषकों में हिमाचल क्षेत्र के सारे ग्लेषियर पिघल जाएंगे, जिससे सारी नदियां सूख जाएंगी, ऐसी स्थिति में, इन परियोजनाओं पर खर्च किए गए खरबों रूपए डूब जाएंगे, भारत में अधिकांष जलविद्युत परियोजनाएं हिमाचल क्षेत्र की नदियों पर ही बनाई जा रही है।

नदियों को बांधों में कैद करने के सवाल पर लंबे समय से बहस जारी है। दरअसल, विद्युत परियोजनाएं नेताओं, इंजीनियरों तथा अफसरों की एक चारागाह होती है। यह समय चेतने का है। देश के पूरे हिमालय क्षेत्र में अभी चार सौ से अधिक बांध, बैराज तथा सुरंगे प्रस्तावित हैं। विष्व के इस सबसे नए तथा नाजुक पर्वत को खोदना आत्मघाती होगा। उत्तराखण्ड को बांधो से पाटने की बजाय, उसे पेड़ों का कवच पहनाया जाना चाहिए, ताकि गंगा का प्रवाह संतुलित रहे। वहीं सरकार को पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा आदि अन्य विकल्पों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। विडम्बना तो यह है कि बांध के पुजारियों के गले यह वैज्ञानिक तथ्य नहीं उतरता कि भारत के बड़े बांध ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार हैं और पर्यावरण के लिए भीषण खतरा हैं। गंगा मात्र राष्ट्रीय नदी नहीं अपितु हमारी आस्था, निष्ठा एवं श्रद्वा का दिव्य प्रवाह हैं। और भारतीय संस्कृति का प्राण हैं। और इस प्राणधारा को बचाना हम सबका कर्तव्य है।

जब कचरे की लूट होगी

...........जब कचरे की लूट होगी
शीर्षक पढ़कर आपको लग रहा होगा कि क्या कहा व लिखा जा रहा है। और हकीकत भी यही है कि कचरे की लूट होगी इस बात को पचा पाना आज तारीख में कोई आसान बात नही है। लेकिन जिस तादाद में देष में कचरे के ढेर बढ़ते जा रहे हैं उसी के समांतार कचरे से निपटने के लिए भी उपाय भी सोचे जा रहे है। कचरा प्रबंधन वर्तमान में सबसे अधिक चिंता व शोध का विषय है। दुनिया भर के वैज्ञानिक, पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण प्रेमी कचरा प्रबंधन के विभिन्न उपाय ढूंढने में व्यस्त है। कचरा प्रबंधन की कोई सुदृढ़ योजना फिलहाल हमारे पास नहीं है अभी इस संबंध में हो रहे शोध भी अपने प्रांरभिक चरण में है। बाजार में उपलब्ध विदेशी  व देशी तकनीकों को अपना कुछ छोटे मोटे नुस्खे अमल में भी लाए जा रहे हैं। जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं जिससे भविष्य के लिए संभावनाएं जगती हैं। जिस तेजी इस दिशा में शोध  हो रहा है उससे तो ऐसा ही लगता है कि आने वाले समय में हमारे हाथों में कचरे के विशाल अंबार से निपटने का सालिड फार्मूला होगा। और जब हम कचरे को सही उपयोग करना सीख जाएंगे या हमें ये पता चल जाएगा कि हम जिस चीज को बेकार व कूड़ा समझ कर यूं ही फेंक  रहे है उसकी बाजार में कमर्शिअल वैल्यु है उस दिन हम घर से बाहर कचरा फेंकने से पहले एक बार जरूर सोचेंगे और अगर किसी को कचरे दे गए भी तो उसके बदले पैसा वसूलना नहीं भूलेंगे। आज ये बात मजाक लग सकती है लेकिन वो समय भी बहुत जल्द आने वाला है जब देष में सोने चांदी की जगह कचरे की लूट होगी और कचरे बहुमूल्य समझा जाएगा।

नोएडा स्थित ईकोवेस्ट मैनेजमेण्ट कम्पनी नोएडा में करीब 18 हजार घरों की गंदगी समेटती है। एकत्र किए गए कचरे को खाद में तब्दील करके उसे खुले बाजार में बेचकर कमाई करती है। घरों की गंदगी के अलावा अब उनके क्लाइंटस में कुछ व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को कूड़ा करकट भी षामिल हो गया है। ईकोवेस्ट के जनक व प्रबंध निदेषक मानिक थापर बताते हैं कि सेंटर स्टेज माल और हल्दीराम के अलावा हम कुछ छोटे छोटे रेस्टोरेंट का कूड़ा भी जमा करते हैं। कमर्षियल वेस्ट के अलावा जल्द ही हम बायो मेडिकल वेस्ट की तरफ जाएंगे। इस दिषा में असम में कुछ काम आगे बढ़ा है। लेकिन नोएडा में पिछले कुछ दिनों में उन घरों की तादाद कम हुई है जहां से ईकोवाइस वेस्ट कंपनी गार्बेज इकटठा करती थी। थापर इसकी एक दिलचस्प वजह बताते हैं, ‘लोगों ने कूड़ा उठाने के लिए हमसे ही पैसे मांगने षुरू कर दिए थे। इसलिए हमने कुछ घर छोड़ दिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि काम थम गया है। अब हमारी कमर्षियल लिस्ट बढ़ती जा रही है। विस्तार के नए मोर्चे खुल रहे हैं। थापर के काम से प्रभावित होकर दिल्ली के तत्कालीन उपराज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना ने उन्हें एमसीडी की साॅलिड वेस्ट मैनेजमेंट कमेटी का सलाहकार बनाया है। थापर के मुताबिक दिल्ली में गार्बेज मैनेजमंेट की खातिर कुछ प्रोजेक्ट पाइप लाइन में हैं जिन पर जल्द कुछ फाइनल होने वाला है। ईकोवेस्ट कंपनी आने वाले समय में आगरा, जयपुर और केरल में भी यही काम करने वाली है। ईकोवेस्ट के अलावा कुछ समाजसेवी संस्थाएं व अन्य कंपनिया भी कूड़े से खाद बनाने का काम नोएडा व आसपास के इलाकों मे कर रही है।

घरो में हमेषा बेकार समझे जाने वाले सब्जियों के छिलके व फल-पत्तियों का भी अब कारगर इस्तेमाल किया जा सकता है। इन अपषिष्ट पदार्थों से घरेलु गैस बनायी जा सकती है। इस दिषा में लखनऊ यूनिवेर्सिटी के अक्षय ऊर्जा पाठयक्रम की छात्रा ने शोध कर गतिषील बायोगैस संयंत्र बनाया है, जिसे कुछ समय बाद बाजार में उतारने की तैयारी चल रही है। पाठय्क्रम की समन्वयक डा0 ऊषा वाजपेयी के मुताबिक घरेलु अपषिष्ट को बाये गैस संयंत्र में डालने पर उसमें एनारोविक बैक्टीरिया उत्पन्न होते हैं। इससे मीथेन गैस का निर्माण होता हे। उन्होंने इस गैस के निर्माण में किसी भी तरह के नुकसान व दुर्गन्ध की आशंका  से इनकार किया है।

प्लास्टिक कचरा पर्यावरण को प्रदूषित करने में सबसे ज्यादा खतरनाक माना जाता है, किंतु चेन्नई स्थित तेलाम्मल इंजीनियरिंग कालेज के छात्रों ने कुछ विषिष्ट रासायनिक प्रक्रियाओं के बाद प्लास्टिक कचरे से पेट्रोल प्राप्त करने का दावा किया है। उनके अनुसार जब प्लास्टिक के कचरे को 400 डिग्री सेन्टीग्रेट तक गर्म किया जाता है तो आसवन द्वारा उससे कच्चा माल यानी तेल प्राप्त होता है। उसी प्रकार नागपुर में रायसीना इंजीनियरिंग कालेज के रसायन विभाग में चमत्कारी सफलता प्राप्त हुई है। यहां के प्रयोगकत्र्ताओं ने एक किलो प्लास्टिक कचरे से लगभग पौने लीटर पेट्रोल निकाल कर इंडियन आयल कारोपोरेषन के वैज्ञानिकों को सकते में डाल दिया। इसके लिए उन्होंने प्लास्टिक को कोयला और अब तक गुप्त रखे रासायनिक पदार्थ के साथ गर्म किया। इसी श्रृंखला में महाराष्ट्र सरकार और जड़गांवकर यूनिट, वेस्ट प्लास्टिक मैनजमेंट एण्ड रिसर्च कम्पनी द्वारा संयुक्त रूप से मुंबई और नागपुर में एक परियोजना की षुरूआत की गयी है जिसमें प्लास्टिक के कचरे से हाइड्रोकार्बन बनाया जायेगा।

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रीत्व काल में उत्तर प्रदेष की राजधानी लखनऊ में वर्ष 2003 मंे कचरे से बिजली बनाने का संयंत्र लगाया गया था। अपषिष्ट से विद्युत उत्पादन की इस परियोजना के अनुसार बूम (बिल्ड ओर आपरेट मेन्टेन) के आधार पर ठोस अपषिष्टों (कूड़े) से प्रतिदिन 5 मेगाावाट विद्युत उत्पादन व 135 टन बायोफर्टिलाइजर उत्पादित करने वाली इस परियोजना की स्थापना व संयंत्र संचालन के लिए नगर निगम ने एषिया बायो एनर्जी लिमिटेड से अनुबंध किया था लेकिन सरकारी कार्यावाहियों व प्रषासनिक फेर में पड़कर वाजपेयी जी की महत्वाकांक्षी योजना सफल नहीं हो पाई। अगर कूड़े से बिजली बनाने की योजना सफल हो जाती तो विद्युत उत्पादन एवं फर्टिलाइजलर से प्रतिवर्ष 60 लाख की आय होनी थी वहीं केन्द्र से भी प्रोत्साहन धनराषि के रूप में 75 लाख रूप्ये प्राप्त होते। एषिया बायोएनर्जी के योजना छोड़कर जाने के बाद अन्य निजी संस्थ आरसेल व मुम्बई की एक अन्य संस्था प्लांट टेक ओवर करने के लिए आगे आयी। नगर निगम से जैविक कूड़ा मुहैया न करा पाने पर उन्होंने भी इस योजना से अपने हाथ खींच लिये।

वर्तमान में लखनऊ व आगरा में कूड़े की समस्या से निजात पाने के लिए कम्पोस्ट खाद बनाने का कारखाना स्थापित किया जायेगा। षहरी विकास मंत्रालय ने लखनऊ व आगरा में ठोस अपषिष्ट प्रबंधन सालिड वेस्ट मैनेजमेंट के लिए तैयार की गयी 80.23 करोड़ की दो अलग अलग परियोजनाओं को स्वीकृति प्रदान कर दी है। लखनऊ के लिए 47.23 करोड़ रूपये व आगरा के लिए 33 करोड़ की परियोजना को मंजूरी मिली है। इसके तहत निजी कंपनी के कर्मचारी मोहल्ला एवं कालोनीवार कूड़ा एकत्र करेंगे और फिर उसे ढके हुए वाहनों के जरिये ले जायेंगे। गलियों से इकट्ठा होने वाले कूड़े को रखने के लिए भी दो तरह के बड़े कूड़ेदान चिन्हित स्थानों पर रख जायेंगे। जबकि गैर जैविक पदार्थों वाले कूड़े से निचली जमीन की पटाई की जायेगी। जवाहरलाल नेहरू नगरीय नवीकरण मिषन के तहत उक्त परियोजना मंजूर की गयी है। इसके मुताबिक कूड़ा उठाने से लेकर उसे निर्धारित स्थान पर ले जाने का काम चूंकि गैर सरकारी संस्था को सौंपा जा रहा है। इसलिए परियोजना के मुताबिक प्रत्येक गृह स्वामी की आय के हिसाब से पांच रूप्ये से लेकर पचास रूप्ये तक मासिक षुल्क वसूल किया जायेगा। लखनऊ में कम्पोस्ट बनाने का कारखाना हरदोई रोड पर बायोइनर्जी प्लांट के पास तथा आगरा में यह षाहदरा के नजदीक उपलब्ध जमीन पर स्थापित किया जायेगा। कूड़ा डम्पिंग ग्राउण्ड के लिए लखनऊ नगर निगम ने हरदोई रोड स्थित बरावनकलां गांव में 121 एकड़ जमीन को चिन्हित किया है।

गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्त्रोत मंत्रालय देष में कूड़े-कचरे से ऊर्जा उत्पादन परियोजनाओं को बढ़ावा दे रहा है। यह मंत्रालय प्रदर्षनियां लगाकर लोगों को जैव पदार्थों से ज्यादा से ज्यादा मात्रा में मीथेन बनाने की प्रक्रिया दिखाता है। इन प्रदर्षनियों का एक अन्य उद्देष्य विभिन्न प्रकार के कूड़े कचरे से ऊर्जा बनाने के लिए विविध प्रौद्योगिकियों का भी प्रदर्षन करना है जिससे बिजली का उत्पादन हो सके। पंजाब मंे लुधियाना के पास हीबोवाल स्थित कूड़े कचरे से ऊर्जा उत्पादन संयंत्र एक ऐसा ही प्रयोग है। वहंा पषुओं के गोबर से एक मेगावाट बिजली और जैविक खाद तैयार होता है। मंत्रालय द्वारा स्थापित इस संयंत्र को पंजाब ऊर्जा विकास एजेंसी चला रहा है। यह ढाई एकड़ मंे फैला हुआ है। इसके परिसर में 500 गोषालाएं प्रतिदिन 2500 टन गोबर इस संयंत्र को उपलब्ध कराती हैं। अपनी जरूरतों को पूरा करने के बाद बची हुई बिजली राज्य विद्युत ग्रिड को उपलब्ध करा दी जाती है। बिजली बनाने के अलावा संयंत्र प्रतिदिन 50 टन जैविक खाद भी तैयार करता है। 13 करोड़ रूपये की लागत से बना यह संयंत्र दिसंबर 2004 में षुरू किया गया था। राज्य विद्युत बोर्ड ने बिजली के जो षुल्क निर्धारित किया है उसके अनुसार यह संयंत्र आर्थिक रूप से उपयोगी सिद्व हुआ है। खाद के रूप् में गोबर के इस्तेमाल से यह आय भी अर्जित कर रहा है। इस संयंत्र का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे ग्रीन हाऊस गैस बहुत कम निकलती है। संयंत्र से ताप कम निकलने के कारण वातावरण गर्म नहीं होता। संयंत्र ने लगभग 100 लोगों को रोजगार दिया है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रूड़की समय-समय पर संस्थान के कार्यों की निगरानी करता रहता है।

मध्य प्रदेष की सतपुड़ा पहाड़ियों में बसे कसई गांव में गैसीफायर और जेनरेटर लगाकर हर रोज 20 किलोवाट बिजली पैदा की जा रही है। घरों में ही नहीं, गली में, स्कूल में, आटा चक्की और ठंडे दूध गोदामों के लिए भी बिजली मिल रही है। पानी का पंप भी चलाया जा रहा है। यहां अपारंपरिक ऊर्जा मंत्रालय की मदद से 16 लाख रूपये मंे दो बायोमास गैसीफायर और एक सामुदायिक बायोगैस प्लांट लगाया गया है। हर परिवार से हर महीने 70 रूपये नकद और 50 रूपये की घास फूस और डंडियां, इस तरह 120 रूपये का अंषदान लिया गया। बायोमास गैसीफायर की क्षमता 10-10 किलोवाट की है। बिजली मिलने पर कसई गांव में दूरदर्षन और रेडियो का ज्ञानरंजन (इनफोटेनमंेट) लहराने लगा है। एक गांव की आवष्यकता 10 हैक्टेयर जमीन में उगी झाडियों और अन्य पौधोे तथा कृषि छीजन से पूरी की जा सकती है। अपने आप उग आनेवाले बेहया, आग, गाजर घास, जलकुंभी और अन्य खरपतवार इत्यादि सुखाकर बायोमास ऊर्जा के काम में लाये जा सकते हैं। एक अनुमान के अनुसार भारत में 60 करोड़ टन कृषि छीजन पैदा होती है। इससे 79000 मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है। इस क्षेत्र में अब निजी कंपनियां भी आने लगी हैं। कर्नाटक के मांडिया जिले के 48 गांवों के 120000 परिवारों को बायोमास ऊर्जा से पैदा बिजली देना षुरू कर दिया गया है। इसका साढ़े चार मेगावाट का बिजलीघर बायोमास से बिजली बनाने का भारत का सबसे बड़ा संयंत्र है। आज भी 60 प्रतिषत देहाती घरों में रोषनी के लिए केरोसिन यानी मिट्टी का तेल जलाया जाता है। 18 करोड़ टन के करीब बायोमास (लकड़ी और टहनियां) चूल्हों में झोंक दिया जाता है। दोनों में धुआं पैदा करते हैं। हर साल दुनिया में घरों में होने वाले वायु प्रदूषण से लगभग 16 लाख मौतें होती हैं। बायोमास ऊर्जा जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोत विष्व को इस विडंबना से मुक्ति दिला सकते हैं।

विदेषों में कचरे के उपयोग से बड़े बड़े उ़द्योग लगाए जा रहे हैं। पुराने रबर, पानी की खाली बोतले, कांच, कागज, कपड़ा, प्लास्टिक, फल सब्जी के छिलके उपयेग में लाए जा रहे हैं। विदेषों में रबर के कचरे से निपटने के लिए रबर को गला कर रबर षीट को तैयार किया जाता है। और बाद में इसी रबर षीट से देष भर की सड़कों को लेमिनेट किया जाता है। हमारे देष में भी लाखांे करोड़ों दुपहिया व चार पहियों वाहनों की भरमार है। और रबर के पुराने टायरों का विषाल कचरा हमारे यहां उपलब्ध हैं और जिस दिन कंपनियां इस दिषा में काम करने लगेगी। उस दिन कचरे से कमाई तो होगी ही वहीं कचरे के प्रबंध भी मुफत हो जाएगा।

अभी हाल ही में दिल्ली में कूड़े प्रबंधन की जिम्मेदारी एससीडी ने प्राईवेट कंपनी को सौंपने का फेंसला लिया है। बड़ी कंपनियों के मैदान में आ जाने से कूड़ा बीनने वालों की रोजी रोटी का सवाल उठ खड़ा हुआ है। इसका सीधा असर राष्ट्रीय राजधानी में दो लाख कूड़ा बीनने वालों की जीविका पर पड़ेगा। कंपनियां कूड़ा प्रबंधन करेंगी जिससे इनका रोजगार छिन जाएगा। हैजार्ड सेन्टर के निदेषक डूनू राय ने बताया कि  में हर रोज करीब आठ हजार टन कूड़ा निकलता है जो वर्ष 2020 तक 20 या 22 हजार टन हो जाएगा। षहर के दो लाख कूड़ा बीनने वाले हर दिन लगभग 20 से 25 फीसदी तक गंदगी बटोर लेते हैं। लेकिन अगर निजी कंपनियां इस व्यवसाय में उतरती हैं तो इन गरीबों का क्या होगा? इनके लिए काम करने वाली गैर सरकारी संस्था बाल विकास धरा के अध्यक्ष देवेन्द्र कुमार बराल ने नाराजगी जताते हुए कहा कि इन निर्बलों की मदद करने के बजाय निजी कंपनियां इनकी रोजी-रोटी छीनना चाहती हैं। दरअसल सवाल कूड़ा बीनने का नहीं है असलियत यह है कि कूड़ा अपने आप में कमाई व ऊर्जा का बड़ा स्त्रोत है। ये बात सरकार को भी समझ आ चुकी है इसलिए धीरे धीरे ही सही लगभग हर बड़े षहर में कचरा प्रबंधन के लिए प्राईवेट कंपनियों में होड़ मची है। कचरे में इन कंपनियों को भविष्य नजर आने लगा है।