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Monday, February 20, 2012

चुनावी मौसम में निखरता कांग्रेसी त्रियाचरित्तर

ऐसा लगता है कांग्रेस नेता और मंत्री जान-बूझकर बाटला हाउस विवाद को थमने नहीं देना चाहते। गाहे-बगाहे उसके जख्म को कुरेदते रहते हैं। ताजा मामला केन्द्रिय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद से जुड़ा है।अल्पसंख्यकों के वोट और समर्थन के लालच में केन्द्रिय कानून मंत्री एवं कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने बयान दिया कि बाटला हाउस मुठभेड़ की तस्वीरें देखकर सोनिया गांधी रो पड़ी थीं। असल में सोनिया रोयी थी या नहीं ये तो सोनिया जाने, लेकिन आंतकवाद जैसे संवेदनशील और आम आदमी की सुरक्षा से जुड़े मसले पर चंद वोटों की खातिर की गयी बयानबाजी से कांग्रेसी नेता क्या साबित करना चाहते हैं कि वो मुसलमानों के सबसे बड़े हितेषी और हमदर्द हैं। उन्हें किसी मुस्लिम आंतकवादी की मौत पर बड़ा दुख पहुंचता है, आंखों से आंसू निकल आते हैं। या फिर कांग्रेसी नेता यह बताना चाहते हैं कि उनके राज में ही मुस्लिम सुरक्षित और खुशहाल जीवन बसर कर सकते हैं।

उत्तर प्रदेश में खुर्शीद ने एक चुनावी सभा में कहा, ‘जिस वर्ष बाटला हाउस एनकाउंटर हुआ था उस समय मैं हुकुमत में नहीं था, बावजूद एक वकील की हैसियत से मैं कपिल सिब्बल और दिगिवजय सिंह के साथ सोनिया जी के पास गया और उन्हें मुठभेड़ की तस्वीरें दिखार्इं तो वह रोने लगीं और प्रधानमंत्री के पास जाने को कहा था। खुर्शीद के इस नाटकीय बयान पर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता विनय कटियार ने पूछा कि ‘क्या बाटला हाउस मुठभेड़ में मारे गए इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा और संसद हमले में मारे गए सुरक्षाकर्मियों के लिए भी सोनिया के आंसू फूट पड़े थे।
दरअसल कांग्रेस बाटला हाउस के जख्मों को जान बूझकर छेड़ती रहती है और इस मूढ़भेद से उपजी सहानुभूति को वोटों में बदलने की फिराक में रहती है। पार्टी आला कमान की शह पर ही पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह ने बाटला हाउस मुठभेड़ के दौरान आजमगढ़ के संजरपुर जाकर सरकार की परेशानियां बढ़ा दी थीं। बाटला हाउस पर एक के बाद एक नाटकीय बयान देने वाले कांग्रेस नेता भूल जाते हैं कि खुद कांग्रेसी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री इसे जायज ठहरा चुके हैं। तो सवाल है कि सनसनी खेज बयानबाजियों के बहकावे में यूपी का मुसलमान आता दिख रहा है ?

आजादी से लेकर आजतक देश पर सबसे अधिक राज कांग्रेस पार्टी ने ही किया है, और बरसों-बरस तक अधिकतर राज्यों में कांग्रेस के ही मुख्यमंत्री रहे हैं। ऐसे में यह सवाल अहम है कि कांग्रेस ने मुसलमानों की भलार्इ और कल्याण के लिए क्या किया? मुसलमानों के कल्याण और विकास के लिए कौन सी दूरदर्शी सोच रखी? मुस्लिम वोटों के चंद दलाल के जरिये धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़े कांग्रेस आखिर उत्तर प्रदेश में किस मुगालते में है। आजादी के 64 साल बाद भी कांग्रेस के कारण ही मुस्लिम की बजाय वोट बने हुए हैं। असल में कांग्रेस या किसी भी दूसरे दल की नजर में देश के मुसलमानों की हैसियत वोट के अलावा कुछ नहीं है। स्वार्थ सिद्धि के लिए मुस्लिम वोटों के सौदागार और पैरोकार नेता देश के आम मुसलमान की नजर में खुद को उनका सबसे बड़ा हमदर्द और उनके सुख-दुख में शरीक होने वाला साबित करने की गरज से चुनाव में जानबूझकर मुस्लिमों से जुड़े विभिन्न संवेदनशील मुददों को उठाते है। इस दौड़ में सबसे आगे कांग्रेसी नेता रहते हैं, काग्रेसी नेता मौके-बेमौके यह सिद्ध करने की कोशिश में दिखार्इ देते हैं कि देश में मुसलमानों के हितेषी कांग्रेस पार्टी हैं, अन्य कोर्इ दूसरा दल नहीं।

मुस्लिम वोटों के लालच में चुनाव की घोषणा से पूर्व यूपीए सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों को साढ़े चार फीसद आरक्षण और बुनकरों की कर्ज माफी का चारा फेंका था। राहुल का मुस्लिम उलेमाओं और धर्म गुरूओं के चरणों में लोटना और धूल चाटना असरकारी न होते देखकर मुसलमानों को जज्बातों को जगाने के लिए आलाकमान की शह पर पार्टी के बातूनी और विवादित बयानों के लिए मशहूर दिगिवजय सिंह ने बाटला हाउस के गड़े मुर्दे को उखाड़ा। दिगिवजय के बयान का सीधा खामियाजा राहुल को आजमगढ़ के शिबली कालेज में छात्रों के विरोध के रूप में झेलना पड़ा। मौके की नजाकत को भांपकर राहुल ने दिगिवजय से किनारा कर लिया। लेकिन बाटला हाउस का मुददा भुनाने की फिराक में पड़ी कांग्रेस ने इस बार देश के कानून मंत्री सलमान खुर्षीद को आगे किया। सलमान ने घटना को जायज और नाजायज ठहराने की बजाय कांग्रेस सुप्रीमों सोनिया गांधी के दुख-दर्दे और आंसुओं का घोल बनाकर मुस्लिम वोटरों की गोलबंदी की पुख्ता योजना बनार्इ। लेकिन विरोधियों की तीखी आलोचना और पार्टी को नए संकट में घिरते देख कांग्रेस महासचिव दिगिवजय सिंह ने यह कहकर की यह सलमान की निजी राय है पार्टी की नहीं, मामला शांत कराने की कोशिश की। मामला और बयानबाजी तो फिलहाल बंद हो गयी है लेकिन कांग्रेस का असली चरित्र और चेहरा एक बार फिर बेनकाब हो गया है कि वोटों के लालच में कांग्रेस जानबूझकर मुस्लिम समुदाय से जुड़ी घटनाओं और मुददों को हरा रखना चाहती है, असल में उसे किसी की फिक्र या चिंता नहीं है।

कांग्रेस को मुस्लिम युवाओं की इतनी फिक्र है तो उसके हाथ किसी राजनीतिक दल या जनता ने बांधे नहीं है। पिछले 64 सालों में कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए क्या किया है यह देश के मुसलमानों से बेहतर कोर्इ दूसरा नहीं जानता। सोची समझी रणनीति और साजिश के तहत ही देश पर सबसे लंबे समय तक एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस पार्टी ने कभी मुसलमानों को उचित मान-सम्मान और हिस्सा नहीं दिया जिसके वो हकदार थे। कांग्रेस ने ही देश में मुसलमानों को वोट बैंक में तब्दील किया है, ये कड़वी हकीकत है। कांग्रेस को दुख इस बात का नहीं है कि देश के मुसलमान बदहाली की जिंदगी बसर कर रहे हैं या फिर वो शिक्षा, रोजगार में पिछड़े हैं। कांग्रेस का असल दुख यह है कि जात-पात की राजनीति के जो बीज उसने बोए थे आज उसकी फसल दूसरे दल काट रहे हैं, कांग्रेस की असली चिंता यह है कि उससे नाराज, रूठे और मुंह मोड़ चुके मुस्लिम वोट वापिस उसके खेमे में आ जाए। इसलिए कांग्रेस को मुसलमानों की याद चुनावों के वक्त सबसे अधिक आती है। सलमान और दिगिवजय जैसे नेताओं की असलियत जनता भी समझती है। बाटला हाउस पर कांग्रेसी नेताओं के मगरमच्छी आंसू चुनावी सैलाब में पार्टी की नैया पार लगाएंगे या डुबोयेंगे ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन अहम सवाल यह है कि कांग्रेस को चुनावों के वक्त ही मुसलमानों और उनकी दुख तकलीफ की याद क्यों आती है।

नेता यूँ न करते गाली-गलौज

चुनाव के समय नेताओं का एक-दूसरे पर कीचड़ उछालना, तीखे शब्द बाण चलाना, बेतुकी, आधारहीन एवं ओछी बयानबाजी करना आम आदमी की नजर में आम बात हो सकती है, लेकिन खुद नेता ऐसा नहीं सोचते हैं। उनकी जुबान से जो कुछ भी निकलता है वो घंटों के चिंतन-मंथन और सोच-समझ के बाद किसी खास वजह से ही निकलता है।
मीडिया की सुर्खियां बटोरने, आम आदमी को अपने पक्ष में करने, विरोधियों पर हमला करने, उनकी पोल-पटटी खोलने और भविष्य की रणनीति का खुलासा करने के लिए नेता भाषण और बयानबाजी करते हैं। जब बात विस्तार से समझानी हो या फिर कई मुद्दों को एक साथ समेटना हो तो प्रेस कांफ्रेस की मदद ली जाती है। ये अलग बात है कि आम आदमी इन संकेतों को पूरी तरह से समझ नहीं पाता है और नेताओं के बहकावे में आकर अपने बुद्धि को किनारे रखकर उनकी कही को सच और सही मानने की भूल कर बैठता है।
नेताओं की बयानबाजी और विरोधियों के लिए प्रयोग की जा रही भाषा, भाव-भंगिमा पर थोड़ा सा भी ध्यान दिया जाए तो सारी कहानी आसानी से समझ में आ जाती है। लेकिन आम जनता के पास इतना समय नहीं होता है कि चालाक, धूर्त और लम्पट नेताओं की चालबाजियों और साजिशों को समझने बैठे। ऐसे में वह नेताओं की बयानबाजी को हंसी-चुहल और नौटंकी से अधिक कुछ नहीं समझता। अपनी इस दशा के लिए नेता खुद ही जिम्मेदार हैं।
एक हद तक मीडिया भी नेताओं के सुर में सुर मिलाता है। वह अपने निजी स्वार्थ और अपने धंधे को ध्यान में रखकर नेताओं की बयानबाजी और भाषण का विश्लेषण राजनीतिक दल और नेताओं के मूड और रिश्तों के हिसाब से लिखता-दिखाता है। नेता-मीडिया की इस तथाकथित जुगलबंदी में आम आदमी हर बार ठगा जाता है, और नेता सारे गुनाह करने के बाद भी हाथ झाड़कर साफ निकल जाते हैं।
पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों और नेताओं ने एक-दूजे पर आरोप-प्रत्यारोप की झड़ी लगाई और लगा रहे हैं। एक दूसरे को नीचा दिखाने और धूल चटाने की नीयत से खूब तीखी बयानबाजी भी हुई। अगर यह समझा जाए कि नेता एक दूसरे से खार खाते हैं या फिर एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते, तो हम-आप बिल्कुल गलत समझते हैं। राजनीति व्यापार और नेता एक कुशल और चालाक व्यापारी की भांति अपनी कमियों को दबाने और अच्छाइयों को प्रचारित करने का कोई मौका नहीं गंवाते हैं।
भाजपा की फायरबिग्रेड कही जाने वाली नेत्री उमा भारती यह कहती हैं कि चुनाव बाद किसी दल से अगर गठबंधन हुआ तो वो गंगा में समाधि ले लेंगी। कांग्रेसी दिग्विजय सिंह का बयान कि चुनाव बाद किसी भी दल से समझौता नहीं होगा या फिर यह कि अगर सूबे में किसी दल को बहुमत नहीं मिला तो राष्ट्रपति शासन लगेग। सलमान खुर्शीद कहते हैं कि बाटला हाउस कांड की फोटो देखकर सोनिया के आंसू निकल आए थे, या फिर अल्पसंख्यकों के आरक्षण संबंधी बयान। बेनी का पुनिया को बाहरी बताना हो या फिर राबर्ट-प्रियंका की बयानबाजी। ये बयान या शब्द अनायास ही इन नेताओं के मुंह से नहीं निकले हैं।
बयानबाजी किसी खास मकसद से की जाती है। एक-एक बयान को लेकर घंटों चिंतन-मंथन का दौर चलता है, यह अलग बात है कि नेता उसे अपने मुखारविंद से उवाचते हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि यह उनका निजी बयान है। कभी कभार दांव उलटा पड़ने पर पार्टी यह कहकर कि यह अमुक की निजी राय है, खुद को विवाद से अलग कर लेती है। लेकिन नेताओं के मुंह से निकला एक-एक शब्द सोची-समझी रणनीति या कार्ययोजना का हिस्सा ही होता है।
हां, कभी कभार जोश, कुंठा, निराशा या निजी कारणों से जुबान फिसल भी जाती है, लेकिन ऐसे मामले कम ही होते हैं। अधिकतर मामलों में सुर्खियों में बने रहने के लिए नेता विवादास्पद और अजीब बयान देकर खुद को ज्ञानी, चिंतक, विचारक और भीड़ से अलग दिखाने की जुगत में लगे रहते हैं। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव अपने ऊटपटांग हरकतों, फूहड़ अंदाज और देहाती बोली और अजब-गजब बयानों के लिए मीडिया के केंद्र में बने रहते हैं।
जब सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यह कहते हैं कि वो बलात्कार पीडि़तों को मुआवजा और नौकरी देंगे या फिर भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी बोलते हैं कि बलात्कारियों का हाथ काटने वाली सरकार चाहिये तो इसका कोई मतलब होता है। असल में नेता अपनी तीखी जुबान से आम आदमी और मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं और ऐसे नेता हमेशा चर्चा में बने रहते हैं। दिग्विजय जैसे दर्जनों महासचिव कांग्रेस में होंगे, लेकिन आज अगर मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को सूबे की जनता जानती-पहचानती है तो उसके पीछे उनकी विवादित बयानबाजी का बड़ा योगदान है।
बाटला हाउस इनकाउंटर पर बयान देकर दिग्विजय ने मुस्लिम वोटरों की गोलबंदी की कोशिश की थी। ये अलग बात है कि उनका दांव उलटा पड़ गया और राहुल ने उनसे किनारा करने में भलाई समझी, लेकिन पिछले चार सालों से कांग्रेसी नेत्री रीता बहुगुणा जोशी, पीएल पुनिया, बेनी प्रसाद वर्मा, दिग्विजय सिंह बयानबाजी के कारण ही सुर्खियों में बने रहे। रीता बहुगुणा का आज जो कद और साख है उसके पीछे उनकी प्रदेश सरकार पर हमलावर प्रवृत्ति, आलोचना और तीखी बयानबाजी का बड़ा योगदान है।
मायावती पर सीधे हमले करके रीता बहुगुणा ने खुद का सूबे की राजनीति में स्थापित कर लिया। भाजपा में उमा भारती, विनय कटियार, कलराज मिश्र, नितिन गडकरी, वरूण गांधी और योगी आदित्यनाथ तीखी बयानबाजी के जाने जाते हैं। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह, आजम खां भी किसी से कम नहीं हैं ।
जब मायावती मंच पर चढ़कर दलित मतदाताओं को बसपा की सरकार न होने पर उनके साथ होने वाले जुल्मों का बयान करती है या फिर दलित स्वाभिमान को लेकर जोशभरती है तो भीड़ में जादू का असर होता है। मीडिया और बुद्धिजीवी नेताओं के बयानों के विभिन्न पक्षों की सकारात्मक और नकारात्मक व्याख्या और टीका-टिप्पणी करता है, लेकिन आम आदमी या मतदाता जिसके पास उतनी सूक्ष्म बुद्धि या चिंतन का समय नहीं है वो तो अपने प्रिय नेता की बात को पत्थर की लकीर और स्थापित सत्य मानता है।
उत्तर प्रदेश में दो चरणों का मतदान हो चुका है और पांच चरणों का मतदान अभी शेष है। ऐसे में मतदाताओं को अपने पक्ष में गोलबंद करने और उन्हें अपने पाले में लाने के लिए नेताओं की जुबान तीखी होती जाएगी और विरोधियों पर हमलावर होने की प्रवृत्ति में भी बढ़ोतरी होगी। विवादास्पद बातें कहकर ही नेता और राजनीतिक दल अपनी गलतियों को छुपाते एवं ढकते हैं और विरोधियों को नंगा करते हैं ।जो कुछ भी वो बोलते हैं उसकी आड़ में कोई मकसद, मतलब या फिर संदेश छुपा होता है। यह अलग बात है कि कोई कितना समझ पाता है, लेकिन नेता हर बार अपनी चाल में कामयाब हो जाते हैं। 

Sunday, February 12, 2012

सूत न कपास : सीएम पद के लिए बेनी-पुनिया कर रहे बकवास

कांग्रेस के कुर्मी चेहरे एवं केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा और दलित चेहरे एवं राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पन्ना लाल पुनिया की लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही है. ताजा घटनाक्रम में बेनी बाबू ने बाराबंकी सांसद पीएल पुनिया को बाहरी बता विवाद को जन्म दे दिया है. मंत्री वर्मा ने दरियाबाद विधानसभा क्षेत्र में पुनिया के लिए ये बात कही. दरियाबाद से वर्मा का बेटा राकेश कांग्रेस प्रत्याशी हैं. बेनी ने कहा पुनिया पंजाब के हैं. उत्तर प्रदेश की राजनीति से उनका कोई लेना-देना नहीं है. ये बयान पुनिया के उस बयान से जोड़ कर देखा जा रहा है जिसमें पुनिया ने कहा था कि पार्टी ने किसी नेता को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट नहीं किया है.
ऐसे में आज जब उन्होंने कांग्रेस सांसद पीएल पुनिया को पंजाब का निवासी बता डाला तो कांग्रेस की गुटबाजी भी उभरकर सामने आ गयी. असलियत यह है कि बेनी बाबू अभी से ही अपने को प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री मान चुके हैं और उनके लिए कांग्रेस हाई कमान भी कोई खास मायने नहीं रखता. बताते चले कि बेनी प्रसाद उत्तर प्रदेश में कुर्मियों के बड़े नेता माने जाते हैं, और मध्य एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में उनका अच्छा प्रभाव व रसूख है. वहीं पुनिया भी कांग्रेस और प्रदेश के रसूखदार दलित नेता हैं, सूबे के दलित उन्हें पूरा आदर व मान देते हैं. खुद को भावी मुख्यमंत्री का योग्य और सक्षम उम्मीदवार साबित करने की जंग में बेनी और पुनिया के बीच छिड़ी लड़ाई से अगले छह चरणों के मतदान और मिशन 2012 को गहरा धक्का लगने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. विवाद को ठंडा करने के लिए दिग्विजय सिंह ने वर्मा को संयम बरतने की सलाह दी है. सिंह कहा कि दोनों ही पार्टी के कद्दावर नेता हैं. वर्मा को ऐसे बयान नहीं देने चाहिए.
पीएल पुनिया और बेनी के बीच छिड़ी लड़ाई कोई नयी नहीं है. केन्द्र में पद मिलने के बाद भी दोनों महानुभावों का अधिकतर समय यूपी में ही बीतता है. असल में पुनिया और बेनी दोनों की नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टिकी है. यह बात पार्टी हाइकमान से लेकर आम कार्यकर्ता तक को बखूबी मालूम है. दोनों को पार्टी और मंत्रिमंडल में महत्व देने की पीछे उनकी जाति का फैक्टर सबसे सबल पक्ष रहा है. कांग्रेस ने दलितों को साधने के लिए पुनिया और कुर्मियों को अपने पाले में लाने के लिए बेनी को खूब तवज्जों दी जाती है. सपा छोड़कर कांग्रेस में आए बेनी बाबू के पीछे स्ट्रांग कुर्मी वोट बैंक है, तो वहीं नौकरशाह से नेता बने पीएल पुनिया को मायावती के दलित वोट बैंक में सेंध लगाने के गरज और इरादे से पार्टी में खास जगह दी गयी है. कांग्रेस ने बेनी और पुनिया दोनों को केन्द्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण पद सौंप रखे हैं, बावजूद इसके दोनों का अधिकतर समय यूपी में ही बीतता है. बेनी बाबू के अजेंडे में केन्द्र की कुर्सी से ज्यादा सूबे की कमान महत्वपूर्ण हैं.
लखनऊ एयरपोर्ट से लेकर बहराइच तक मेन सड़क के किनारे इस्पात मंत्रालय के लगे बड़े-बड़े होर्डिंग बेनी बाबू की राजनीतिक महत्वकांक्षा और मन में दबी भावनाओं का खुलकर प्रदर्शन करते हैं. पीएल पुनिया भी यूपी से जुड़े दलित अत्याचार, अपराध के मुद्दे को अति गंभीरता से लेते हैं, जिसके चलते राष्ट्रीय स्तर का आयोग यूपी में ही सिमटकर रह गया है. बेनी और पुनिया दोनों एक दूसरे को पटखनी देने और एक दूसरे पर शब्द बाण चलाने का कोई अवसर छोड़ते नहीं है. बेटे के चुनाव प्रचार में व्यस्त बेनी बाबू को जैसे ही वोटिंग के दिन फुर्सत मिली उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी पुनिया पर हमले करने में देरी नहीं की और उन्हें बाहर का बताकर मुख्यमंत्री की रेस से बाहर करने का अचूक दांव चला. फिलहाल पुनिया ने इस मुद्दे पर सधा जवाब देकर एक बार फिर यह साबित किया कि वे संगठन के दायरे में रहने वाले नेता हैं. लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि बेनी और पुनिया मुख्यमंत्री बनने के सपने किस आधार पर देख रहे हैं.
विधानसभा में कांग्रेस के 22 विधायक हैं, राहुल बाबा की दिन रात की मेहनत और दलित एवं मुसलमान प्रेम की बदौलत बहुत ज्यादा छलांग लगाकर कांग्रेस दुगनी सीटें पा जाएगी इससे ज्यादा कुछ होने वाला नहीं है. वोटरों को भरमाने और बरगालाने के लिए सभी दल अपने दम पर सरकार बनाने के दावे ठोंक रहे हैं लेकिन असलियत किसी से छिपी नहीं है. कांग्रेस की हालत और प्रदर्शन से राहुल खुद ही झुंझलाए और झल्लाए हुए हैं, उनकी हताशा, निराशा और चुनाव नतीजों की झलक वाराणसी में हुई प्रेस कांफ्रेस में दिख ही चुकी है, ऐसे में जो थोड़ा बहुत बेहतरी होने की संभावना है भी वो बेनी और पुनिया जैसे नेताओं की बयानबाजी और झगड़े की वजह से मिट्टी में मिल रही है. आज कांग्रेस आलाकमान पार्टी को सूबे में आईसीयू से बाहर निकालने में जुटा है और उसके नेता खुद को मुख्यमंत्री की दौड़ में अव्वल बनाने में जुटे हैं, बेनी और पुनिया के झगड़े को देखकर पुरानी कहावत न सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम-लट्ठ साबित होती है.

जो माया के अपने थे, अब होने लगे मुलायम के

नौकरशाह, उद्योगपति और मीडिया की चाल और मूड से देश में होने वाली गतिविधियों और भावी परिवर्तनों को आसानी से समझा जा सकता है, क्योंकि जनता और शासन के मध्य ये तीनों एक पुल की भांति होते हैं, और प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से इनका सत्ता और जनता से गहरा जुड़ाव और रिश्ता होता है। ऐसे में अगर इन तीनों की चाल, मूड, भाषा, स्वभाव और कार्यशैली में बदलाव दिखाई दे तो यह समझ लेना कुछ होने वाला है या फिर बदलाव के संकेत है। बसपा शासनकाल में जो लोग सता के नाक के बाल थे वो एक-एक करके किसी न किसी बहाने से उससे दूर छिटक रहे हैं, या दूर होने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं। माया मेमसाहब के सबसे करीबी नौकरशाह केन्द्र में प्रतिनियुक्ति के लिए अर्जी लगा रहे हैं तो बहनजी के खासम खास उद्योगपति भी बोरिया बिस्तर समेटने की कवायद में जुट गये हैं।
बदलाव की हवाओं से मीडिया भी अछूता नहीं है, बदलाव के खुशबू सूंघकर मीडिया ने चाल और भाषा बदल दी है। ये चर्चा जनता में भी आम है कि अबकि बदलाव तो जरूर होगा। आम आदमी के मन में यह सवाल उमड़-घुमड़ रहा है कि सत्ता की चाबी किसको मिलेगी। अलग-अलग विचार और गणित हैं, लेकिन कुल मिलाकर बदलाव होगा ये बात तय हो चुकी है। खुफिया और मीडिया रिपोर्ट के आधार पर नौकरशाह इस बात को सबसे पहले समझ गये कि बहनजी की सरकार बनना मुश्किल है, ऐसे में सत्ता से दूरी बनाने में ही भलाई है। पंचम तल में बैठने वाले बहनजी के खासमखास नौकरशाह ने तो चुनाव की घोषणा से पहले ही समाजवादी पार्टी में लाइजनिंग और मेल-जोल बढ़ाना शुरू कर दिया था, सूत्रों की माने तो नेताजी के दूसरे पुत्र प्रतीक यादव की लखनऊ में आयोजित शादी की रिसेप्शन पार्टी का सारा प्रबंध इसी नौकरशाह के चम्मचों ने किया था।
चुनावी शंखनाद के साथ ही बसपा सरकार के डूबते जहाज से कूदने और साथ छोड़ने वाले अफसरों की लाइन ही लग गयी। हालत यह है कि बहनजी की आंख, कान और हाथ माने जाने वाले एक दर्जन से अधिक अफसर बदलाव की सुगबुगाहट के बीच केंद्र में प्रतिनियुक्ति के लिए राज्य सरकार के समक्ष अर्जी लगा चुके हैं। प्रतिनियुक्ति चाहने वालों में मुख्य सचिव अनूप मिश्र के अलावा पंचम तल के ताकतवर नौकरशाह रवीन्द्र सिंह, जेएन चौम्बर, प्रदीप शुक्ला, आरपी सिंह, अनिल संत, सुशील कुमार, मोहम्मद मुस्तफा और कई आईपीएस आफिसर भी हैं। इसके अलावा बहनजी के करीबी एक दर्जन के करीब आईएएस और आईपीएस अफसरों ने समाजवादी खेमे में आमद दर्ज करा ली और इन दिनों ये महानुभाव सपा नेताओं को पटाने और आगे की गोटियां फिट करने में समय बिता रहे हैं। नौकरशाहों की तरह बहनजी के आर्थिक स्त्रोतों अर्थात उद्योगपतियों ने भी बहनजी और सत्ता से दूरी बनानी शुरू कर दी है।
बहनजी के राज में सोनभद्र से लेकर नोएडा तक की बेशकीमती जमीनें लूटने और प्राकृतिक संसाधनों के लुटरे जेपी ग्रुप ने तमाम विकास योजनाओं के काम से हाथ खींच लिया है, बैंक गारंटी के तौर पर जमा धनराशि की वापसी की कार्रवाई शुरू कर दी है। जेपी ग्रुप के पास ही बहनजी के ड्रीम प्रोजेक्ट यमुना एक्सप्रेसवे का ठेका था। लेकिन बदलाव की सूंघ लगते ही कम्पनी ने काम बंद करने और पीछे हटने में ही भलाई समझी है। बहनजी के सबसे खास उद्योगपति और शराब माफिया पोंटी चड्डा ने भी सोची समझी रणनीति और बहन जी को दुबारा सत्ता हासिल होते न देख दूरी में ही भलाई समझ आ रही है। सूत्रों की माने तो पोंटी जिस तरह से बसपा से दूरी बना रहे हैं उससे तो यही लगता है कि अगला शासन मायावती का नहीं होगा। पोंटी को बखूबी पता है कि पिछले पांच सालों में उनके और माया सरकार के करीबी रिश्तों को लेकर खूब चर्चा हुई है, ऐसे में अगर कोई अन्य सरकार बनी तो वह उनकी कम्पनी को अछूत समझकर किनारे लगा सकती है। यह बात यह बिजनेस मैन होने के नाते पोंटी कैसे बर्दाश्त कर सकते थे। जानकार तो यहां तक कहते हैं कि पोंटी ने ही अपने ठिकानों पर खुद आयकर विभाग के छापे की कार्रवाई करवाई है। छापों के बाद अब कोई यह नहीं कह पाएगा कि पोंटी के पास काले धन की खान है दूसरा पोंटी के करीबी यह कहते हुए बसपा को उसका ‘हक’ देने से बच जाएंगे कि उन्होंने कुछ कमाया ही नहीं तो देंगे कैसे।
सपा सुप्रीमो के साथ पोंटी के अच्छे संबंध रहे हैं, मुलायम ने बसपा से गठबंधन सरकार के जमाने में पोंटी को मायावती से मिलवाया था। ऐसे में मुलायम की नजरों में पाक-साफ दिखने के लिए अपने कांग्रेसी संबंधों की मदद से पोंटी ने आगे की राह साफ कर ली है। बदलाव की हवा जेपी ग्रुप और पोंटी चड्डा के अलावा कई दूसरे औद्योगिक घरानों ने सूंघ ली है। सूत्रों के अनुसार इस बार औद्योगिक घरानों ने सबसे अधिक चंदा सपा को ही दिया है और परिवर्तन भांपकर औद्योगिक घराने आगे की रणनीति को समाजवादी नजरिये से देखने-समझने की जुगत में लगे हैं। ऐसे में मीडिया जगत को बखूबी पता है कि सूबे में अगली सरकार बसपा की नहीं होगी यह तय है। ऐसे में बसपा को कम कवरेज से लेकर मीडिया जगत में हलचल और भावी सरकार से जुड़े पत्रकारों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठाने की कार्रवाई भी शुरू हो चुकी है। अधिकतर अखबार प्रबंधन और मीडिया हाउस अखबार और चैनल की बागडोर यूपी में उनके हाथ में सौंप रहा है जिनका समाजवादी पार्टी से मधुर संबंध हैं। सूबे में चुनावी मौसम में दर्जनों नये अखबार और चौनल इस कड़ी का हिस्सा है, और लगातार अखबार और चैनल के उच्च पदों पर परिवर्तन और नयी नियुक्तियां परिवर्तन की संभावना की वजह से ही हैं।
लब्बोलुआब यह है कि सूबे की सत्ता में परिवर्तन होगा, यह नौकरशाह, उद्योगपति और मीडिया के बदले रूख और चाल से समझा जा सकता है। असल में होगा क्या है यह तो चुनाव परिणाम ही तय करेंगे लेकिन सत्ता के सबसे करीबी लोगों और संगठनों में अचानक बदलाव, हलचल और तेजी दिखाई दे तो कहानी समझ में आ ही जाती है और यूपी में जिस तरह से नौकरशाह, उद्योगपति और मीडिया में जो अस्वाभाविक परिवर्तन दिख रहे हैं, वो साफ तौर पर सत्ता परिवर्तन की चुगली कर रहे हैं।

Friday, September 23, 2011

भ्रष्टाचार के कीचड़ में रथयात्रा का कमल

बीजेपी के सीनियर लीडर लाल कृष्ण आडवाणी एक बार फिर रथ यात्रा का ऐलान किया है। इस बार मुद्दा भ्रष्टाचार है। अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई से जोश में आये आडवाणी ने भी भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए देश भर में जनजागरण और यूपीए सरकार की काली करतूतों का भंडा फोड़ने की पूरी तैयारी में हैं। आडवाणी इससे पूर्व पांच रथ यात्राएं कर पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने का काम कर चुके हैं। अगले साल पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर आडवाणी की रथ यात्रा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन कर्नाटक और उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते बीजेपी को मुख्यमंत्रियों को बदलना पड़ा, वहीं पंजाब में उसके सहयोगी अकाली दल द्वारा दुर्दांत आंतकवादी की फांसी की सजा माफ करवाने की मांग, झारखण्ड में शिबु सोरेन की भ्रष्ट सरकार को समर्थन देकर बीजेपी खुद कटघरे में खड़ी है, ऐसे में आडवाणी की रथयात्रा क्या रंग लाएगी ये तो आने वाला समय ही बताएगा।

राजनीतिक दृष्टि से कांग्रेस की हालत इस समय अत्यधिक नाजुक है। जो कारनामा पूरा विपक्ष मिल कर नहीं कर पाया उस काम को 12 दिन के अनशन में अन्ना ने कर दिखाया। सोनिया की गैरमौजूदगी में राहुल के हाथों में सरकार की कमान थी। लेकिन राहुल और उनके करीबी मंत्रियों ने अन्ना के अनशन को जिस लड़कपन और बचकाने तरीके से निपटा है, उससे देश भर में ये मैसेज गया कि कांग्रेस का हाथ भ्रष्टाचार के साथ है। सिविल सोसायटी के मांगों पर संसद ने सम्मति देकर ऐतिहासिक काम किया है, लेकिन इसका श्रेय भी कांग्रेस के खाते में जाने की बजाय सब दलों में बराबर बंट गया। अन्ना के अनशन ने बैठे-ठाले विपक्ष खास कर बीजेपी को केन्द्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने का सुनहरा अवसर दे दिया है।

वक्त की नजाकत भांपते हुये आडवाणी ने भ्रष्टाचार के विरूद्व अलख जगाने के लिए रथ यात्रा का विकल्प चुनकर सीधे-सीधे कांग्रेस नीत यूपीए सरकार पर हमला बोलने का फाॅर्मूला ढूंढ लिया है। आडवाणी चाहते है कि अन्ना ने अनशन के दौरान कांगे्रेस की जो निगेटिव छवि का निर्माण देश की जनता के बीच हुआ है वो मुद्दा आगामी आम चुनावों तक जनता को याद रहना चाहिए। आडवाणाी ने रथ यात्रा का ऐलान करके एक पत्थर से दो निषाने लगाए हैं। रथ यात्रा से वो कांग्रेस की असलियत देष की जनता को बताकर बीजेपी के जनमत तैयार करेंगे ही वहीं उन्होंने अपनी पार्टी में भी ये मैसेज दे दिया है कि आगामी आम चुनावों में एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए वो सषक्त उम्मीदवार हैं।

असल में बीजेपी पर जब-जब संकट आया है तब आडवाणी ने रथ यात्रा के द्वारा पार्टी की डूबती नैया को पार लगाया है। ये अलग बात है कि फसल आडवाणी ने लगाई और कटाई के समय अटल बिहारी वाजपेयी सामने आ गये। लबोलुआब यह है कि आडवाणी को उनकी मेहनत का फल नहीं मिल पाया। देखा जाए तो पिछले आम चुनावों में पार्टी का जनाधार घटा है। राज्यों में भी बीजेपी की हालत पतली ही है। देष की राजनीतिक राजधानी उत्तर प्रदेष में बीजेपी हाषिये पर खड़ी है। जिन राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं वहां गुटबाजी, अंदरूनी राजनीति और उठा-पटक रूकने का नाम नहीं ले रही है।आडवाणी ने रथ यात्रा का ऐलान तो कर दिया है लेकिन ख्ुाद उनकी पार्टी के पूर्व सांसद नोट फाॅर वोट मामले में तिहाड़ में बंद हैं। कर्नाटक और उत्तराखण्ड में बीजेपी को भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते मुख्यमंत्रियों को बदलना पड़ा। और जिन राज्यों में बीजेपी की गठबंधन की सरकार है वहां भी भ्रष्टाचार की आवाजेें सुनाई देती रहती हैं। पार्टी की सीनियर और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज पर कर्नाटक के खनन माफिया रेड्डी बंधुओं से सांठ गंाठ के आरोप सरेआम लग रहे हैं। जब बीजेपी के दामन पर खुद भ्रष्टाचार के दाग लगे हुए हैं तो आडवाणी किस
मुंह से इसके खिलाफ मुंह खोलेंगे, और कांग्रेस पर निशाने लगाएंगे ये देखना होगा।

आडवाणी को उम्मीद है कि रथ यात्रा के साथ अगर भ्रष्टाचार को जोड़ दिया जाए तो उसका तोड़ किसी के पास नहीं होगा। ऊपरी तौर पर आडवाणी की रथ यात्रा का मकसद साफ-सुथरा और देश हित में लगता है लेकिन असल में रथ यात्रा की आड़ में आडवाणी विशुद्व राजनीति के अलावा कुछ और करेंगे इसकी उम्मीद न के बराबर है। आडवाणी कोई समाज सेवक तो है नहीं जो बिना किसी स्वार्थ के देश और दुनिया को बचाने के लिये रथ यात्रा करे, उनका असली निशाना 2014 के आम चुनाव हैं। अन्ना ने देश भर में जो एंटी कांग्रेस माहौल बनाया है उस पर ऊपर नीचे पलीता लगाने का काम आडवाणी करेंगे।

नब्बे के दशक में जब आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली थी तो तब देश में अलग तरह की हवाएं बह रही थी। पिछले दो दशकों में देश की जनता ने अनेक नेताओं की कई काली करतूतों को बहुत नजदीक से देखा और जाना है। जो जनता कभी मंदिर मस्जिद के लिए एक-दूजे का कत्ल करने पर आमादा थी। उसी जनता ने बाबरी मस्जिद के फैंसले के दिन जो समझदारी दिखाई उसकी जितनी तारीफ की जाए वो कम है। पिछले एक दशक में नेताओं की छवि जनता की नजर में बद से बदतर हुई है। राजनीति के हमाम में सभी नंगे है, इस बात का खुलासा हो चुका है। रही सही कसर अन्ना के अनशन ने पूरी कर दी। जन लोकपाल बिल के दौरान हर छोटे बड़े राजनीतिक दल का चेहरा और चरित्र देश की जनता के सामने आ गया। ऐसे माहौल में आडवाणी का भ्रष्टाचार के खिलाफ रथ यात्रा पर निकलना पहले से ही खस्तहाल बीजेपी की हालत को कहीं और खराब न कर दे।

शायद आडवाणी इस मुगालते में हैं कि देश में एंटी कांग्रेस हवा का फायदा भाजपा को मिलेगा। लेकिन वो इस बात को भूल जाते हैं कि जन लोकपाल बिल पर जो स्टैंड कांग्रेस व दूसरे दलों का था, वहीं स्टैंड बीजेपी का भी था। मजबूरी के चलते सरकार और विपक्षी दलों को सिविल सोसायटी की बात मानी थी। ये अलग बात है कि केंद्र में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार है ऐसे में सारे किये धरे का ठीकरा कांग्रेस के माथे ही फूटेगा लेकिन कम या ज्यादा असर सभी राजनीतिक दलों को भुगतना पड़ेगा इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है। जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है वहां कांग्रेसियों और दूसरे राज्यों में जो पार्टियां शासन का सुख भोग रही है, उनके नाक के नीचे पलने और पनपने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ भी जनता का गुस्सा फूटना लाजिमी है। ऐसे में आडवाणी का कांग्रेस की ओर उंगुली उठाने सेे एक उंगुली उनकी ओर भी अपने आप उठ जाएगी। इस रथयात्रा से पूर्व उपप्रधानमंत्री आडवाणी रामजन्मभूमि, जनादेश, स्वर्ण जयंती, भार उदय और भारत सुरक्षा यात्रा निकाल चुके हैं। अन्ना की हुंकार और हठ से जोश में आए आडवाणी ने रथ यात्रा का फैंसला ले तो लिया है लेकिन जिस मकसद से आडवाणी रथ यात्रा पर निकल रहे हैं उसका पूरा हो पाने की संभावना न के बराबर हैं। कहीं ऐसा न हो कि आडवाणी की रथयात्रा उनके राजनीतिक यात्रा के ताबूत में आखिरी कील साबित हो।

Tuesday, July 26, 2011

‘अमर’ के लिए ही क्यों होता है मुलायम के दिल में ‘कुछ-कुछ’

कैश फॉर वोट कांड में जिस तरह नित नए खुलासे हो रहे हैं उसमें बड़े-बड़ों के दामन पर छींटे पड़ते दिखाई दे रहे हैं। कोर्ट की फटकार के बाद आखिकर तीन साल बाद दिल्ली पुलिस ने इस मामले में संजीव सक्सेना और सुहैल हिंदुस्तानी को गिरफ्तार किया है। संजीव और सुहैल से मिली जानकारी के बाद समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव राज्यसभा सांसद अमर सिंह से दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रंाच ने पूछताछ की। अमर सिंह से पूछताछ में के आधार पर धीरे धीरे जांच का दायरा फैलता जा रहा है। सपा सांसद रेवती रमण सिंह और कांग्रेसी नेता अहमद पटेल का नाम भी सामने आ रहा है। लेकिन इन तमाम बातों के बीच सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह के दिल में अपनी पार्टी के पूर्व महासचिव अमर सिंह के लिए एकाएक जागा प्रेम कुछ ओर ही संकेत करता है। क्योंकि राजनीति में हर बयान में गूढ़ अर्थ और स्वार्थ छिपा होता है ऐसे में मुलायम सिंह की मुख से अमर सिंह के लिए ‘मुलायम’ बातें सुनकर कुछ अटपटा लगना स्वाभाविक है। क्योंकि जो अमर सिंह सपा को मिटाने और मुलायम सिंह को उसकी औकात बताने की धुड़की और धमकी देता है उसकी तरफदारी किस मजबूरी और स्वार्थवष मुलायम सिंह कर रहे हैं। क्या सपा सांसद रेवती रमण सिंह को बचाने के लिए या फिर आगामी यूपी विधानसभा चुनावों में सपा की छवि साफ-सुथरी रखने की कवायद में मुलायम अमर सिंह की तरफदारी कर रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि मुलायम अमर के बहाने कांग्रेस को लपेटने के जुगाड़ में हैं। दाल में कुछ तो काला जरूर है क्योंकि मुलायम के अमर प्रेम के पीछे की कहानी में पेंच और राज से इंकार नहीं किया जा सकता। कोई खास वजह है तभी तो सियासी अखाड़ें के पुराने धुरंधर मुलायम सिंह अपने धुर विरोधी के तरफदारी और हिमायत कर रहे हैं।

गौरतलब है कि 22 जुलाई 2008 को तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार द्वारा आयोजित विश्वास मत के दौरान गैरहाजिर रहने के लिए भाजपा के तीन सांसदों अशोक अर्गल, महावीर भगोरा और फग्गन सिंह कुलस्ते को खरीदने की कयावद शुरू की गई थी। पूर्व एसपी नेता अमर सिंह और कुछ कांग्रेसी नेताओं ने उससे 2008 में मनमोहन सिंह सरकार के विश्वास मत के समर्थन में वोट के लिए कुछ बीजेपी सांसदों से सौदा करने के लिए संपर्क किया था। अमर सिंह के पूर्व सहयोगी संजीव सक्सेना को कुछ सांसदों के यहां रुपये पहुंचाने का आरोप है। सांसदों ने आरोप लगाया था कि उन्हें तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार द्वारा आयोजित विश्वास मत के दौरान गैरहाजिर रहने के लिए पैसे दिए गए थे। इस मामले में तीन साल के बाद भी दिल्ली पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की थी। 15 जुलाई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाते हुए पूछा कि अब तक किसी को हिरासत में लेकर पूछताछ क्यों नहीं की गई। कोर्ट की फटकार के बाद दिल्ली पुलिस ने गजब की फुर्ती दिखाते हुये संजीव सक्सेन और सुहैल हिन्दुस्तानी को गिरफ्तार किया है लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे खिसक रही है राजनीतिक बयानबाजी और माहौल गर्माने लगा है।

पूरे प्रकरण में मुलायम की अमर सिंह की तरफदारी करना ये साफ तौर पर चुगली करता है कि दाल में कुछ काला है। मुलायम अमर सिंह से अपनी पुरानी दोस्ती का फर्ज नहीं निभा रहे हैं बल्कि राजनीतिक नफे-नुकसान और गुणा-भाग को ध्यान में रखकर ही वो अमर सिंह का पक्ष ले रहे हैं। सपा सांसद रेवती रमण सिंह का जांच में नाम आने की भनक लगते ही मुलायम ने अमर के तरफदारी शुरू कर दी। अमर के प्रति सहानुभूति दिखाकर मुलायम ने एक पत्थर से दो निशाने लगाये। मुलायम के बयान की आड़ में रेवती रमण सिंह को कुछ मदद तो मिलेगी ही लेकिन इससे बढ़कर मुलायम ने इस मामले में राजनीति घुसेड़कर राजनीतिक माहौल का श्रीगणेश कर दिया है। असल में मुलायम यूपी में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों में विरोधियों खासकर कांग्रेस के हाथ कोई मुद्दा बैठै बैठाए थमाना नहीं चाहते हैं, और अगर सपा के दामन पर कीचड़ उछलता है तो उसका सीधा फायदा यूपी में कांग्रेस को ही मिलेगा। कांग्रेस को घेरने की नीयत से ही मुलायम ने अमर के पक्ष में बयानबाजी करके अपरोक्ष रूप से कांग्रेस आलाकमान और पीएम को कटघरे में खड़ा किया है।

मुलायम ने मीडिया के सामने कहा कि अमर सिंह के साथ अन्याय हो रहा है। उन्हें संकट में डालने की यह साजिश है और उन्हें मामले में फंसाया जा रहा है। मुलायम ने सवालिया लहजे में कहा , कि हमें (सपा) क्या फायदा था ? क्या समाजवादी पार्टी सरकार में शामिल हो रही थी ? क्या हमें मंत्री पद मिल रहा था ? मुलायम के सवाल चाहे कितने मासूम हो लेकिन उसके अर्थ और निहतार्थ बहुत ही गहरे हैं, कैश फॉर वोट का असल लाभ तो मनमोहन सिंह की सरकार को मिला था ना कि मुलायम सिंह को। पर्दे के पीछे का खेल अमर, मुलायम और कांग्र्रेस आलाकमान बखूबी जानता है। मुलायम ने सोची समझी रणनीति के तहत अमर सिंह के कंधे पर बंदूक रखकर कांग्रेस द्वारा यूपी में बुने जा रहे चुनावी घोंसले में सीधा निशाना साधा हैै, ये आना वाला वक्त ही बताएगा कि मुलायम का ‘अमर’ प्रेम और कांग्रेस पर निशाना कितना असरदार साबित होगा। लेकिन इस सारी बयानबाजी के बीच कोर्ट के आदेश के बाद तीन साल बाद खुली फाइल को शायद एक बार फिर ठंडे बस्ते में डालने की स्क्रिप्ट का प्रथम अध्याय मुलायम सिंह ने लिख दिया है।

Saturday, July 23, 2011

राहुल की ‘नौटंकी’ माया को भारी न पड़ जाए

ये तो लगभग तय हो ही चुका है कि यूपी में विधानसभा चुनाव समय से पूर्व होंगे। राजनीतिक गलियारों और आफिसों में गहमागहमी और चहल-पहल का माहौल बनने लगा है। सभी दलों ने अपने सिपाहसिलारों और सिपाहियों को चुनावी रण की तैयारी के अंतरिम आर्डर जारी कर दिये हैं। जहां बाकी दल चुनाव की तैयारियों में दिन रात एक कर रहे हैं वहीं सूबे की सीएम मायावती अपनी सरकार के दामन लगे दागों को छुड़ाने और डैमेज कंट्रोल की कार्यवाही में लगी हैं। डा0 सचान हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंपकर सरकार पहले ही बैकफुट पर थी, अब राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाले की जांच कैग से कराने की सिफारिश कर एक बार फिर सरकार कटघरे में खड़ी दिखाई दे रही है। दिनों-दिन बिगड़ती कानून व्यवस्था, सिर उठाते किसान आंदोलन, जमीन अधिग्रहण से जुड़े मामलों पर कोर्ट की सख्ती और जमीन वापिसी के आदेश, भ्रष्टाचार और घोटालों में डूबी, दागी मंत्रियों और विधायकों का बोझ ढोती माया सरकार को निर्धारित समय से पूर्व चुनाव करवाने में ही जीत और दुबारा सरकार बनाने की उम्मीद दिखाई दे रही है। लेकिन जिस तरह कांग्रेस के युवराज लगभग हर मोर्च पर माया सरकार को खुली चुनौती दे रहे हैं उससे ये उम्मीद लगाई जा रही है कि कही राहुल की ‘नौटंकी’ मायावती पर भारी न पड़ जाए।

गौरतलब है कि बसपा ने राहुल की पदयात्रा, किसान महापंचायत, और समय-समय पर दलितों के घर जाने, खाना खाने और रात बिताने को ‘नौटंकी’ बताती है। जबकि अंदरूनी बात यह है कि माया इस समय सूबे में दिनों-दिन बढ़ते और लोकप्रिया होते राहुल फैक्टर से परेशन और डरी हुई है। राहुल मिशन 2012 की कड़ी में इन दिनों पूर्वी यूपी के दौरे पर हैं। सिर से पैर तक भ्रष्टाचार में सनी हुई माया सरकार पर राहुल रूक-रूककर घातक और कठोर प्रहार कर रहे हैं उससे सरकार की बड़ी फजीहत हो रही है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में घोटाले के मुद्दों को राहुल ने ही उठाया था और आरटीआई के तहत सरकार से जानकारी मांगी थी। खुद के दामन पर कीचड़ उछलते देख माया ने एनआरएचएम की जांच और आडिट कैग से करवाने का आदेश आनन-फानन जारी कर दिया। असल में माया और लगभग सभी दूसरों दलों ने राहुल को कभी सीरियस तरीके से लिया ही नही। राहुल को बच्चा, मुन्ना और चाकलेट बेबी कहकर सभी उन्हें पालिटिक्स का ट्रैनी समझते रहे। लेकिन मिशन 2012 की सफलता के लिए माया सरकार को हर मौके पर घेरने और सरकार को कटघरे में खड़ा करने से चूके नहीं। भट्ठा पारसौल की घटना ने राहुल के हाथ में एक बड़ा मुद्दा थमा दिया। पुलिस चैकसी और पहरे को धता बताकर जिस तरह राहुल भट्ठा पारसौल किसानों के बीच जा पहंुचे उसने पूरे देश को चैंका दिया। पदयात्रा और अलीगढ़ के नुमाइश मैदान में किसान महापंचायत कर राहुल ने बसपा, रालोद के साथ लगभग सभी विपक्षी दलों को हिला दिया। 2009 के आम चुनावों में राहुल फैक्टर ने ही कांगे्रस को 21 सीटे दिलाई थी बताते चले कि 2004 के चुनावों में कांग्रेस ने 4 सीटें जीती थीं। वहीं राहुल के मिशन 2012 की टीम जिसमें दिग्विजय सिंह, रीता बहुगुणा जोषी, प्रमोद तिवारी, जगदंबिका पाल, बेनी प्रसाद वर्मा, जतिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, पीएल पुनिया और श्रीप्रकाष जायसवाल शमिल हैं, माया सरकार को सत्ता से बेदखल करने में दिन रात एक किये हुए हैं। हो सकता है कल तक सियासी गलियारों में राहुल यूपी में बिग फैक्टर न रहे हो लेकिन आज राहुल फैक्टर माया और अन्य दलों की टेंशन की वजह है।

किसी जमाने में ब्राहाण, दलित और मुस्लिम कांगे्रस का वोट बैंक समझा जाता था, लेकिन प्रदेश में सपा, बसपा और अन्य दलों के उभरने से कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक उसकी बपौती न रहा। ब्राहाण, दलित और मुस्लिम वोट बैंक को टारगेट करके राहुल मिश 2012 को सफल बनाने में जुटे हैं और माया राहुल के हर कदम और चाल को नौटंकी करार देकर अपना भय, चिंता और घबराहट छुपाने का असफल प्रयास कर रही है। आम चुनावों में कांग्रेस को बढ़त दिलाकर राहुल ने जहां वाहवाही बटोरी तो वहीं बिहार विधानसभा चुनावों में उनका कोई असर दिखाई नहीं दिया। समूचे विपक्ष और खासकर बसपा खुद को फ्रंटफुट रखने की चाहे जितनी कोषिश करे लेकिन सच्चाई से मुंह नहीं फेरा जा सकता है। विपक्ष के हमलों, बयानबाजी और आलोचना से बेपरवाह राहुल मिषन 2012 की पगडंडी पर सधे कदमों से चले जा रहे हैं। माया को यह भूलना नहीं चाहिए कि पिछले विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी को भाी पूर्ण बहुमत मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं था। आज माया सरकार के खिलाफ जो माहौल बन रहा है, उसमें राहुल की नौटंकी माया पर भारी भी पड़ सकती है।

Wednesday, July 20, 2011

नवंबर में हो सकते हैं यूपी विधानसभा चुनाव

प्रदेश की दिनों-दिन बदहाल होती कानून व्यवस्था और विपक्षी दलों के हमलों से परेशान मायावती ने इसी साल विधानसभा चुनाव करवाने का मन बना लिया है। सूत्रों की माने तो सरकार ने अंदर ही अंदर इसकी तैयारी भी कर ली है और अगले माह मानसून सत्र के दौरान सरकार यूपी विधानसभा चुनाव की सिफारिष कर सकती है। कहा तो ये जा रहा है कि खुफिया रिपोर्टो के आधार पर सरकार ने निर्धारित समय से छह माह पूर्व ही चुनाव करवाने का मन बनाया है लेकिन असलियत यह है कि भ्रष्टाचार, तीन-तीन सीएमओ की हत्या, रेप की खेप, दलित अत्याचार की बढ़ती घटनाओं, मजदूर, किसान की बदहाली का लंबी होती कहानियों और राहुल गांधी की सक्रियता ने बसपा सुप्रीमों की नींदें उड़ा रखी हैं। वहीं अपने मंत्रियों, विधायकों और पदाधकारियों की हरकतों ने भी माया की मुसीबतों में इजाफा किया है। दिनों-दिन विरोधी माहौल के बढ़ते आभा मंडल से घबराई माया ने इसी साल संभवतः नवंबर माह में चुनाव करवाने का मन बना लिया है। खुफिया रिपोर्टो के अनुसार अगर सरकार निर्धारित समय से पूर्व चुनाव करवा लेती है तो वो दुबारा सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती है। सत्ता के नषे में चूर माया पर आज चहु ओर से मुसीबतों का पहाड़ टूटा हुआ है। सरकार के विरूद्व जनता का गुस्सा और विरोध का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। सत्ता विरोधी वातावरण और विरोधियों की चालों से निपटने के लिए माया ने निर्धारित समय से पूर्व चुनाव करवाने का इरादा कर लिया है, पिछले दिनों राहुल की किसान पंचायत के बाद माया ने पार्टी पदाधिकारियों की मीटिंग के दौरान बसपाईयों को राहुल की काट तो बताई ही थी वहीं चुनाव के लिए कमर कसने का फरमान भी सुनाया था। अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो इसी साल नवंबर में विधानसभा चुनाव का अखाड़ा सज जाएगा।

गौरतलब है कि राहुल गांधी यूपी सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द बने हुए हैं। राहुल के साथ उनकी टीम मिशन 2012 में दिन रात एक किये है। दिग्विजय सिंह, रीता बहुगुणा जोशी, पीएल पुनिया, बेनी प्रसाद वर्मा, जगदम्बिका पाल आदि कांग्रेसी नेता माया सरकार को घेरने का कोई मौका चूकते नहीं हैं। कांग्रेस के अलावा सपा, भाजपा, रालोद और पीस पार्टी भी चुनावी दंगल में कूदने को पूरी तरह से तैयार है। बसपा की तर्ज पर सपा, भाजपा और अन्य दल संभावित उम्मीदवारों की धोषणा आए दिन कर रहे हैं। प्रदेश में छोटे दलों ने एक संयुक्त मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ने का मन बनाया है। रालोद, पीस पार्टी, बीएस4 आदि लगभग दर्जनभर दल मिलकर बड़े दलों की गुणा-भाग ध्वस्त करने की तैयारियों में जुटे हुए हैं। अंदर ही अंदर सबकी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। असल में जिन मुद्दों को मायावती सत्ता के नशे में चूर होकर हल्के में ले रही थी वहीं अब उनकी गले की फांस बनते जा रहे हैं। राहुल को यूपी में बिग फैक्टर ने समझने वाली माया आज सबसे अधिक राहुल से ही भयभीत है। भट्ठा पारसौल की घटना से लेकर अलीगढ़ में किसान पंचायत ने माया को हिला कर रख दिया है। सपा और रालोद भी अंदर ही अंदर यही चाहते हैं कि राहुल फैक्टर के और अधिक ऐक्टिव होने से पूर्व चुनाव उनकी सेहत के मुफीद होगा क्योंकि अगर कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक उसकी ओर रूख करता है तो निश्चित तौर पर दलित, अल्पसंख्यक, पिछड़ी जातियों और किसानों की राजनीति करने वाले कई दलो की दुकानों के षटर डाउन हो जाएंगे वहीं कांग्रेस सोशल इंजीनियरिंग के मुख्य घटक ब्राहाण वोट को भी प्रभावित करने में सक्षम है। ऐसे में सोशल इंजीनियरिंग की हवा से फूले बसपा के हाथी की हवा निकलने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।

मायावती ऊपर से तो कठोर और सख्त दिखाई देती हैं। अपने पहले तीन कार्यकाल में उनकी यही छवि आम जनमानस के दिलों में बसी थी। सूबे की नौकरशाही उनके सामने पड़ने से घबराती थी। अपराधी और काले कामों में लिप्त हाथ यूपी से बाहर अपना ठिकाना ढूंढते थे। लेकिन 2007 में पूर्ण बहुमत के दम पर अपनी सरकार बनाने के बाद से ही माया ने मनमर्जी और तानाशाही का ऐसा राज चलाया कि मानो उन्हें दुबारा जनता के दरबार में हाजिरी लगानी ही नहीं है। पिछले चार सालों में बड़ी से बड़ी मुसीबत को हवा में उड़ाते हुए माया ने मनमाफिक और मुनमुताबिक जो चाहा वो किया। प्रदेश की जनता के खून-पसीने की कमाई के अरबों रूपयों को स्मारकों, पार्कों और मूर्तियों में लगाकर मायावती ने एक तानाशाह की भांति जनता के हक के पैसे को अपनी ख्वाहिशों और निजी लाभ के लिए व्यर्थ गंवा डाला। माया ने सरकार के चार साल के रिपोर्ट कार्ड को खूब तबीयत से सजाया संवारा तो जरूर है लेकिन जमीनी हकीकत किसी से छिपी नहीं है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और प्रशासन के मामले में सरकार हर मोर्च पर असफल रही है। प्रदेष में शराब माफिया का राज है। अपने चेहते ठेकेदारों और माफियाओं को औने-पौने दामों में चीनी और कपड़ा मिले बेचकर माया ने प्रदेश की जनता और श्रमिकों के साथ धोखा किया है। पिछले चार सालों में प्रदेष में माफिया और ठेकेदारों का साम्राज्य स्थापित और मजबूत हुआ है। सरकार का लगभग हर मंत्री, विधायक और बसपा पदाधिकारी परोक्ष या अपरोक्ष रूप से ठेकेदारी और दलाली में लिप्त है। कानून व्यवस्था को बढ़ा चढ़ाकर पेश करने वाली मायावती की पार्टी के कई मंत्री, विधायक और पदाधिकारी सीधे तौर पर अपराधों में लिप्त हैं और जेल की षोभा बढ़ा रहे हैं। प्रदेश में नियम, कानून की सरेआम धज्जिया उड़ाई जा रही है। सूबे के लगभग हर विभाग में सीएम फंड के नाम से खुली वसूली पिछले चार साल से जारी है। महिलाएं, बुजुर्ग, किसान, छात्र, शिक्षक, वकील, कर्मचारी अर्थात समाज का हर वर्ग माया सरकार की ज्यादितयों से परेशान है। कुछ समय पूर्व तक जो लोग ये कहा करते थे कि माया को टक्कर दे पाने की हिम्मत किसी दल में नहीं है आज उनके सुर बदले हुये हैं। अब ये चर्चा आम है कि माया के लिए ये चुनाव आसान नहीं होगा। राजनीतिक गलियारों और आम आदमी के बीच चल रही इन चर्चाओं और जमीन हकीकत से बसपा सुप्रीमों भी अनजान नहीं है, इसलिए स्थिति के बद से बदतर होने से पूर्व ही चुनाव करवाने का दांव चलकर मायावती अपने विरोधियों का धूल चटाने के मंसूबे पका चुकी है।

कांग्रेस आलाकमान के माउथ पीस हैं दिग्विजय

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की बैटरी इन दिनों फुल चार्ज है। अपने विवादित बयानों के लिए मशहूर दिग्विजय कांग्रेस में फिलहाल वहीं भूमिका निभा रहे हैं जो किसी जमाने में अमर सिंह सपा में निभाया करते थे। पूरे एक दशक तक मध्य प्रदेश पर राज करने वाले दिग्गी को धीर, गंभीर स्वभाव और कार्य कुशल नेता समझा जाता है। हिन्दी पट्टी के राज्यों में दिग्गी की अच्छी पकड़ और मान-सम्मान है। यूपी में राहुल के मिशन 2012 को सफल बनाने की मुहिम में जुटे दिग्विजय अपनी छवि और कद भूलकर विवादित बयानबाजी और सड़कछाप हरकतों पर आमादा हैं। सोनिया और राहुल के मुंहलगे दिग्गी कांग्रेस आलाकमान का माउथ पीस बनकर एक सधे हुये तीरअंदाज की भांति चुनावी निशाना साधने में लगे हैं। ऐसे में कभी उनके निशाना पर बाबा रामदेव, कभी अन्ना हजारे और अक्सर आरएसएस आ जाती है। हालिया मुंबई धमाकों में हिंदु संगठनों पर निशाना साधकर दिग्गी एक बार फिर विवादों में घिरे है लेकिन इन सब से बेफ्रिक दिग्गी भोपाल में भाजयुमो के कार्यकर्ताओं के साथ सड़क छाप गुण्डों की भांति हाथा पायी करने पर गर्व महसूस कर रहे हैं। किसी जमाने में धीर-गंभीर दिग्गी की गिनती आज जोकरों और मानसिक रूप से दिवालिये नेता के रूप में होने लगी है। पता नहीं किस स्वार्थवष दिग्गी खुद अपनी छवि धूमिल करने को उतारू हैं। माले गांव बम विस्फोट, 26/11 के मुंबई हमले से ठीक पहले एटीएस चीफ हेंमत करकरे से बातचीत का खुलासा, लादेन के बारे में सम्मानजनक टिप्पणी, बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के खिलाफ तीखी आलोचना एंव धमकी और मुंबई में हालिया सीरियल बम विस्फोट के लिए हिंदु संगठनों के खिलाफ बोलने तक का दिग्गी राजा ने जब-जब अपना मुंह खोला एक नये विवाद को जन्म दिया। दिग्गी किसकी वाणी बोल रहे हैं और वो ऐसा क्यों बोल रहे हैं वो देश के आम आदमी को भी अब समझ आ चुका है।

गौरतलब है कि दिग्गी को यूपी में कांग्रेस को पुर्नजीवित करने की अहम् जिम्मेदारी कांग्रेस आलाकमान ने सौंपी थी उस समय यूपी में कांग्रेस को कोई पुरसाहाल नहीं था। राजनीतिक बनवास भोग रही कांग्रेस को मेन स्ट्रीम में लाने और सुर्खियों में बने रहने के लिए विवादित बयानबाजी का आसान और घटिया रास्ता दिविजय ने अपनाया और काफी हद तक वो इसमें कामयाब भी रहे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने इसमें दिग्गी का बखूबी साथ निभाया और मायावती और बसपा सरकार को निशाने पर रखकर उन्होंने भी विवादित बयानों का रिकार्ड स्थापित किया। जब दिग्गी को ये अहसास होने लगा कि मीडिया और विपक्षी दल उनके बयानों को तवज्जों दे रहे हैं तो उन्होंने अपने बयानों की विवादों की चाशनी में ओर डुबोना शुरू कर दिया। आज यूपी में कांग्रेस अपना परंपरागत वोट बैंक वापिस पाने को बेताब है ऐसे में दिग्विजय सिंह चुनावी रणनीति और कार्ययोजना के तहत ही सूबे के अल्पसंख्यक, दलित और पिछड़ी जातियों की सहानुभूति और वोट बैंक को ध्यान में रखकर जानबूझ कर विवादित बयानबाजी कांग्रेस आलाकमान की षै पर कर रहे हैं। कांग्रेस का निषाना सूबे का मुस्लिम वोट बैंक है जो आज राजनीतिकं दोराहे पर खड़ा है। कांग्रेस को लगता है कि हिंदु संगठनों की निंदा और हिदु आंतकवाद को प्रचारित और स्थापित करके वो मुस्लिम वोट पाने में कामयाब हो जाएगी और दिग्विजय इसी थ्योरी पर काम कर रहे हैं। दुर्दांत आंतकवादी ओसाम बिन लादेन को ‘लादेन जी’ और आजमगढ़ जिले के संजरपुर जाकर कट्टरपंथियों को सहलाना-फुसलाना कांग्रेस की चुनावी फिल्म का ही हिस्सा था।

कांग्रेस आलाकमान को लगता है कि यूपी में उन्हें अपनी खोई हुयी जमीन तभी वापिस मिल पाएगी जब उनका परंपरागत वोट बैंक उनके झण्डे के तले आ जाएगा। गौरतलब है कि मुस्लिम, दलित और पिछड़ी जातिया बरसों-बरस तक कांग्रेस का मजबूत और पक्का वोट बैंक रही हैं। माया की बसपा और मुलायम की सपा ने कांग्रेस के मजबूत किले में सेंध लगाकर उसे कुर्सी की दौड़ से बाहर ही कर दिया था। पिछले आम चुनावों में कांग्रेस को मिली सफलता से उत्साहित होकर कांग्रेस आलाकमान खासकर राहुल ने अपना सारा ध्यान यूपी में लगा रखा है। जिस तरह से राहुल और उनके विश्वस्त मंत्री और नेता यूपी में सक्रिय हैं वो राहुल के मिषन 2012 का ही हिस्सा है। इसी कड़ी में दिग्विजय सिंह राहुल और सोनिया गांधी का माउथपीस बनकर वो सब कुछ अपनी जुबान से उगल रहे हैं जिसकी रचना कांग्रेस के रणनीतिकारों ने यूपी के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर रची है। विवाद बढ़ने और मीडिया के ष्षोर मचाने पर कांग्रेस खुद को दिग्विजय के बयान से अलग कर तो लेती है लेकिन उसे जो कहना होता है वो दिग्विजय के जरिये कहलवाकर मुस्लिमों, दलितों, अल्पसंख्यकों को कदम-कदम पर ये जता देती है कि कांग्रेस ही आपके हक और हकूक के लिए लड़ने वाली अकेली पार्टी है।

देष की सुरक्षा और दूसरे अहम मसलों पर विवादित बयान देकर अगर दिग्गी ये सोचते हैं कि उन्हें राहुल और सोनिया का आषीर्वाद मिलता रहेगा तो वो भयंकर भूल कर रहे हैं क्योंकि राजनीति में रिषतों से अधिक जरूरत का महत्व होता है आज कांग्रेस अपने परंपरागत वोट बैंक को वापिस पाने का बैचेन है उसके लिए उसे दिग्गी जैसे सिरफिरे नेता की जरूरत है और जब जरूरत पूरी हो जाएगी उस दिन दिग्गी को दूध में से मक्खी की तरह बाहर कर दिया जाएगा। हो सकता है ये बात आज दिग्गी को समझ न आए लेकिन इतिहास में दिग्गी जैसे महानुभावों के कई किस्से दर्ज हैं शायद दिग्गी के पास उन किस्सों को पढ़ने की फुर्सत नहीं है। जनता भी कांग्रेस और दिग्विजय के इरादे का बखूबी समझती है सोनिया-राहुल के अंधभक्त और माउथपीस दिग्गी राजा अपनी छवि को खुद ही मिटाने पर उतारू हैं, भगवान उन्हें सदबुद्वि दे।

पुनिया साहब, यूपी के बाहर भी दलित रहते हैं

यूपी के बाराबंकी से कांग्रेसी सांसद एवं पूर्व नौकरशाह पन्ना लाल पुनिया को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष बनाकर केंद्र सरकार ने उनके कंधों पर भारी जिम्मेदारी डाल रखी है। लेकिन एससी आयोग का राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बावजूद पुनिया का सारा ध्यान और राजनीति केवल यूपी में मायावती सरकार को घेरने, यूपी में कांग्रेस की खोई जमीन वापिस पाने तथा दलितों का सच्चा मसीहा बनने के इर्द-गिर्द ही मंडराती है। किसी जमाने में मायावती के सबसे विष्वस्त अफसर रहे पुनिया आज अपनी पुरानी लेडी बॉस की नींद हराम किये हुये हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि पुनिया जिस पद को आसीन हैं उस का कार्यक्षेत्र संपूर्ण भारत है या फिर केवल यूपी। क्यों पुनिया को यूपी से बाहर दलितों पर होने वाले अत्याचार, शोषण, अन्याय की घटनाएं दिखाई नहीं देती हैं। आखिरकर पुनिया एक संवैधानिक पद का निर्वाहन कर रहे हैं ऐसे में उनका एक विशुद्व राजनीतिज्ञ की भांति आचरण गंभीर सवाल पैदा करता है। पुनिया की इस दलित और वोट बैंक की राजनीति के चलते अनुसूचित जाति आयोग का काम काज और गरिमा को ठेस पहुंची है। वहीं पुनिया के यूपी प्रेम और वोट बैंक की ओछी पालिटिक्स के चलते देश भर में दलितों और अनुसूचित जाति से जुड़ी शिकायतों और समस्याओं के प्रभावी निराकरण में अनावश्यक विलंब और परेशानी हो रही है। सही मायनो में पुनिया ने राष्ट्रीय स्तर के आयोग को राजनीति की वहज से एक प्रदेष के सीमित दायरे में बांध दिया है, जिसके चलते देशभर के दलितों और अनुसूचित जाति के लोगों को दुःख-तकलीफ और अन्य अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।


गौरतलब है कि नौकरशाह से राजनेता बने पुनिया का कार्यपालिका और विधायिका दोनों से पुराना नाता रहा है। किसी जमाने में पुनिया की गिनती मायावती के चेहते अफसरों में होती थी। पूर्व में माया सरकार में पुनिया सीएम के मुख्य सचिव की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाया करते थे। पुनिया के पूर्व अनुभव और दलित होना ही उनके लिए मुफीद साबित हुआ और सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने राजनीति का रास्ता चुन लिया। माया और बसपा का तिया-पांचा करने के लिए ही कांग्रेस ने उन्हें अपने कैंप में जगह दी। कांग्रेस की सोच यह थी कि यूपी में माया को टक्कर देने के लिए किसी मजबूत दलित नेता की जरूरत है और पुनिया को पार्टी में उसी खाली स्थान भरने के लिए लाया गया और उन्हें राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष भी बनाया गया। जिस खास मकसद से पुनिया को कांग्रेस में लाया गया था उसमें तो वो कामयाब रहे लेकिन उनके केवल यूपी पर केन्द्रित होने का खामियाजा देश भर में दलित और अनुसूचित जाति सुमदाय के लोग भुगत रहे हैं।

सोनिया और राहुल के विश्वस्त पुनिया कदम-कदम पर यूपी की माया सरकार को घेरने के मौका तलाशते हैं और खुद को मायावती के बाद दलितों का सबसे बड़ा नेता और मसीहा साबित करने में ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। बसपा की बामसेफ की तर्ज पर यूपी में कामसेफ बनाकर पुनिया ने कर्मचारी वर्ग को कांग्रेस के पाले में लानेका सफल दाव चल दिया है। बाबा रामदेव पर तीखे प्रहार करके पुनिया मीडिया में छाये रहने की कला भी बखूबी जानते है और यूपी में अनुसूचित जाति और दलितों पर होने वाले अत्याचार और अन्याय की घटनाओं पर वो व्यक्तिगत दौरे कर त्वरित कार्यवाही करते हैं लेकिन पता नहीं पुनिया साहब को यूपी से बाहर देश के कोने-कोने में आये दिन दलितों और अनुसूचित जाति के साथ होने वाले अत्याचार, अपराध और अन्याय दिखाई क्यों नहीं देते हैं। दूर दराज की बात तो अलग है अभी हाल ही में पंजाब के मुक्तसर जिले की अपर सत्र न्यायाधीश परवीन बाली को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने बिना किसी कारण के पद से हटाकर अनोखी मिसाल देश के सामने पेश की है। एक दलित महिला एवं जज परवीन बाबी ने अपनी लगन, मेहनत और योग्यता के बलबूते सीनियर जुडिशल सर्विस में एससी कोटे में प्रथम व जनरल कोटे में पांचवा स्थान पाकर सिविल जज की नौकरी हासिल की थी। 2008 बेच की इस महिला दलित जज को बिना किसी कारण उसके पद से हटाकर हाई कोर्ट ने देश भर के महिला अधिकारों के लड़ने-भिड़ने वाले संगठनों और देशवासियों का सोचने पर विवष किया है कि आखिरकर कहां हमारा समाज बदला है। पुनिया साहब को इस बात का संज्ञान लेकर इस मामले की छान-बीन करवानी चाहिए और एक प्रतिभावान दलित महिला जज का न्याय और उसका अधिकार दिलवाने के लिए प्रयास करना चाहिए।

पुनिया साहब मूलतः हरियाणा के निवासी हैं ऐसे में उन्हें बखूबी मालूम होगा कि हरियाणा में यूपी से अधिक जाति संघर्ष की घटनाएं होती हैं और वहां पर दलितों के प्रति भेदभाव और हिंसा की घटनाएं यूपी से किसी भी मामले में कम नहीं होती हैं। हरियाणा के मिर्चपुर में दलितों के साथ जो कुछ हुआ था वो पूरे देश की जनता जानती हैं। हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान के अलावा देश के कई अन्य राज्यों में कांग्रेसी सरकारें हैं और वहां भी आये दिन दलितों और अनुसूचित जाति समुदाय पर अत्याचार और अन्याय की खबरें सुनने को मिलती हैं लेकिन पुनिया साहब का सारा ध्यान यूपी और मायावती को घेरने में बीतता है। परवीन बाली तो पढ़ी-लिखी और जज के पद पर आसीन थी तब भी उसे एक दलित और महिला होने का अभिशप झेलना पड़ा। देश में दलितों और अनुसूचित जाति की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अशिक्षित और मूलभूत सुविधाओं और संविधान प्रदत अधिकारों से वंचित है। ऐसे में देश के हजारों गांवों और कस्बों में रहने वाली दलित और अनुसूचित आबादी किस हाल में जी रही होगी का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है। लेकिन हमारे कर्ता-धर्ता शुद्व राजनीति में मस्त हैं। पुनिया साहब को लखनऊ और यूपी के अलावा भी देश के दूसरे राज्यों का भी दौरा करना चाहिए। पुनिया साहब ये माना कि आप कांग्रेस के सांसद हैं और सोनिया राहुल की कृपा से आपको राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष का पद मिला हुआ है लेकिन राजनीति के साथ ही साथ अपने काम और धर्म को मत भूलिए क्योंकि जिस जनता ने आपको वोट देकर इस स्थान पर पहंुचाया है वो आपको आपकी हैसियत भी बता सकती है। इसलिए आपसे निवेदन है कि यूपी ही नहीं देश भर में दलितों और अनुसूचित जाति के कल्याण और भलाई के लिए भी समय निकालिए और सच्चे मन से अपनी बिरादरी और इस देश की जनता का भला करिए।

Thursday, June 30, 2011

माया इसी साल करवा सकती हैं विधानसभा चुनाव

भट्ठा पारसौल की घटना ने यूपी के सियासी पारे को चढ़ा दिया है। जिस तरह यूपी सरकार और कांग्रेस पार्टी में एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है उसने यूपी के सियासी हलकों में हलचल मचा रखी है। यूपी पुलिस के तथाकथित पुख्ता सुरक्षा बंदोबस्त को धता बताकर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी मोटर साइकल से सुबह-सवेरे भट्ठा पारसौल के ग्रामीणों के बीच जा पहंुचने से माया सरकार की जो किरकिरी हुई उसका बयान नहीं किया जा सकता है। लगभग 12 घंटे के सियासी ड्रामे के बाद यूपी पुलिस ने फौरी तौर पर राहुल की गिरफ्तारी दिखाई और कुछ ही घंटों बाद उन्हें दिल्ली बार्डर पर छोड़कर गले में फंसी राहुल नाम की हड्डी से छुटकारा पाया। राहुल ने वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित होकर या फिर किसी अन्य निजी या दलीय स्वार्थ के वशीभूत होकर भट्ठा पारसौल में गांव वालों के बीच वक्त बिताया, उनके दुःख-दर्दे को सुना, समझा और अनुभव किया हो लेकिन एक बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि जब यूपी पुलिस भट्ठा पारसौल के आस-पास दो किलोमीटर के दायरे में चिड़िया को भी उड़ान नहीं भरने दे रही थी तो वहां राहुल गांधी का पहुंचना कोई छोटी घटना नहीं है। अपनी झेंप मिटाने के लिए पहले यूपी सरकार का बयान आया कि भट्ठा पारसौल में रात को ही धारा 144 को हटा लिया गया था लेकिन फिर उसी रात राहुल को उन्हीं धाराओं में बंद करना आखिरकर खिसयानी बिल्ली खंभा नोचने की कहावत को ही सिद्व करता है। किसानों के दुःख-दर्दे और उनके साथ यूपी पुलिस के अमानवीय व्यवहार और बर्बरता का जिक्र राहुल ने भट्ठा पारसौल के किसानों के समूह के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी बताया है और राहुल ने यूपी सरकार पर किसानों की मौत के झूठे आंकड़ें और बर्बरता के फोटो और अन्य सुबूत भी पेश किए हैं। किसान विरोधी विचारधारा और भट्ठा पारसौल में जो कुछ भी माया सरकार और उनके जाबांज अफसरों ने किया उसके लिए पूरे देश भर में  माया सरकार के किसान और जन विरोधी छवि का निर्माण हुआ है। और जिसने भी भट्ठा पारसौल की हकीकत को सुना, देखा या पढ़ा उसने तीखे शब्दों में यूपी सरकार को भला-बुरा जरूर कहा।

भट्ठा पारसौल की घटना ने बैठे-बैठाए विपक्ष को मायावती के खिलाफ एक ठोस व बड़ा मुद्दा थमा दिया है। मायावती ने भी कांग्रेस और विपक्षी दलों पर तीखे वार किए हैं और उन्हें अपने गिरेबां में झांकने की सलाह भी दे डाली। अपनी सरकार के चार साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में मायावती ने प्रदेश के विकास हेतु करोड़ों रूपये की योजनाओं की घोषणा कर विकासमुखी सरकार के दर्शन करवाने की कोशिश तो जरूर की लेकिन भट्ठा पारसौल की घटना मायावती का पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं ले रही है। मायावती को बखूबी ये मालूम है कि विपक्ष उनकी सरकार को सत्ता से बाहर करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। भट्ठा पारसौल की घटना को कांग्रेस ने जोर-षोर से उछाला है और केंद्र से यूपी में राष्ट्रपति शासन की मांग भी की है। केंद्रीय गृहमंत्री पी0 चिदंबरम से लेकर कांग्रेस के यूपी कोटे के केंद्रीय मंत्री और सांसद गाहे-बगाहे यूपी सरकार पर निशाने  साधने से चूकते नहीं है। राहुल गांधी यूपी सरकार और विशेषकर बहन मायावती के सबसे बड़ा सिरदर्द बने हुए हैं। राहुल के साथ उनकी टीम मेम्बर दिग्विजय सिंह, रीता बहुगुणा जोषी, पीएल पुनिया, बेनी प्रसाद वर्मा, जगदम्बिका पाल आदि कांग्रेसी नेता माया सरकार पर तीखे प्रहार करते ही रहते हैं। कांग्रेस के अलावा सपा, भाजपा, रालोद और पीस पार्टी भी चुनावी दंगल में कूदने को पूरी तरह से तैयार है। बसपा की तर्ज पर सपा, कांग्रेस, भाजपा और अन्य दल अभी से संभावित उम्मीदवारों की लगातार धोषणाएं कर रहे हैं। अंदर ही अंदर सब की तैयारी लगभग पूरी हो भी चुकी है। प्रदेश में छोटे दलों ने एक संयुक्त मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ने का मन बनाया है। रालोद, पीस पार्टी, बीएस4 आदि लगभग दर्जनभर दल मिलकर बड़े दलों की गुणा-भाग ध्वस्त करने की तैयारियों में जुटे हुए हैं। मायावती हर काम में मनमर्जी चलाती हैं और जहां उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पाती वहां वो या तो नया कानून बना देती हैं या फिर कानून को ताक पर रखकर मनमानी करने से बाज नहीं आती हैं। प्रदेश में धरना, प्रदर्षन और आंदोलन के लिए कानून बनाकर मायावती ने लोकतंत्र का गला घोंटने की तैयारी की है। इस कानून का व्याप्क तौर पर प्रदेश और देश  में विरोध हो रहा है। विपक्षी दलों के साथ ही साथ जन संगठनों ने इस कानून का भारी विरोध किया है। पंचायत चुनावों में धन और बाहुबल के सहारे बसपा ने अपने चेहतों को खास सीटों पर बिठाया था उसी तर्ज पर मेयर चुनाव की प्रक्रिया में भी परिवर्तन कर अपनों को मेयर की सीट पर बैठाने के सपने देख रही मायावती को राजभवन से झटका उस समय लगा जब राज्यपाल ने संशोधित कानून पर हस्ताक्षर ही नहीं किए। नाराजगी, सिर-फुटौव्वल, गुटबाजी से बचने के लिए पंचायत चुनावों में किसी भी दल ने चुनावी टिकट नहीं दिया था। लेकिन अपरोक्ष रूप से सभी दल अपने उम्मीदवारों का समर्थन और उन्हें जिताने की तिकड़मे भिड़ाते रहे। मायावती चाहती थी कि प्रदेश में निकाय चुनाव बिना पार्टी के चुनाव चिन्ह के हों लेकिन मायावती की इस चालबाजी को उच्च न्यायालय ने रोक लगाकर माया के सपने चकनाचूर कर दिए हैं। असल में माया अपने दल की कमजोरियों को बखूबी जानती और समझती हैं। माया को पता है कि शहरी क्षेत्रों में बसपा के पास कोई बड़ा जनाधार नहीं है ऐसे में निकाय चुनावों में भाजपा, कांग्र्रेस और सपा का पलड़ा ही भारी रहेगा। और अगर निकाय चुनावों का विधानसभा चुनावों का लिटमस टेस्ट मान लिया जाए तो प्रदेश में बसपा के विरूद्व हवा बह सकती है जिससे बसपा को भारी नुकसान होगा। हाई कोर्ट के निर्णय के बाद ही माया ने विधानसभा चुनावों की तैयारियों को और जोर-शोर से शुरू कर दिया। सरकार के चार साल पूरे होने पर आयोजित समारोह में माया ने कार्यकर्ताओं और पार्टी पदाधिकारियों को चुनाव के लिए तैयार रहने का ऐलान कर ही दिया है। माया कोई भी रिस्क नहीं लेना चाहती कि विपक्ष उन पर हावी हो पाए इसलिए संभावना यह व्यक्त की जा रही है कि दिनों दिन प्रदेश में विपक्षी दलों के मुखर विरोध और तीखे हमलों के साथ अपने ही दल के नेताओं, मंत्रियों और विधायको की करतूतों से परेशान मायावती इसी साल अक्टूबर या नवंबर में चुनाव करवाने का मन बना रही हैं।

विपक्ष माया से खार खाए बैठा है और वो कोई भी ऐसा मौका जिससे माया सरकार की बदनामी और किरकरी हो अपने हाथ से छोड़ना नहीं चाहता है। चुनाव होने में अभी एक साल का समय शेष है और इस एक साल में हवा किस तरफ बह जाए किसी को इसका अंदाजा नहीं है। रिवायत के अनुसार जो गद्दी पर होता है दोष भी उसके माथे पर लगता है और जो भी नफा-नुकसान होता है वो उसी के खाते में जाता है। जहां मायवती को गद्दी पर रहते हुए चुनाव लड़ने का फायदा मिलेगा वहीं सरकार ने अपने कार्यकाल में प्रदेश के किसान, गरीब, महिलाओं, पिछड़ों, दलितों और जरूरतमंदों की बेहतरी के लिए जो भी कुछ किया है उसका हिसाब-किताब माया को प्रदेश की जनता को देना होगा। विपक्ष लगातार माया सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाता आ रहा है। सरकार अपने बचाव में चाहे लाख दलीले दे लेकिन दाल में कुछ काला है, कि संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। जिस प्रकार प्रदेश में उधोग-धंधे चौपट हो रहे हैं, निवेशक प्रदेश से मुंह फेर चुके हैं, बेरोजगारी का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है, सरकार सरकारी चीनी मिलों को औने-पौने दामों पर अपने चेहतों को बांट रही है और राजस्व के सबसे बड़े स्त्रोत आबकारी में जो मनमानी, गुण्डागर्दी, खुली लूट और एकछत्र राज चलवाया जा रहा है वो किसी से छिपा नहीं है। प्रदेश में विकास कार्यों के नाम पर जो खुली लूट हो रही है उसका हिसाब माया को चुनाव के समय तो देना ही होगा। वहीं समय रहते बसपा का कुनबा संभालने, व्यवस्थित करने में भी मायावती को कसरत तो करनी ही होगी, वहीं मंत्रियों, नेताओं, विधायकों और मुंहलगे अफसरों की करतूतों पर डैमेज कंट्रोल करना भी कोई आसान बात नहीं है। देखा जाए तो मायावती चारों ओर से घिरी हुई है और पूरा विपक्ष केवल एक ही मकसद अर्थात बसपा सरकार को हटाने के मकसद साथ चुनाव मैदान में उतरेगा।

माया सरकार के काम-काज के पिछले चार साल का रिर्काड देखा जाए तो सरकारी किताबो और फाइलों में चाहे जो भी बड़े-बड़े दावे किए जाएं लेकिन असलियत यह है कि माया ने साल 2007 में गद्दी पर बैठते ही सूबे में पार्कों, स्मारकों, दलित महापुरूषों और खुद अपनी मूर्तियां लगवाने के अलावा कोई नया या अनूठा काम नहीं किया है जिसके उसकी पीठ थपथपाई जा सके। वहीं सरकारी विभागों में बढ़ता भ्रष्टाचार, धांधली, कानून व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति माया सरकार की पेशानी पर बल डालने के लिए काफी है। माया सरकार पर जब भी विकास विरोधी होने के आरोप लगे उसने केंद्र सरकार पर आरोप लगाकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करती ही नजर आई लेकिन हकीकत में उसने काम करने की गंभीर कोशिश की भी नहीं है। लगभग हर मुद्दे पर माया सरकार केंद्र सरकार पर आरोप लगाकर ही अपनी नाकामियों को ढकने का जो नाटक करती रही है उसका खामियाजा भी इन चुनावों में उसे भुगतना होगा। अगर ये मान भी लिया जाए कि केंद्र ने प्रदेश के विकास हेतु वांछित धनराशी नहीं भेजी है लेकिन जो भी धन केंद्र से प्रदेश सरकार को प्राप्त हुआ है अगर उसी को ईमानदारी से विकास कार्यों में लगाया जाता तो प्रदेश की सूरत में बदलाव आ सकता था। मानाकि प्रदेश बड़ा है और समस्याएं भी कम नहीं है लेकिन छोटे-छोटे कदमों और प्रयासों से ही बड़े-बड़े कामों को अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है। लेकिन माया सरकार का हर कदम और बयान राजनीति से प्रेरित होता है ऐसे में सरकार और सरकारी अमला दिल खोलकर सरकारी खजाने को लूट रहा है और जनता को दिखाने के लिए माया केंद्र सरकार पर यूपी की अपेक्षा का रटा-रटाया आरोप लगाकर अपना पल्ला आसानी से झाड़ लेती हैं। जो इक्का-दुक्का भले काम माया के शासन में हुए भी हैं उन्हें सरकारी मशीनरी ठीक तरह से प्रचारित ही नहीं कर पाई और जनता के बीच विपक्षी दलों का एक ही मैसेज गया कि मायावती का सारा ध्यान मूर्तियों, पार्कों और स्मारकों में ही लगा है। वहीं मायावती ने पिछले चार सालों में प्रदेश के आम आदमी से रूबरू होने की कोई नीति या कवायद ही नहीं कि माया केा उनके चेहते अफसरों और मंत्रियों ने जो समझा दिया माया ने आंख मूँद  कर उसे सत्य माना लेकिन कुर्सी के आगे पीछे चक्कर लगाने वाले अफसर सत्ता बदलते ही गिरगिट की भांति रंग बदल लेते हैं। ऐसे में जनता की नाराजगी का सीधा नुकसान माया को ही भुगतना होगा उनके चेहते अफसरों को नहीं ऐसे में आम आदमी से माया की दूरी उनके लिए बड़ा सिरदर्द बनेगी। मार्च माह के प्रदेष दौरों के दौरान मायावती को कई स्थानों पर जनता की नारजगी का सामना करना पड़ा था। वहीं प्रदेश में बढ़ते अपराध, दलितों के साथ बढ़ते अत्याचार, बलात्कार और महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों का ग्राफ मायावती के लिए चिंता का बड़ा कारण है। वही विपक्ष चुनावी बेला में माया सरकार के एक दर्जन से अधिक दागी मंत्रियों और विधायकों का मुद्दा भी जोर-शोर से उछालेगा।

प्रदेश में तय समय से चुनाव होने में अभी लगभग एक साल का समय शेष  है लेकिन विपक्ष के तीखे तेवरों और हमलों से बिलबिलाई और झुंझलाई मायावती ये कभी नहीं चाहेगी कि विपक्ष को बैठे-ठाले उनकी सरकार को घेरने के मुद्दे मिल जाए। अभी लगभग सभी दल निकाय चुनावों की तैयारियों में जुटे हुए हैं क्यों कि निकाय चुनाव के नतीजे आगामी विधानसभा चुनावों पर व्यापक असर डालेंगे वहीं अभी हाल ही में पांच प्रदेषों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे भी यूपी की सियासत पर खासा असर डाल सकते हैं। वहीं दल बदल की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। अभी हाल ही में बाराबंकी जिले के प्रभावशाली  बसपा नेता फरीद महफूज किदवाई ने बसपा छोड़ अपने पुराने समाजवादी परिवार में शामिल हो गए हैं। किदवाई का सपा में जाना बसपा के लिए भारी झटका है। किदवाई की भांति दूसरे कई विधायक भी चुनावी बेला में बसपा का दामन छोड़ कर किसी और का दामन थाम लें तो क्यों अचरज की बात नहीं होगी। वहीं एक ही महीने में बसपा की दो विधायकों शेखर तिवारी को इंजीनियर मनोज गुप्ता और विधायक आनंद सेन को शशि  हत्याकांड में हुई उम्रकैद की सजा ने भी बसपा की छवि को गहरा धक्का लगाया है। वहीं राजधानी लखनऊ में दो-दो सीएमओ की हत्याओं ने बिगड़ती कानून व्यवस्था, सरकारी महकमों में व्यापत भ्रष्टाचार और ठेकेदार, नेताओं और अफसरों की मिलीभगत का खोल कर रख दिया है। वर्तमान विधानसभा में बसपा के 226, सपा के 87, भाजपा के 48, कांग्रेस के 20, रालोद के 10, राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी के 1 और 9 निर्दलिय विधायक हैं। संख्या के हिसाब से तो बसपा का पलड़ा भारी लगता है लेकिन माया के इन चार सालों के कार्यकाल में जो कुछ भी हुआ है वो बसपा के खिलाफ ही जाता है। इन हालातों में माया जितनी देरी करेंगी उनके मुसीबतों में लगातार इजाफा होता जाएगा और विपक्ष को उन्हें घेरने काफी समय मिलेगा। ऐसे में माया समय से पहले चुनाव करवा सकती हैं। सूबे में जो सियासी हवाएं बह रही हैं उनसे समय से पहले चुनाव होने की खुशबू आ रही है।

Tuesday, May 24, 2011

माया सरकार की दोमुंही नीति

भट्ठा पारसौल की घटना ने माया सरकार की दोमुंही नीति को सारे देश  के सामने उजागर कर दिया है। मार्च महीने में जाट आरक्षण की मांग कर रहे आंदोलनकारियों को खुली छूट देने वाली माया सरकार जब भट्ठा पारसौल के आंदोलनकारी किसानों पर गोली चलवाती है तो यूपी सरकार की दोमुंही और जनविरोधी नीति का कुरूप चेहरा पूरे देष के सामने बेपर्दा हो जाता है। वैसे भी माया राज में सरकार और नौकरशाह कानून, मानवाधिकार और जनपक्ष से जुड़े मुद्दों को जूते की नोक पर ही रखते हैं। और बहन मायावती का हर कदम और बयान विशुद्ध रूप से वोट बैंक और राजनीतिक गुणा-भाग से प्रेरित और संचालित होता है। भट्ठा पारसौल के किसान जमीन के बदले मिलने वाले सरकारी मुआवजे को बढ़ाने की मांग के लिए आंदोलनरत थे। किसानों की जायज मांगों और आंदोलन का प्रशासन लंबे समय से अनसुना और अनदेखा कर रहा था। आखिरकर अपनी मांगे पूरी न होती देख किसानों ने प्रशासन तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए रोडवेज के तीन कर्मचारियों को बंधक बना लिया। जिला प्रशासन को जैसे ही रोडवेज के कर्मचारियों के बंधक बनाए जाने की खबर लगी, वैसे ही एक झटके में सारा प्रशासनिकक अमला जाग उठा। प्रशासन ने किसान नेताओं से वार्ता और समझौते की जरूरी और प्राथमिक कार्रवाई से पहले किसानों पर लाठियां और गोलियां चलाकर दादागिरी और निकम्मेपन का जो उदाहरण पेश  किया वो किसी भी लोकतान्त्रिक देश  के लिए शर्मनाक घटना है। प्रशासन के रवैये से क्षुब्ध किसानों ने भी जवाबी कार्रवाई की जिसमें दोनों पक्षों को जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा। असल में देखा जाए तो जो भी हुआ उसकी निंदा होनी चाहिए। क्योंकि कानून को हाथ में लेने की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती है। किसानों ने अपनी बात को प्रशासन  तक पहंुचाने के लिए कर्मचारियों को बंधक बनाने का जो रास्ता चुना वो भी सरासर गलत और गैर-कानूनी था और जो नंगा नाच और तांडव पुलिस-प्रशासन ने किया वो भी घोर निंदनीय है। लेकिन इन हालातों में एक अहम सवाल यह उठता है कि आखिरकर समय रहते पुलिस-प्रशासन ने किसानों की बातों को समझने और सुलझाने के प्रयास क्यों नहीं किए। अगर स्थानीय प्रशासन समस्या हल कर पाने में असमर्थ था तो उसे उच्च अधिकारियों से दिशा-निर्देश  प्राप्त करने चाहिए थे। आखिरकर ऐसे हालात किसने बनाए और किसने किसानों को अपहरणकर्ता बनने के लिए मजबूर किया। प्रशासन  को समय रहते नागरिकों की समस्या की ओर उचित ध्यान देना चाहिए। भट्ठा पारसौल की घटना विशुद्ध रूप से प्रशासनिक  अक्षमता, अकर्मण्यता, गैर-जिम्मेदाराना रवैया और निकम्मेपन की ही उपज है। क्यों कि जनता से अधिक प्रशासन को जिम्मेदार, संयमी, अनुशासित, गंभीर और समझदारी दिखाने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन माया सरकार में लगभग सारा सरकारी अमला कानून को रबड़ की गेंद की भांति उछालने में आनंद अुनभव करता है। जनता की समस्याओं और दुःखों से किसी को कोई लेना देना नहीं है। राजनीतिक नफे-नुकसान को ध्यान में रखकर और अपने राजनीतिक आकाओं का इशारा  पाकर ही यूपी में सरकारी मशीनरी काम करती है। ऐसे में जनहित और लोक कल्याण से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक हानि-लाभ के आंकलन के बाद ही कार्रवाई किए जाने की परंपरा बन चुकी है।

भट्ठा पारसौल से पूर्व आगरा, मथुरा, इलाहाबाद और लखनऊ में भी किसानों और प्रशासन  के मध्य कई घटनाएं घट चुकी हैं। प्रदेश में जहां-जहां भी विकास के नाम पर जमीन अधिग्रहण हो रहा है वहां किसान और प्रशासन  आमने-सामने खड़े हो रहे हैं। असल समस्या भूमि अधिग्रहण कानून से लेकर प्रशासनिक अनुभवहीनता की है। कारपोरेट, ठेकेदार, गुण्डों और माफियाओं के हाथों बिकी सरकार को पैसा कमाने की इतनी जल्दी है कि विकास के नाम पर धड़ाधड़ खेती वाली जमीनों का अधिग्रहण सरकारी एजेंसियां कर रही है। माया सरकार में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। सरकार को जिस मुद्दे पर व्यक्तिगत तौर पर नफा नजर आता है, उस मसले पर सरकार गंभीर दिखाई देती है, अन्य मसलों पर सरकार और सरकारी मशीनरी सुस्त और विरक्त ही रहती है। जाट आरक्षण ने पूरे रेल यातायात, यात्रियों और आम आदमी के जीवन को बुरी तरह से प्रभावित किया था। यूपी से होकर निकलने वाली दर्जनों ट्रेनों को रद्द करना पड़ा। होली के त्योहार के कारण पूर्वांचल और देश  के अन्य हिस्सों में रहने वाले लाखों लोगो की घर जाने की ख्वाहिश इस बार अधूरी रह गई क्योंकि आंदोलनकारी जाट रेलवे के ट्रेकों पर कब्जा जमाए थे। होली के त्योहार की जो रौनक यूपी, बिहार और आस-पास के प्रदेशों में होती है वो किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में माया सरकार की उदासीनता और प्रदर्शनकारियों को मनमानी करने की छूट देना ये दर्शाता है कि माया सरकार को आम आदमी की चिंता नहीं है। जाट आंदोलकारियों को माया सरकार का खुला सन्देश था कि जो मन में आए वो करो क्योंकि जाट आरक्षण की आंच कांग्रेस और रालोद का राजनीतिक समीकरण बिगाड़ सकती थी, बसपा और माया सरकार से उसे कोई नुकसान नहीं होना था। माया सरकार और उसके जाबांज अफसरों को आम आदमी के दुःख-पीड़ा, होली का त्योहार ,मरने-जीने और रेलवे को हुए करोड़ों के नुकसान से कोई लेना-देना नहीं है। क्योंकि जब समस्याओं और मांगों को राजनीतिक चश्मे से देखा जाएगा तो जनहित से जुड़े मुद्दे, मसले और समस्याएं कैसे हल होंगी। हाई कोर्ट के सख्त रवैये के बाद जाट आंदोलनकारियों को रेल ट्रेक से हटाने की सुस्त और मरियल कार्रवाई माया सरकार ने की तो थी लेकिन तब तक लाखों-करोड़ों के राजस्व का नुकसान और लाखों लोगों का होली का त्योहार खराब हो चुका था।

कदम-कदम पर माया सरकार की दोमुंही नीतियां स्पष्ट दिखाई देती हैं। मेरठ में यांत्रिक कारखानों के खिलाफ आमरण अनषन पर बैठे जैन मुनि श्री मैत्रि सागर को जिस तरह सरकारी मशीनरी ने अनषन से जर्बदस्ती उठाया और बारह घंटे नजरबंद बनाए रखा वो सरकार की कथनी और करनी में अंतर को स्पष्ट उजागर करती है। जैन मुनि की मांग सिर्फ इतनी थी कि सरकार यांत्रिक बूचड़खानों पर रोक लगाए, लेकिन लोकहित और जन समस्या से जुड़े मुद्दे का स्थायी या ठोस हल निकालने की बजाए प्रषासन अनषन तुडवाने के कुत्सित प्रयासों में लगा रहा। अगर कोई संत या देश का आम आदमी चिल्ला-चिल्लाकर अपनी समस्या या मांग प्रषासन के सामने रखता है तो सरकारी अमला उसकी बात को गंभीरता से सुनने की बजाए फौरी कार्रवाई करने में अधिक दिलचस्पी दिखाता है। मेरठ में बूचड़खानों की काली और अवैध कमाई के पीछे सत्ता पक्ष से जुड़े नेताओं का खुला हाथ और संरक्षण है। इसलिए सरकारी अमला जायज मांग को भी सिरे से खारिज करने में परहेज नहीं करता है। देखा जाए तो जनससमयाओं और मांगों के पीछे कहीं न कहीं राजनीतिक दखलअंदाजी से लेकर प्रशासन की अदूरदर्शिता, निकम्मापन और लेट लतीफी स्पष्ट झलकती है। मायावती सरकार में तार्किक क्षमता का अभाव है। माया अपने विरोधियों को तार्किक या ठोस जवाब देने  की जगह कानूनी डंडे और ताकत का सहारा लेने में अधिक यकीन रखती है। तभी तो सरकारी मशीनरी विरोधी दलों के नेताआंे को जूते से मसलने और अहिंसक प्रदर्शनकारियों पर डंडे और गोलियां चलाने से भी परहेज नहीं करती है।

जब बात माया सरकार के हितों और वोट बैंक की आती है वहां सरकार त्वरित कार्रवाई करने से चूकती नहीं है। लखनऊ के सीएमओ हत्याकांड से लेकर शीलू बलात्कार कांड तक माया सरकार की त्वरित कार्रवाई किसी से छिपी नहीं है। सीएमओ हत्याकांड में तो मांयावती ने अपने दो-दो चहेते मंत्रियों की बलि लेने में कोई संकोच नहीं किया। क्योंकि माया हर चीज और हालात से समझौता कर सकती हैं लेकिन उन्हें ये कतई बर्दाश्त नहीं है कि कोई उनके वोट बैंक में सेंध लगाए या उनकी कुर्सी खिसकाने का प्रयास करे। कुर्सी बचाने के लिए मायावती किसी भी हद तक जा सकती हैं और कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने में परहेज नहीं करती हैं। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि माया का हर कदम राजनीति और विरोधियों को धूल चटाने की मंशा से ही उठता है। प्रदेश में आए दिन होने वाले विरोधी दलों और संगठनों के मुखर विरोध को बंद करने के लिए ही माया सरकार ने प्रदेश में धरना, प्रदर्शन और आंदोलन के लिए कानून बना डाला है। अब प्रदेश  में होने वाले किसी भी धरने, प्रदर्शन  और आंदोलन के लिए प्रशासन से अनुमति लेना जरूरी है। अनुमति की प्रक्रिया को जान बूझकर पेचीदा और जटिल बनाया गया है ताकि कोई न कोई बहाना बनाकर विरोध के स्वर को दबाया और कुचला जा सके।

भट्ठा पारसौल और जाट आरक्षण के मुद्दों पर माया सरकार द्वारा की गई कार्रवाई सरकार की नीति और नीयत का खुला बयान करती है कि सरकार की हर कवायद वोट बैंक को बचाए रखने या फिर अपने विरोधियों को धूल चटाने से प्रेरित होती है। 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद से ही माया ने प्रदेश  के आम आदमी से दूरी बना रखी है। माया के शासन  में जनता से मिलने का कोई कार्यक्रम या एजेंडा नहीं है। पूर्व सरकारों में जनता दर्शन  के माध्यम से मुख्यमंत्री प्रदेश की जनता से रूबरू होते थे और उनकी समस्याआंे को सुनते और सुलझाते थे। पिछले चार साल के कार्यकाल में मायावती ने दो-चार रैलियों के अलावा जनता से मिलने की कोई कवायद नहीं की। मार्च माह में प्रदेश के जनपदों के दौरों पर निकली माया को जगह-जगह जनता के विरोध का सामना करना पड़ा। सर्वजन की बात करने वाली सरकार ने सर्व जन को घरों में बंधक बनाकर सीएम के दौरों को पूरा करवाया था।

अगर जनता को कोई दुःख-दर्दे या तकलीफ है तो वो अपने नेता के पास ही तो जाएगी। लेकिन माया सरकार में एक अदने से बाबू से मिलने में आपको लाले लग जाएंगे ऐसे में सीएम तक अपनी बात पहंुच पाना तो आसमान छूने के बराबर है। सरकार अपने चार सालों के कार्यकाल की चाहे जो भी उपलब्ध्यिां गिनाएं लेकिन एक बात स्वीकार करनी होगी कि इन चार सालों में प्रदेश  की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हुई है। विकास के नाम पर स्मारक, पार्क और मूर्तियां ही लगी है। प्रदेष में उधोग-धंधे चौपट हो चुके हैं। कानून व्यवस्था बेदम साबित हो रही है और मायावती केवल अपने विरोधियों को धूल चटाने के लिए कानून और रणनीतियां बनाने में मशगूल है। वक्त रहते माया को प्रदेश के आम आदमी, किसान और मजदूर की आवाज को सुनना होगा और उनकी समस्याआंें को हल करने की व्यवस्था करनी होगी क्योंकि लोकतंत्र में लोक ही असली राजा होता है। जब जनता पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का 34 साल पुराना किला ढह सकती है तो जनता बसपा का किला भी ढहाने उतनी ही सक्षम है।