Thursday, December 15, 2011

आम आदमी को गुस्सा क्यों नहीं आता?

देश के युवा सांसद और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को आम आदमी की बदहाली गुस्सा आता है, भाजपा की फायर ब्रांड नेता उमा भारती रिटेल सेक्टर में एफडीआई पर सरकार के निर्णय से इतनी गुस्सा हो जाती हैं कि वो अपने हाथों वालमॉर्ट के स्टोर में आग लगाने की बात करती हैं, ऐसे में प्रतिक्रिया स्वरूप यह सवाल उठता है कि राहुल गाधीं, उमा भारती और तमाम दूसरे नेताओं को जिस आम आदमी की बदहाली और दुर्दशा पर गुस्सा आता है, आखिरकर खुद उस आम आदमी को अपनी बदहाली पर गुस्सा क्यों नहीं आता है?

गौरतलब है कि नेता के कर्मां का कुफल ही देशवासी गुजरे छह दशकों से भोग रहे हैं, और उस पर तुर्रा यह है कि गुस्सा भी उन्हीं नेतोओं को ही आ रहा है। देश की जनता का ध्यान मुख्य समस्याओं और अपने कुकर्मों से बंटाने के लिए नेता जनता को भाषा, धर्म, जात, बिरादरी और दूसरे तमाम तरह के मसलों में उलझाए रखने की साजिषें रचने वाले तथाकथित नेता और प्रतिनिधि अपने कर्मों पर शर्मिन्दा होने की बजाए गुस्से का नाटक कर आम आदमी से क्रूर मजाक ही तो कर रहे हैं।

असल में ये सवाल तो जनता की ओर से उछलना चाहिए था लेकिन राजनीति ने आम आदमी से उसका ये सवाल भी बड़ी चालाकी से छीन लिया। देश का आम आदमी आजादी के 64 सालों बाद भी षिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, सड़क, स्वच्छ पेयजल और षौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। आजादी से अब तक अगर घोटालों, कांडों और सरकारी खजाने की लूट का हिसाब जोड़ा जाए तो उतने पैसे से सुविधासंपन्न और विकसित एक नया भारत बसाया जा सकता था, लेकिन विडबंना यह है कि इस देश में भुखमरी, बदहाली, शोषण का शिकार जो वर्ग है उसे पिछले 64 सालों एकाध बार ही हल्का-फुल्का गुस्सा आया है। और इस पर भी गुस्सा आने का अभिनय वो जमात कर रही है जो जनता की बदहाली, भुखमरी और विकास को जाम करने की असली गुनाहगार है।
आखिरकर आम आदमी को गुस्सा क्यों नहीं आता है, ये सवाल सोचने पर मजबूर करता है। क्या जनता इन हालातों से समझौता कर बदहाली में जीने के आदी हो चुकी हैं? क्या वर्तमान हालातों को जनता अपनी नियति मान बैठी हैं? क्या हमारे मन में यह धारणा गहरे पैठ चुकी हैं कि शक्तिषाली सत्ता के समक्ष हम कमजोर, अक्षम और बौने हैं? क्या हम यह समझने लगे हैं कि संविधान ने वोट देने के अलावा कोई दूसरी बड़ी ताकत या अधिकार हमे नहीं दिया है? क्या हम यह मान बैठे हैं कि हम इस कुटिल, भ्रष्ट और चालाक व्यवस्था से जीत नहीं पाएंगे? क्या हम यह मानने लगे हैं कि हमारे चिल्लाने, धरना-प्रदर्शन और विरोध का कुछ भी असर बेशर्म और मोटी चमड़ी वाली व्यवस्था पर नहीं होगा? क्या हमें यह लगता है कि हम अपने चुने हुए प्रतिनिधियों, तथाकथित नेताओं और मंत्रियों से कुछ पूछने के हकदार नहीं हैं? कहीं न कहीं कुछ न कुछ समस्या तो जरूर है जो इतनी दुर्गति और बदहाली के बाद भी जनता चुप है और उसे सरकार की बेशर्मी, बेईमानी और जनविरोधी नीतियों पर गलती से भी गुस्सा नहीं आता है।

आजादी के पूर्व हम जिन आदर्शों की बात करते थे, आजादी के बाद उनका पालन करन तो दूर उन्हें भुला ही बैठे। मूल्यों के क्षरण के चरण की शुरूआत ने राजनीति का अपराधीकरण या यूं कहें कि अपराध का राजनीतिकरण कर दिया। जनतंत्र माखौल बनकर रह गया। जनतंत्र में जनता ही सबसे अधिक उपेक्षित हो गई। जनहितों की अनेदेखी की जाने लगी एवं नौकरषाही लालफीताषाही बढ़ती गई। आजादी के बाद सबसे बड़ी त्रासदी यह रही कि हमने औपनिवेषिक कानूनों-कायदों के ढांचे का अनुसरण किया, उसे जनता पर लादा। बदले हालातों एवं जरूरतों के हिसाब से कानून-कायदों का भारतीय माडल तैयार नहीं किया गया।  यानी सूरत तो बदली, मगर सीरत नहीं। भारतीय पुलिस का बर्बर चेहरा हुकूमत-ए-बर्तानिया की पुलिस को भी मात दे रहा है। विधायिका, न्यायापालिका और कार्यपालिका ने मिलकर देश में ऐसा वातावरण बना दिया है कि देश का आम आदमी सरकार और सरकारी मषीनरी के सामने अपने अधिकारों और बुनियादी सुविधाओं के लिए ऐड़िया घिसटता दिखाई देता हैं। चुनाव के समय मुंह दिखाने के बाद अगले पांच साल तक नेता ये जानने की जहमत नहीं उठाते हैं कि जिस जनता की वोट से वो इतने ताकतवर बने है वो जनता किस हाल में जीवन बसर कर रही है।

सरकारी कागजों में विकास के आंकड़ें और सुनहरे सपने साकार होने के करीब हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इतनी भयावह और विषम है कि जिसे देख-सुनकर आपका कलेजा बैठ जाएगा। आजादी के बाद इस देश के आम आदमी को आष्वासनों के लालीपॉप के अलावा कुछ खास हासिल नहीं हुआ है। गांव, किसान और खेतीबाड़ी की दुर्दषा किसी से छिपी नहीं है। मजदूर दो जून की रोटी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। खेती-बाड़ी के प्रति सरकार की उदासीनता से किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं और बेरोजगार जुर्म और जरायम की दुनिया की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। महिलाओं के प्रति अपराध, हिंसा, भू्रण हत्या का पारा ऊपर चढ़ता दिख रहा है। लेकिन तमाम परेषानियों और समस्याओं के बाद देश की जनता की चुप्पी और अपनी बदहाली पर गुस्सा न करना ये सोचने को मजबूर करता है कि आखिरकर देश की जनता को गुस्सा क्यों नहीं आता है ?

वहीं आजादी से लेकर आज तक आम आदमी के दुःख-दर्दे और समस्याओं को खुद जनता बजाए राजनीतिक दलों ने अपने वोट बैंक की मजबूती, राजनीतिक गुणा-भाग और विरोधियों को घेरने के लिए एक हथियार की तरह प्रयोग किया। असल बात यह है कि जनता को खुद-ब-खुद अपनी बदहाली तब तक पता नहीं चलती जब तक कोई नेता, पत्रकार य समाजसेवी उसे उसके बारे में नही बताता। जन लोकपाल बिल, भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ अन्ना और रामदेव की पहल ने बरसों से सो रही जनता को जगाने का नेक काम किया, लेकिन कोई कब तक हमें हमारे ही दुख-दर्दे और बदहाली के बारे में बताएगा। असलियत यह है कि देश का आम आदमी मंहगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से त्रस्त है। तस्वीर का सुंदर स्वरूप तभी सामने आएगा जब जनता खुद सरकार की गलत, जन और देश विरोधी नीतियों और निर्णयों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करेगी, उसी दिन लोकतंत्र की वास्तविक संकल्पना और अवधारणा साकार होगी।

पत्तों को मत झाड़िए, जड़ को उखाड़िये

प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया को आचार संहिता के फंदे में फंसा चुकी सरकार अब सोशल नेटवर्किंग साइटस पर लगाम लगाने की कवायद में जुट गई है। सरकार ये प्रचार कर रही है कि इन सोशल नेटवर्किंग साइटस पर धार्मिक संप्रदायों और महापुरूषों का अपमान होता है। ऊपरी तौर पर सरकार की पहल साफ-सुथरी और नेक नीयत में लिपटी दिखाई देती है, लेकिन अगर सरकारी पहल के भीतर अगर थोड़ा झांका जाए तो सारी कहानी आसानी से समझ आ जाएगी। सरकार की जो कोशिश है वह पत्तों को झाड़कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाने की है जबकि भ्रष्टाचार और कुशासन की जड़ पर वार करने से वह बचना चाहती है।
कीबोर्ड और अँगुलियों के तालमेल से भयभीत सरकार ने गूगल, फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट और याहू के अधिकारियों से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और मोहम्मद पैगंबर से जुड़ी कथित अपमानजनक, गलत और भड़काने वाली सामग्रियों को हटाने के लिए कहा था। सूचना मंत्री कपिल सिब्बल ने याहू, गूगल और फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटस चलाने वाली कंपनियों के अधिकारियों से इस बारे में बात की, लेकिन उनकी ओर से कहा गया कि जब तक इस बारे में अदालत का कोई फैसला नहीं आता, वो इस बारे में कुछ नहीं कर सकते। कंपनियों के रूखे व्यवहार और टके से जबाव से तिलमिलाई सरकार सोशल नेटवर्किगं साइट्स की पेशबंदी करने पर उतर आई है।

गौरतलब है कि पिछले लगभग दो वर्षों से सोशल नेटवर्किंग साइटस पर यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर जिस तरह से छींटाकशीं, कमेंटस और बयानबाजी हो रही है, उससे तिलमिलाई और घबराई सरकार धर्म की ओट लेकर आम आदमी की आवाज को बंद करने की साजिश रच रही है। यूपीए-2 के दो साल के कार्यकाल में मंहगाई ने सारी हदें पार कर रखी हैं, भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है, सरकारी योजनाओं में मची लूट जगजाहिर है। आम आदमी की आवाज और परेशानियों को देश-दुनिया के सामने रखने वाला मीडिया नियम-कानून और धंधे में फंसकर सर्कस का शेर बनकर रह गया है। परिणामस्वरूप सरकार की जनविरोधी नीतियों और निर्णयों से गुस्साए, परेशान और झुंझलाए देशवासी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपनी भड़ास और गुस्से का खुलकर इजहार करते हैं। सोशल नेटवर्किंग साइटस सोशल मीडिया का बड़ा सशक्त माध्यम बनकर उभरा है, और लगातार इसके यूजर में बढोतरी हो रही है। वर्तमान में भारत में ढाई करोड़ लोग फेसबुक और लगभग दस करोड़ गूगल से जुड़े हैं।

पिछले कुछ वर्षों में गूगल, याहू, फेसबुक आदि तमाम सोशल नेटवर्किंग साइटस सोशल मीडिया का सशक्त माध्यम बनकर उभरी हैं। अन्ना के आंदोलन हो या फिर देश और जनहित से जुड़े तमाम दूसरे मुद्दों को देश-दुनिया के सामने का काम ये साइटस बखूबी कर रही हैं। 1200 नौजवानों का एक सर्वे इस बात की तस्दीक कर रहा है कि भ्रष्टाचार से कारगरण लड़ाई में सोशल मीडिया कारगर हथियार हो सकता है। इस सर्वे में शामिल नौजवानों में 78 प्रतिशत लोगों ने माना है कि सोशल मीडिया ने उन्हें मजबूत किया है।  देश का आम आदमी अपनी आवाज और भावनाओं को इन सोशल नेटवर्किंग साइटस के माध्यम से देश-दुनिया के सामने आसानी से पहुंचाता है। अन्ना के आंदोलन और प्रदर्शन को सफल बनाने में इन सोशल साइटस ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भ्रष्टाचार, मंहगाई, घोटालों और तमाम दूसरी समस्याओं के विरोध में देशवासी खुलकर इन सोशल साइटस का इस्तेमाल करते हैं। सरकार धार्मिक भावनाएं भड़काने और आहत करने की आड़ में आम आदमी की आवाज को बंद करना की साजिश रच रही है। यूपीए सरकार की कुनीतियों, भ्रष्टाचार, मंहगाई और घोटालों से त्रस्त और गुस्साई जनता ने अपनी भड़ास निकालने के लिए इन सोशल नेटवर्किंग साइटस का जमकर प्रयोग किया है। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के अलावा तमाम दूसरे नेताओं और मंत्रियों की छीछालेदार और भद्द इन सोशल साइटस पर पिट रही है। सरकारी विज्ञापन और तमाम दूसरी सुविधाओं के लिए प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया अपने नफा-नुकसान के गुणाभाग को देखकर ही सरकार की आलोचना या विरोध करता है। देश की जनता को मीडिया की हकीकत बखूबी मालूम है, ऐसे में ब्लागिंग से लेकर सोशल नेटवर्किंग साइटस के द्वारा देश की जनता अपनी भावनाएं प्रदर्शित करने के लिए करती है।

सोशल नेटवर्किंग साइटस की बढ़ती लोकप्रियता और आजादी सरकार को रास नहीं आ रही है। इसलिए धर्म की आड़ में सरकार अपनी प्रति बढ़ती नाराजगी, विरोध और आलोचना को रोकना चाहती है। इसी साल 11 अप्रैल को सरकार ने ‘इनफारमेशन टेक्नोलॉजी; इलेक्ट्रानिक सर्विस डिलेवरी रूल्स-2011’ की राजज्ञा जारी की थी। इस कानून में साफ तौर पर लिखा है कि विद्वेषपूर्ण, आपत्तिजनक, जुआ जैसे खेलों को प्रोत्साहन देने वाले, नग्न, बाल यौन षोशण, आपत्तिजनक टिप्पिणयों को नियत्रिंत करने की जिम्मेदारी कतिपय साइट के प्रशासक की होगी। लगभग सात महीने पूर्व बने इस कानून के बाद भी अगर सरकार किसी गाइडलाइन और आचार संहिता लागू करने की बात करती है तो ये सरकार की नीति और नीयत की पोल खोलती है।

सच्चाई यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें अपने राजनीतिक नफा-नुकसान को ध्यान में रखकर राज-काज चलाती हैं। राजनीतिक दलों के रवैये और व्यवहार से देश के बड़े तबके में नारजगी व्याप्त है। आम आदमी के दुख-दर्दे और परेशानियों को सरकार और अहम पदों पर आसीन महानुभावों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी लोकतंत्र का चौथा खंभा प्रेस निभाता रहा है, लेकिन दिनों-दिन व्यवासायिकता का चोला ओढ़ने और कारपोरेट कल्चर का शिकार मीडिया जनपक्षकार की भूमिका निभाने की बजाए सरकारी भोंपू बनता जा रहा है। वोट बैंक की घटिया और ओछी राजनीति के चलते लगभग सभी राजनीतिक दल अनाप-शनाप निर्णय, नीतियों और योजनाओं में आम आदमी के हक और हकूक के पैसे का जमकर दुरूपयोग करते हैं। सरकारी कुनीतियों के विरोध में जब आम आदमी सड़कों पर उतरता है तो उसका सामना पुलिस के लाठी-डंडों से होता है। जनलोकपाल बिल पर अन्ना और काले धन के खिलाफ रामदेव की मुहिम को दबाने के लिए सरकार और सरकारी मशीनरी ने सारे हथकंडे अपनाए थे। यूपी की मुख्यमंत्री मायावती ने अपनी सरकार के विरोध में उठने वाली आवाज को दबाने के लिए सूबे में धरना, प्रदर्शन और जुलूस के आयोजन के लिए कानून बनाकर अपने प्रजातांत्रिक मंसूबे का खुलासा कर दिया है।

असलियत यह है कि सरकार अपने विरोध में उठने वाली आवाज की सच्चाई और वजह जानने की बजाए उसे दबाने का हर संभव प्रयास और हथकंडा अपना रही है। सामान्य स्थितियों और हालात में किसी के मुंह से अपशब्द निकलना संभव नहीं है। जब देश का आम आदमी सरकार के खिलाफ अपना विरोध, प्रदर्शन, बयानबाजी और गुस्सा प्रगट कर रहा है तो इसका सीधा अर्थ है कि देश के हालात सामान्य और परिस्थितियां ठीक नहीं हैं। आवेश और भावनाओं में बहकर सीमा और मर्यादा का उल्लंघन आम बात है लेकिन अगर देश की जनता खासकर पढ़ा-लिखा तबका लगातार सरकार, उसके नुमांइदों और उनकी कार्यप्रणाली पर छींटाकषी, बयानबाजी और नाराजगी जाहिर कर रहा है तो सरकार को स्वयं सोचना चाहिए कि आखिरकर क्या गलत हो रहा है। लेकिन विडंबना यह है कि सरकार जड़ का इलाज करने की बजाए पत्तों पर दवा का छिड़काव करके बीमारी का इलाज करना चाहती है।

लोकतंत्र में अपनी आवाज रखने का अधिकार हर नागरिक को है, और जब देश के नागरिक मर्यादा में रहकर अपनी बात सरकार के समक्ष रखते हैं तो प्रजातंत्र रूपी संस्था की सफलता और सार्थकता सिद्व होती है। लेकिन जनविरोधी नीतियों, भ्रष्टाचार और अड़ियल रवैये पर तुली सरकार अपनी कमियों, खामियों और भूलों को सुधारने की बजाए उनकी ओर इशारा करने और कुनीतियों के खिलाफ मुंह खोलने वालों का मुंह बंद करने पर आमादा है। देश की जनता धीरे-धीरे ही सही राजनीतिक दलों और नेताओं की हकीकत समझने लगी है, नेताओं को भी इसका बखूबी एहसास है, ऐसे में बेहतर होगा कि सरकार जन भावनाओं को समझे। अभी तो ये गनीमत है कि बहुत से लोगों का गुस्सा सिर्फ इस आभासी दुनिया में निकल रहा है, सरकार की पाबंदियों से कहीं यह गुस्सा-यह विरोध वास्तव में सड़कों पर आ गया तो हालात बेकाबू हो जाएंगे? सरकार को अपने विरोध में उठने वाली आवाजों को बंद करने की बजाए उन पर उचित ध्यान देना चाहिए, इसी में देश, प्रजातंत्र और जनता की भलाई है। 

Friday, September 23, 2011

भ्रष्टाचार के कीचड़ में रथयात्रा का कमल

बीजेपी के सीनियर लीडर लाल कृष्ण आडवाणी एक बार फिर रथ यात्रा का ऐलान किया है। इस बार मुद्दा भ्रष्टाचार है। अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई से जोश में आये आडवाणी ने भी भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए देश भर में जनजागरण और यूपीए सरकार की काली करतूतों का भंडा फोड़ने की पूरी तैयारी में हैं। आडवाणी इससे पूर्व पांच रथ यात्राएं कर पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने का काम कर चुके हैं। अगले साल पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर आडवाणी की रथ यात्रा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन कर्नाटक और उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते बीजेपी को मुख्यमंत्रियों को बदलना पड़ा, वहीं पंजाब में उसके सहयोगी अकाली दल द्वारा दुर्दांत आंतकवादी की फांसी की सजा माफ करवाने की मांग, झारखण्ड में शिबु सोरेन की भ्रष्ट सरकार को समर्थन देकर बीजेपी खुद कटघरे में खड़ी है, ऐसे में आडवाणी की रथयात्रा क्या रंग लाएगी ये तो आने वाला समय ही बताएगा।

राजनीतिक दृष्टि से कांग्रेस की हालत इस समय अत्यधिक नाजुक है। जो कारनामा पूरा विपक्ष मिल कर नहीं कर पाया उस काम को 12 दिन के अनशन में अन्ना ने कर दिखाया। सोनिया की गैरमौजूदगी में राहुल के हाथों में सरकार की कमान थी। लेकिन राहुल और उनके करीबी मंत्रियों ने अन्ना के अनशन को जिस लड़कपन और बचकाने तरीके से निपटा है, उससे देश भर में ये मैसेज गया कि कांग्रेस का हाथ भ्रष्टाचार के साथ है। सिविल सोसायटी के मांगों पर संसद ने सम्मति देकर ऐतिहासिक काम किया है, लेकिन इसका श्रेय भी कांग्रेस के खाते में जाने की बजाय सब दलों में बराबर बंट गया। अन्ना के अनशन ने बैठे-ठाले विपक्ष खास कर बीजेपी को केन्द्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने का सुनहरा अवसर दे दिया है।

वक्त की नजाकत भांपते हुये आडवाणी ने भ्रष्टाचार के विरूद्व अलख जगाने के लिए रथ यात्रा का विकल्प चुनकर सीधे-सीधे कांग्रेस नीत यूपीए सरकार पर हमला बोलने का फाॅर्मूला ढूंढ लिया है। आडवाणी चाहते है कि अन्ना ने अनशन के दौरान कांगे्रेस की जो निगेटिव छवि का निर्माण देश की जनता के बीच हुआ है वो मुद्दा आगामी आम चुनावों तक जनता को याद रहना चाहिए। आडवाणाी ने रथ यात्रा का ऐलान करके एक पत्थर से दो निषाने लगाए हैं। रथ यात्रा से वो कांग्रेस की असलियत देष की जनता को बताकर बीजेपी के जनमत तैयार करेंगे ही वहीं उन्होंने अपनी पार्टी में भी ये मैसेज दे दिया है कि आगामी आम चुनावों में एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए वो सषक्त उम्मीदवार हैं।

असल में बीजेपी पर जब-जब संकट आया है तब आडवाणी ने रथ यात्रा के द्वारा पार्टी की डूबती नैया को पार लगाया है। ये अलग बात है कि फसल आडवाणी ने लगाई और कटाई के समय अटल बिहारी वाजपेयी सामने आ गये। लबोलुआब यह है कि आडवाणी को उनकी मेहनत का फल नहीं मिल पाया। देखा जाए तो पिछले आम चुनावों में पार्टी का जनाधार घटा है। राज्यों में भी बीजेपी की हालत पतली ही है। देष की राजनीतिक राजधानी उत्तर प्रदेष में बीजेपी हाषिये पर खड़ी है। जिन राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं वहां गुटबाजी, अंदरूनी राजनीति और उठा-पटक रूकने का नाम नहीं ले रही है।आडवाणी ने रथ यात्रा का ऐलान तो कर दिया है लेकिन ख्ुाद उनकी पार्टी के पूर्व सांसद नोट फाॅर वोट मामले में तिहाड़ में बंद हैं। कर्नाटक और उत्तराखण्ड में बीजेपी को भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते मुख्यमंत्रियों को बदलना पड़ा। और जिन राज्यों में बीजेपी की गठबंधन की सरकार है वहां भी भ्रष्टाचार की आवाजेें सुनाई देती रहती हैं। पार्टी की सीनियर और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज पर कर्नाटक के खनन माफिया रेड्डी बंधुओं से सांठ गंाठ के आरोप सरेआम लग रहे हैं। जब बीजेपी के दामन पर खुद भ्रष्टाचार के दाग लगे हुए हैं तो आडवाणी किस
मुंह से इसके खिलाफ मुंह खोलेंगे, और कांग्रेस पर निशाने लगाएंगे ये देखना होगा।

आडवाणी को उम्मीद है कि रथ यात्रा के साथ अगर भ्रष्टाचार को जोड़ दिया जाए तो उसका तोड़ किसी के पास नहीं होगा। ऊपरी तौर पर आडवाणी की रथ यात्रा का मकसद साफ-सुथरा और देश हित में लगता है लेकिन असल में रथ यात्रा की आड़ में आडवाणी विशुद्व राजनीति के अलावा कुछ और करेंगे इसकी उम्मीद न के बराबर है। आडवाणी कोई समाज सेवक तो है नहीं जो बिना किसी स्वार्थ के देश और दुनिया को बचाने के लिये रथ यात्रा करे, उनका असली निशाना 2014 के आम चुनाव हैं। अन्ना ने देश भर में जो एंटी कांग्रेस माहौल बनाया है उस पर ऊपर नीचे पलीता लगाने का काम आडवाणी करेंगे।

नब्बे के दशक में जब आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली थी तो तब देश में अलग तरह की हवाएं बह रही थी। पिछले दो दशकों में देश की जनता ने अनेक नेताओं की कई काली करतूतों को बहुत नजदीक से देखा और जाना है। जो जनता कभी मंदिर मस्जिद के लिए एक-दूजे का कत्ल करने पर आमादा थी। उसी जनता ने बाबरी मस्जिद के फैंसले के दिन जो समझदारी दिखाई उसकी जितनी तारीफ की जाए वो कम है। पिछले एक दशक में नेताओं की छवि जनता की नजर में बद से बदतर हुई है। राजनीति के हमाम में सभी नंगे है, इस बात का खुलासा हो चुका है। रही सही कसर अन्ना के अनशन ने पूरी कर दी। जन लोकपाल बिल के दौरान हर छोटे बड़े राजनीतिक दल का चेहरा और चरित्र देश की जनता के सामने आ गया। ऐसे माहौल में आडवाणी का भ्रष्टाचार के खिलाफ रथ यात्रा पर निकलना पहले से ही खस्तहाल बीजेपी की हालत को कहीं और खराब न कर दे।

शायद आडवाणी इस मुगालते में हैं कि देश में एंटी कांग्रेस हवा का फायदा भाजपा को मिलेगा। लेकिन वो इस बात को भूल जाते हैं कि जन लोकपाल बिल पर जो स्टैंड कांग्रेस व दूसरे दलों का था, वहीं स्टैंड बीजेपी का भी था। मजबूरी के चलते सरकार और विपक्षी दलों को सिविल सोसायटी की बात मानी थी। ये अलग बात है कि केंद्र में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार है ऐसे में सारे किये धरे का ठीकरा कांग्रेस के माथे ही फूटेगा लेकिन कम या ज्यादा असर सभी राजनीतिक दलों को भुगतना पड़ेगा इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है। जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है वहां कांग्रेसियों और दूसरे राज्यों में जो पार्टियां शासन का सुख भोग रही है, उनके नाक के नीचे पलने और पनपने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ भी जनता का गुस्सा फूटना लाजिमी है। ऐसे में आडवाणी का कांग्रेस की ओर उंगुली उठाने सेे एक उंगुली उनकी ओर भी अपने आप उठ जाएगी। इस रथयात्रा से पूर्व उपप्रधानमंत्री आडवाणी रामजन्मभूमि, जनादेश, स्वर्ण जयंती, भार उदय और भारत सुरक्षा यात्रा निकाल चुके हैं। अन्ना की हुंकार और हठ से जोश में आए आडवाणी ने रथ यात्रा का फैंसला ले तो लिया है लेकिन जिस मकसद से आडवाणी रथ यात्रा पर निकल रहे हैं उसका पूरा हो पाने की संभावना न के बराबर हैं। कहीं ऐसा न हो कि आडवाणी की रथयात्रा उनके राजनीतिक यात्रा के ताबूत में आखिरी कील साबित हो।

Thursday, July 28, 2011

इमली बांध बाबा मंदिर

भारत भूमि को प्रांरभ से ही देवभूमि होने का गौरव प्राप्त है। शायद ही कोई ऐसा प्रदेश हो जहां ऋषि-मुनियों की चरणरज न पहुंची हो। समय-समय पर साधु-संतों ने संतप्त मानवता को सत्य शिक्षा व ज्ञान प्रदान कर शीतलता प्रदान की। इसी अनवरत श्रृंखला में उ0प्र0 की राजधानी लखनऊ के ग्रामीण अंचल में स्थित इमली बांध बाबा मंदिर जनपदवासियों के लिए अपार श्रद्वा का केंद्र है। जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर लखनऊ-फैजाबाद मुख्य मार्ग पर पूर्वोत्तर दिशा में ये पवित्र स्थल अवस्थित है। चिनहट ब्लाक के गांव उत्तरधौना के मजरे तारापुरवा में ये मंदिर आता है।

गांव के बुजुर्गों के अनुसार बाबा बैसवारा (सिसोदिया वंषज) ठाकुर थे। बाबा मूल रूप से जनपद रायबरेली (डोडियाखेड़ा) के रहने वाले थे। नवाबी शासन काल में बाबा व ठाकुर बिरादरी के काफी लोग जनपद रायबरेली से राजधानी लखनऊ स्थानातंरित हो गए थे। बाबा के वंशजों ने ही जनपद लखनऊ का गांव उत्तरधौना, पपनामऊ व जनपद बाराबंकी का गांव बस्ती हरौड़ी बसाया था। बाबा जन्म से ठाकुर व कर्म से ब्राहाण थे। इंदिरा नहर पर बांध निर्माण के दौरान कई अड़चनें आ रही थी तब एक स्थानीय ग्रामीण के कहने पर ठेकेदार ने बाबा के स्थान पर मन्नौती मांगी । कहते हैं कि उस दिन के बाद से बांध का कार्य निर्बाध रूप से चला व मन्नत के अनुसार ठेकेदार ने बाबा का चबूतरा व षिव मंदिर का निर्माण करवाया। पूर्व में यहां इमली का बांध बना था व पूरे इलाके में इमली के पेड़ों का घना जंगल था इसलिए मंदिर का नामकरण इमली बांध बाबा मंदिर हो गया। बाबा का वास्तविक नाम क्या था किसी भी बुजुर्ग को इसकी जानकारी नहीं है लेकिन बाबा के चमत्कारों के किस्से यहां-छोटे बड़े सबकी जुबान पर हैं।

मंदिर खुले व विशाल प्रांगण में निर्मित है। चारों ओर फैली हरी वनस्पति सबको अपनी ओर बरबस ही आकर्षित कर लेती है। चबूतरे पर सफेद संगमरमर की शिला पर बाबा का काल्पनिक चित्र अंकित है। बाबा का कोई चित्र उपलब्ध नहीं है किसी भक्त ने अपनी कल्पना से बाबा का चित्र संगमरमर की शिला पर अंकित करवा दिया था। पहले इस स्थान पर इमली का वृक्ष था। वर्तमान में यहां पर बरगद, पीपल व नीम का वृक्ष है। बाबा का चित्र किसी के पास उपलब्ध नहीं है। मंदिर में छोटी-बड़ी सैंकड़ों घण्टियां बंधी हैं जो भक्तों की आस्था व विशस का प्रतीक हैं। बाबा के मंदिर के आगे दायीं ओर सुंदर यज्ञषाला निर्मित है। यज्ञशाला से आगे हनुमान जी, शंकरजी का मंदिर स्थित है। मंदिर श्रृंखला में आगे मां दुर्गा का मंदिर निर्माणाधीन है। भव्य प्राकृतिक वातावरण में घिरा मंदिर खुले विशाल प्रांगण में स्थित है। मंदिर प्रांगण में पेड़-पौधों की भरमार है। जो मंदिर क्षेत्र को अद्भुत सुशमा प्रदान करते हैं। मंदिर के पार्शव में तालाब है जो कि इमली बांध बाबा का तालाब के नाम से प्रसिद्व है। पहले इस तालाब में भरपूर पानी रहता था पवित्र सरोवर में स्नान कर भक्त बाबा के दर्शन करते थे। वर्तमान में तालाब सूख चुका है।

बाबा के मंदिर के सामने शिवाला व हनुमान जी का प्राचीन मंदिर स्थित है। दोनों मंदिर ठेकेदार के बनवाये हुए हैं। मंदिर के साथ पुजारी जी का कमरा बना है। भक्तों व यात्रियों की सुविधा हेतु मंदिर परिसर में रैन बसेरा निर्मित है। मंदिर की कोई प्रबंध समिति नहीं है मंदिर की व्यवस्था आस-पास के गांव की पंचायतें मिलकर सामूहिक रूप से करती हैं।

आस-पास के क्षेत्रों में मंदिर की बड़ी मान्यता है। भक्तों का विश्वास है कि बाबा के दरबार से आज तक कोई निराश नहीं लौटा है। मंदिर की चारों दिशाओं में उत्तरधौना, धांवा, सेमरा, पपनामऊ व अनौराकलां गांव बसे हैं। पूरे जंमार के गांवों में जब भी कोई नई बहू आती है तो वो पहली बार खाना बनाकर बाबा को भोग लगाती है तदुपरांत उसका आगमन पूर्ण माना जाता है। ये परंपरा बरसों से पूरे इलाके में प्रचलित है। ग्रामीणों के अनुसार स्थानीय तारापुरवा के बालक राम व छत्तौना के राधे बाबा ने मन्नत पूरी होने पर अपनी जीभ ही काटकर बाबा पर चढ़ा दी थी। अगली सुबह उनकी जीभ पूर्ववत हो गई। बाबा के दरबार से सैकड़ों निःसंतानों को संतान का फल मिला।

स्थानीय ग्रामीण जानवर के बच्चा व दूध न देने पर बाबा के यहां मन्नत मांगते हैं और मन्नत पूरी होने पर मंदिर में श्रद्वा से दूध चढ़ाते हैं। प्रथा के अनुसार आस-पास के गांव की लड़कियां अपने बच्चों का मुण्डन बाबा के स्थान पर ही करती हैं। मंदिर की देखभाल बाबा शोभादास व रामसजीवन दास करते हैं। बाबा रामसजीवनदास सतनामी अखाड़े के महान संत बाबा जगजीवन राम जी के चेले हैं।

हर महीने की पूर्णिमा को मंदिर परिसर में भारी मेला लगता है। सप्ताह के प्रत्येक सोम व शुक्रवार को मन्नौती मांगने व भेंट चढ़ाने वालों की लंबी कतारें लगती हैं। आषाढ़ व कार्तिक माह की पूर्णिमा में मंदिर में विषेष पूजा-अर्चना व भण्डारे का प्रबंध होता है। ग्रामीण क्षेत्र में स्थित ये देव स्थल प्रशासन की उपेक्षा के कारण विकसित नहीं हो पाया है। मुख्य मार्ग से लगभग डेढ किलोमीटर की दूरी पर मंदिर स्थित है। मंदिर का संपर्क मार्ग अर्ध निर्मित है। वर्षा ऋतु में पानी भर जाने से भक्तों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है।

Wednesday, July 27, 2011

बहन जी को चढ़ी है खुमारी और चैनलों की है तैयारी

नोएडा एक्सटेंशन के गांव हैबतपुर, बिसरख, इटैडा, घघोला, रोजा याकुबपुर, देवला के अलावा बादौली, घोड़ीबछेड़ा, कोडली बागर, सलारपुर खादर के किसानों की याचिका पर सुनवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट मंे मंगलवार को होगी। इन गांवों के किसानों के वकीलों का कहना है कि तीन गांवों पर फैसला सुनाए जाने की संभावना ज्यादा है। ये हैं रोजा याकुबपुर, देवला और एक्सप्रेस-वे से सटा बादौली गांव। मंगलवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट से निकलने वाले निर्णय पर नोएडा एक्सटंेंशन का भविष्य काफी हद तक निर्भर करता है, सुनवाई से कई दिन पहले ही न्यूज चैनलों और मीडिया के लिए नोएडा एक्सटेंशन में जमीन अधिग्रहण का मसला ‘हाॅट केक’ बना हुआ है। लगभग संपूर्ण मीडिया इस मुद्दे की लाइव कवरेज, किसान पंचायत, निवेशकों के मांगों और प्रदर्शन के साथ ही साथ किसानों की पंचायत लगाकर मसले को विस्तार से समझाने और सरकार पर दबाव बनाने और किसानों को उनका हक और अधिकार दिलाने की कोशिश में रात-दिन एक किये है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि किसान, बिल्डर और नोएडा एक्सटेशन में सपनों के घर का सपना संजोए लोगों की हाहाकार और मांगों पर ध्यान देने की बजाय यूपी सरकार मदमस्त हाथी की भांति आराम फरमा रही है। नोएडा एक्सटेंशन में जमीन से जुड़ी समस्याओं और किसान-पुलिस संघर्ष की गाथा किसी से छिपी नहीं है बावजूद इसके सरकार मुद्दे को उलझाने और कानूनी तौर अपना पक्ष मजबूत करने में व्यस्त है। सरकार इस मुद्दे को जितना हल्का करके ले रही है उतना ये मुद्दा असल मंे है नहीं। ऊपरी तौर पर ये मसला किसानों से जुड़ा दिखाई देता है लेकिन आज इसमें बिल्डर और निवेशक भी शामिल हो चुके हैं। जो समस्या किसी समय सैंकड़ों किसानों से जुड़ी थी आज वो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर लाखों लोगों को प्रभावित कर रही है। लेकिन माया सरकार के भ्रष्ट, सुस्त, कामचोर और कमीशनखोर अफसर और कर्मचारी कानों में तेल डाले बैठे हैं और सूबे की जनता दर-दर भटकने और आंदोलन करने को विवश है।

गौरतलब है कि पिछले एक दशक में नोएडा और नोएडा एक्सटेंशन में विकास और उलूल-जलूल बहाने बनाकर यूपी सरकार ने किसानों से उनकी उपजाऊ जमीन को हड़पने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक अनुमान के अनुसार पिछले एक दशक में सरकार ने कुल 85 हजार एकड़ जमीन सरकार ने किसानों से अधिग्रहीत की। नोएडा में 1976 से 1997 के बीच जिन 11 गांवों की जमीन पुरानी अधिग्रहण पॉलिसी के तहत अधिग्रहीत की गई थी, वहां के किसानों ने सोमवार को एमपी सुरेंद्र सिंह नागर और चेयरमैन नोएडा अथॉरिटी बलविंदर कुमार से मुलाकात कर अपनी छह प्रमुख मांगें रखीं। किसानों का कहना है कि उन्हें भी पांच प्रतिशत जमीन दी जाए। हरौला, निठारी, चैड़ा सादतपुर, अट्टा, छलेरा बांगर, मोरना, नयाबांस, झुंडपुरा, रघुनाथपुर, गिझौड़, आगाहपुर व बरौला गांव के किसान शामिल थे। शाहबेरी और पतवाड़ी गांव के किसानों के हक में फैसला आने के बाद दूसरे गांव के किसानों के दिल में भी ये उम्मीद जगी है कि कोर्ट उनके हक में फैसला सुनाएगा।

पूरे मामले में किसान, निवेशक और बिल्डर ही इधर-उधर भटकते और बयानबाजी करते नजर आ रहे हैं लेकिन सरकार पूरे सीन से गायब है लेकिन लोकतंत्र के चैथे स्तंभ प्रेस ने किसानों और निवेशकों के हक और हकूक की लड़ाई का बीड़ा उठा रखा है। नोएडा जल रहा है और सरकार आराम फरमा रही है। असल में भट्ठा पारसौल में किसानों और पुलिस के बीच हुयी गोलीबारी और लूटपाट ने माया सरकार को कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं छोड़ा है। कांग्रेस युवराज राहुल गांधी ने भट्ठा पारसौल के किसानों की समस्या और दुख-दर्दे का साथी बनकर माया सरकार को कदम कदम पर घेरने की कारगार रणनीति से माया सरकार पर किसान विरोधी होने की मुहर लगा दी। बची खुची कसर राहुल की पदयात्रा और अलीगढ़ के नुमाइश मैदान में आयोजित किसान महापंचायत ने पूरी कर डाली। पूरे प्रकरण पर गौर किया जाय तो भट्ठा पारसौल में पुलिस-प्रशासन का तांडव माया सरकार के ताबूत में आखिरी कील तो नहीं लेकिन किसान विरोधी साबित जरूर कर गया। राहुल की पदयात्रा और किसान पंचायत से घबराई माया समय से पूर्व चुनाव करवाने की तैयारी तो कर ही रही है वहीं शाहबेरी और पतवाड़ी के किसानों के हक में फैसला आने के बाद सरकार ने इस मुद्दे पर मुंह ने खोलने की शायद कसम खा ली है। विधानसभा चुनावों के मद्देनजर मायावती ये नहीं चाहती है कि सरकारी बयानबाजी और कार्यवाही से विपक्षियों को बैठे-ठाले कोई मुद्दा मिले। वहीं पिछले दो तीन महीनों सरकार की जो किसान विरोधी छवि बनी है, अभी सरकार उसी के डैमेज कंट्रोल पूरा नहीं कर पाई है। ऐसे में जब राहुल गांधी, अजीत सिंह और मुलायम सूबे में पूरी तरह से सक्रिय है ऐसे में किसानों से जुड़े मसलों पर बयानबाजी करके सरकार किसी पचड़े मेें पड़ना नहीं चाहती। सरकार को मालूम है कि कानून दाव पेंच में उलझाकर ही इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन बलविंदर कुमार वकीलों की लंबी चैड़ी फौज के साथ इलाहाबाद में डटे हैं। फैसला चाहे किसी के पक्ष में आये यूपी सरकार फिलहाल इस मामले में हाथ डालने से बच रही है क्योंकि माया नहीं चाहती है कि चुनावों से पहले फिर से किसान आंदोलन की आग में भड़के और सरकार को चुनावों में किसानों, निवेशकों के गुस्से का खामियाजा उठाना पड़े। देखा जाए तो जो जिम्मेदारी सरकार और जिम्मेदार ओहदों पर बैठे लोगों को निभानी चाहिए थी वो डयूटी मीडिया निभा रहा है। अगर माया ये सोच रही है कि उनके आंखें मूंदने से समस्या टल जाएगी तो वो खुशफहमी का शिकार हैं, जिसका खामियाजा उन्हें आगामी चुनावों में भुगतना होगा।

Tuesday, July 26, 2011

‘अमर’ के लिए ही क्यों होता है मुलायम के दिल में ‘कुछ-कुछ’

कैश फॉर वोट कांड में जिस तरह नित नए खुलासे हो रहे हैं उसमें बड़े-बड़ों के दामन पर छींटे पड़ते दिखाई दे रहे हैं। कोर्ट की फटकार के बाद आखिकर तीन साल बाद दिल्ली पुलिस ने इस मामले में संजीव सक्सेना और सुहैल हिंदुस्तानी को गिरफ्तार किया है। संजीव और सुहैल से मिली जानकारी के बाद समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव राज्यसभा सांसद अमर सिंह से दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रंाच ने पूछताछ की। अमर सिंह से पूछताछ में के आधार पर धीरे धीरे जांच का दायरा फैलता जा रहा है। सपा सांसद रेवती रमण सिंह और कांग्रेसी नेता अहमद पटेल का नाम भी सामने आ रहा है। लेकिन इन तमाम बातों के बीच सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह के दिल में अपनी पार्टी के पूर्व महासचिव अमर सिंह के लिए एकाएक जागा प्रेम कुछ ओर ही संकेत करता है। क्योंकि राजनीति में हर बयान में गूढ़ अर्थ और स्वार्थ छिपा होता है ऐसे में मुलायम सिंह की मुख से अमर सिंह के लिए ‘मुलायम’ बातें सुनकर कुछ अटपटा लगना स्वाभाविक है। क्योंकि जो अमर सिंह सपा को मिटाने और मुलायम सिंह को उसकी औकात बताने की धुड़की और धमकी देता है उसकी तरफदारी किस मजबूरी और स्वार्थवष मुलायम सिंह कर रहे हैं। क्या सपा सांसद रेवती रमण सिंह को बचाने के लिए या फिर आगामी यूपी विधानसभा चुनावों में सपा की छवि साफ-सुथरी रखने की कवायद में मुलायम अमर सिंह की तरफदारी कर रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि मुलायम अमर के बहाने कांग्रेस को लपेटने के जुगाड़ में हैं। दाल में कुछ तो काला जरूर है क्योंकि मुलायम के अमर प्रेम के पीछे की कहानी में पेंच और राज से इंकार नहीं किया जा सकता। कोई खास वजह है तभी तो सियासी अखाड़ें के पुराने धुरंधर मुलायम सिंह अपने धुर विरोधी के तरफदारी और हिमायत कर रहे हैं।

गौरतलब है कि 22 जुलाई 2008 को तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार द्वारा आयोजित विश्वास मत के दौरान गैरहाजिर रहने के लिए भाजपा के तीन सांसदों अशोक अर्गल, महावीर भगोरा और फग्गन सिंह कुलस्ते को खरीदने की कयावद शुरू की गई थी। पूर्व एसपी नेता अमर सिंह और कुछ कांग्रेसी नेताओं ने उससे 2008 में मनमोहन सिंह सरकार के विश्वास मत के समर्थन में वोट के लिए कुछ बीजेपी सांसदों से सौदा करने के लिए संपर्क किया था। अमर सिंह के पूर्व सहयोगी संजीव सक्सेना को कुछ सांसदों के यहां रुपये पहुंचाने का आरोप है। सांसदों ने आरोप लगाया था कि उन्हें तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार द्वारा आयोजित विश्वास मत के दौरान गैरहाजिर रहने के लिए पैसे दिए गए थे। इस मामले में तीन साल के बाद भी दिल्ली पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की थी। 15 जुलाई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाते हुए पूछा कि अब तक किसी को हिरासत में लेकर पूछताछ क्यों नहीं की गई। कोर्ट की फटकार के बाद दिल्ली पुलिस ने गजब की फुर्ती दिखाते हुये संजीव सक्सेन और सुहैल हिन्दुस्तानी को गिरफ्तार किया है लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे खिसक रही है राजनीतिक बयानबाजी और माहौल गर्माने लगा है।

पूरे प्रकरण में मुलायम की अमर सिंह की तरफदारी करना ये साफ तौर पर चुगली करता है कि दाल में कुछ काला है। मुलायम अमर सिंह से अपनी पुरानी दोस्ती का फर्ज नहीं निभा रहे हैं बल्कि राजनीतिक नफे-नुकसान और गुणा-भाग को ध्यान में रखकर ही वो अमर सिंह का पक्ष ले रहे हैं। सपा सांसद रेवती रमण सिंह का जांच में नाम आने की भनक लगते ही मुलायम ने अमर के तरफदारी शुरू कर दी। अमर के प्रति सहानुभूति दिखाकर मुलायम ने एक पत्थर से दो निशाने लगाये। मुलायम के बयान की आड़ में रेवती रमण सिंह को कुछ मदद तो मिलेगी ही लेकिन इससे बढ़कर मुलायम ने इस मामले में राजनीति घुसेड़कर राजनीतिक माहौल का श्रीगणेश कर दिया है। असल में मुलायम यूपी में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों में विरोधियों खासकर कांग्रेस के हाथ कोई मुद्दा बैठै बैठाए थमाना नहीं चाहते हैं, और अगर सपा के दामन पर कीचड़ उछलता है तो उसका सीधा फायदा यूपी में कांग्रेस को ही मिलेगा। कांग्रेस को घेरने की नीयत से ही मुलायम ने अमर के पक्ष में बयानबाजी करके अपरोक्ष रूप से कांग्रेस आलाकमान और पीएम को कटघरे में खड़ा किया है।

मुलायम ने मीडिया के सामने कहा कि अमर सिंह के साथ अन्याय हो रहा है। उन्हें संकट में डालने की यह साजिश है और उन्हें मामले में फंसाया जा रहा है। मुलायम ने सवालिया लहजे में कहा , कि हमें (सपा) क्या फायदा था ? क्या समाजवादी पार्टी सरकार में शामिल हो रही थी ? क्या हमें मंत्री पद मिल रहा था ? मुलायम के सवाल चाहे कितने मासूम हो लेकिन उसके अर्थ और निहतार्थ बहुत ही गहरे हैं, कैश फॉर वोट का असल लाभ तो मनमोहन सिंह की सरकार को मिला था ना कि मुलायम सिंह को। पर्दे के पीछे का खेल अमर, मुलायम और कांग्र्रेस आलाकमान बखूबी जानता है। मुलायम ने सोची समझी रणनीति के तहत अमर सिंह के कंधे पर बंदूक रखकर कांग्रेस द्वारा यूपी में बुने जा रहे चुनावी घोंसले में सीधा निशाना साधा हैै, ये आना वाला वक्त ही बताएगा कि मुलायम का ‘अमर’ प्रेम और कांग्रेस पर निशाना कितना असरदार साबित होगा। लेकिन इस सारी बयानबाजी के बीच कोर्ट के आदेश के बाद तीन साल बाद खुली फाइल को शायद एक बार फिर ठंडे बस्ते में डालने की स्क्रिप्ट का प्रथम अध्याय मुलायम सिंह ने लिख दिया है।

Sunday, July 24, 2011

देश ब्लैकबेरी के बगैर जी सकता है, शाहबेरी के बिना नहीं

राष्ट्रीय राजमार्ग यानी एनएच 58 पर बसा गांव शाहबेरी देश के उन तमाम गांवों में से एक है जिसकी खेती योग्य जमीन विकास के नाम पर सरकार ने अधिग्रहित की थी। लेकिन शाहबेरी गांव के किसान भाग्यषाली निकले क्योंकि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को किसानों को उनकी जमीन वापिस करने का आदेश दिया है। विकास के नाम पर अधिग्रहित की गई जमीन को सरकार ने कारपोरेट घरानों और बिल्डरों को ऊंचे दामों में बेचकर कमीशन की मोटी मलाई काटी थी लेकिन शाहबेरी के किसानों ने इंसाफ की आस नहीं छोड़ी और अन्ततः सुप्रीम कोर्ट ने उनके हक में फैंसला सुनाकर न्यायपालिका पर आम आदमी की आस्था को जिंदा रखा। गौरतलब है कि पिछले एक दशक में ग्रेटर नोएडा में लगभग 85000 हजार एकड़ जमीन प्राधिकरण ने अधिग्रहित की है। वर्तमान में शाहबेरी गांव में सात बिल्डरों द्वारा तकरीबन पचास हजार फ्लैट बनाने का काम जोरों पर था। ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने किसानों को बाजार भाव से काफी कम मुआवजा दिया गया लेकिन वही जमीन सरकार ने बिल्डरों को ऊंचे दामों पर बेची थी। शाहबेरी में बन रहे छोटे से छोटे फ्लैट की कीमत आधा करोड़ के करीब है। असल में शाहबेरी का निवासी बनने को देश की वो क्लास उत्सुक है जो ब्लैकबेरी मोबाइल हाथ में लेकर घूमती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने ‘ब्लैकबेरी क्लास’ के सपनों के महल को चकनाचूर कर डाला है। अदालत के सकारात्मक व खेती-किसानी के प्रति नरम और सहयोगी रवैये से ये उम्मीद जगी है कि शाहबेरी जैसे देश के अन्य हजारों गांव ब्लैकबेरी क्लास का ठिकाना बनने से बच जाएंगे।

किसी जमाने में मोटे तौर पर जमीन के दो ही उपयोग थे, एक घर बनाने और दूसरा खेती के लिए। लेकिन उदारीकरण की बयार में चांदी-सोने और षेयर बाजार की भांति जमीन भी निवेष का सौदा बन गयी। पिछले एक दशक में तेजी से उभरे नव धनाढय वर्ग ने दिल खोलकर जमीन में निवेश किया। विकास और उलूल-जलूल बहानों का सहारा लेकर लगभग हर सरकार ने कारपोरेट घरानों और बिल्डरों को थाली में सजाकर जमीनों का तोहफा देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। पिछले दो दशक में रियल एस्टेट कारपोरेट के लिए मुनाफे का सौदा साबित हुआ है, कुकरमुत्ते की तरह देशभर में उग आयी रियल एस्टेट कंपनियों और बिल्डरों ने खेती योग्य हजारों एकड़ जमीन को कांक्रीट के जंगल में तब्दील कर डाला। शेयर मार्केट से पिटे ओर घाटा खाए निवेशकों को जमीन में निवेश सुरक्षित और मुनाफे का सौदा लगने लगा है। परिणामस्वरूप देशभर में जमीन के रेट में जर्बदस्त उछाल तो आया ही है वहीं लगभग हर शहर के चारों ओर खेती की जमीन को खरीदने का जनून और पागलपन चरम पर है। सरकारी मशीनरी को घूस और कमीशन खाने से ही फुर्सत नहीं है। सरकार द्वारा जमीन अधिग्रहण को अगर जमीन हड़पना कहा जाए तो कोई बुराई नहीं होगी। ग्रेटर नोएडा में सरकार ने हजारों एकड़ जमीन का अधिग्रहण जिस उद्देश्य से किया था, उसे बिल्डरों के हाथों मंहगे दामों में बेचने और कमीशन की काली कमाई खाने के अलावा सरकार ने विकास के नाम पर कुछ खास नहीं किया।

देश की तेजी से बढ़ती आबादी और उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिक से अधिक मकान और अनाज की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता है। हरित क्रांतियों ने देश को अन्न के मामले में आत्मनिर्भरता बनाया है लेकिन पिछले दो दशकों से किसानों का रूझान व्यवासायिक खेती की ओर होने से पारंपरिक खेती को बहुत नुकासान पहुंचा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दखलअंदाजी और सरकार की खेती विरोधी नीतियों और नीयत के कारण किसान आत्महत्याएं करने को विवश हुये हैं। असल में खेती किसानी का असली मुनाफा बिचौलिये और बड़ी कंपनियों द्वारा खा जाने के कारण खेती आज घाटे का सौदा साबित हो रही है। परिणामस्वरूप किसान खेती-किसानी से विमुख हो रहे हैं। भूमि अधिग्रहण के वर्तमन अपंग कानून के कारण सबसे अधिक अधिग्रहण खेती योग्य भूमि का ही हुआ है। जिस जमीन पर कभी हरे भरे-पूरे खेत और फसले लहलहाती थी आज वहीं मल्टीस्टोरी बिल्डिंग खड़ी हैं। देश में खेती योग्य भूमि का क्षेत्रफल काफी तेजी से कम हो रहा है और दूसरी और दुगनी तेजी से कांक्रीट का जंगल फैल रहा है। देश की राजधानी दिल्ली में बेतहाशा बढ़ती आबादी को बसाने के लिए सबसे अधिक खेती योग्य जमीन का अधिग्रहण पिछले दो दशकों में हुआ है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अर्थात एनसीआर की सीमा से सटे यूपी, हरियाणा के कई जिले एनसीआर का हिस्सा बन चुके हैं। बढ़ती आबादी को आशियाने और तमाम अन्य उत्तम सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए ही खेती वाली जमीन का अधिग्रहण धडल्ले से किया गया। असल में लाखों करोड़ों कमाने वाली जमात दिल्ली की भागदौड़ और भागमभाग भरी जिंदगी से उबकर दिल्ली के आस-पास के इलाकों में रिहाइष के ठिकाने ढूंढने लगी। नोटों से भरी जेब, ऊंचे सपनो और पावर से लबरेज ब्लैकबेरी जमात ने जब भी दिल्ली से थोड़ा बाहर देखा किसी गरीब किसान को अपनी जमीन से हाथ धोना पड़ा, शाहबेरी और तमाम दूसरे गांव इस जमात के ठिकाने बनने लगे और बेचारे किसान अपने हक के लिए लाठी और गोली खाते रहे।

गौरतलब है कि विकास के नाम पर खेती योग्य जमीन के अधिग्रहण का रोग आजादी के बाद से ही शुरू हो गया था। मौजूदा भूमि अधिग्रहण कानून 1894 में बना था, समय-समय पर हुये संशोधनों के बावजूद कानून में बदलाव की जरूरत है। कई सरकारें आई और गयी लेकिन भूमि अधिग्रहण और उससे जुड़ी समस्याओं के समाधान में किसी ने भी गंभीरता नहीं दिखाई। किसान की आवाज और दुख दर्दे को अनसुना करके सरकारें जमीनन का अधिग्रहण निजी स्वार्थों की पूर्ति और कारपोरेट घरानों के मुनाफे के लिए करती रहीं। मामला जब हद से ऊपर हुआ तो किसानों के तथाकथित नेताओं और सामाजिक संगठनों ने सरकार की इस जबरदस्ती और गुंडई के खिलाफ मरियल आवाज उठानी शुरू की। किसानों के हितेषी बनने की होड़ हर राजनीतिक दल में है लेकिन जमीन अधिग्रहण से जुड़ी असल चिंता और समस्या की जानकारी न तो नेताओं को है और न खुद किसानों को। ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि सारी समस्या कम मुआवजे को लेकर है लेकिन असल समस्या शायद कुछ और है जिसे आज न तो नेता समझ रहे हैं और न ही किसान। गौरतलब है कि जिन किसानों को मुआवजा मिला भी, वो उसका सदुपयोग न के बराबर ही कर पाए। ये कड़वी सच्चाई है कि नोएडा क्षेत्र के हजारों किसान भारी भरकम मुआवजा पाने के बाद भी आज दिल्ली और आस पास के इलाकों में मामूली नौकरी और दो जून की रोटी का जुगाड़ करते दिख जाते हैं।

उदारवाद की हवाओं ने देश में एक नयी जमात को जन्म दिया है। इस नव धनाढय जमात की महत्वकांक्षाओं और इच्छाओं की पूर्ति के वास्ते हर शहर में खेती योग्य जमीन की बलि दी जा रही है। संपूर्ण एनसीआर क्षेत्र में उधोगपति, मल्टीनेशनल कंपनियों के एक्जिक्यूटिव और आफिस, तथाकथित नेता और बड़े ओहदे पर आसीन और सेवानिवृत्त महानुभावों का आधिपात्य और साम्राज्य है। भोले-भाले और अनपढ़ किसानों को मुआवजे और नेतागिरी के फेर में उलझाकर चालाक और भ्रष्ट नेता खेती वाली जमीन को मोटी कमीशन के खातिर हड़प रहे हैं। देश की तथाकथित वीआईपी और ब्लैकबेरी जमात के आशियाने और दूसरी जरूरतों को पूरा करने की चाहत में नेता, कारपोरेट और माफियाओं की तिगड़ी किसानों को उनके आषियाने, रोजगार और मातृभूमि से एक साथ बेदखल करने को अमादा है, ये कड़वी हकीकत है। आज जो क्लास हाथ में ब्लैकबेरी मोबाइल पकड़कर खेत और खलिहान की छाती पर अपने सपनों का आशियाना बसाने को बेताब है। वो जमात और उसके पैरोकार इस बात को भूल जाते हैं कि जब किसान और खेत ही नहीं होंगे तो उनके अन्न-पानी का प्रबंध और रोजमर्रा की जरूरतें कैसे पूरी होंगी। ये सच है कि इस देश में ब्लैकबेरी के बिना तो जीया जा सकता है लेकिन शाहबेरी के बगैर नहीं।

Saturday, July 23, 2011

राहुल की ‘नौटंकी’ माया को भारी न पड़ जाए

ये तो लगभग तय हो ही चुका है कि यूपी में विधानसभा चुनाव समय से पूर्व होंगे। राजनीतिक गलियारों और आफिसों में गहमागहमी और चहल-पहल का माहौल बनने लगा है। सभी दलों ने अपने सिपाहसिलारों और सिपाहियों को चुनावी रण की तैयारी के अंतरिम आर्डर जारी कर दिये हैं। जहां बाकी दल चुनाव की तैयारियों में दिन रात एक कर रहे हैं वहीं सूबे की सीएम मायावती अपनी सरकार के दामन लगे दागों को छुड़ाने और डैमेज कंट्रोल की कार्यवाही में लगी हैं। डा0 सचान हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंपकर सरकार पहले ही बैकफुट पर थी, अब राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाले की जांच कैग से कराने की सिफारिश कर एक बार फिर सरकार कटघरे में खड़ी दिखाई दे रही है। दिनों-दिन बिगड़ती कानून व्यवस्था, सिर उठाते किसान आंदोलन, जमीन अधिग्रहण से जुड़े मामलों पर कोर्ट की सख्ती और जमीन वापिसी के आदेश, भ्रष्टाचार और घोटालों में डूबी, दागी मंत्रियों और विधायकों का बोझ ढोती माया सरकार को निर्धारित समय से पूर्व चुनाव करवाने में ही जीत और दुबारा सरकार बनाने की उम्मीद दिखाई दे रही है। लेकिन जिस तरह कांग्रेस के युवराज लगभग हर मोर्च पर माया सरकार को खुली चुनौती दे रहे हैं उससे ये उम्मीद लगाई जा रही है कि कही राहुल की ‘नौटंकी’ मायावती पर भारी न पड़ जाए।

गौरतलब है कि बसपा ने राहुल की पदयात्रा, किसान महापंचायत, और समय-समय पर दलितों के घर जाने, खाना खाने और रात बिताने को ‘नौटंकी’ बताती है। जबकि अंदरूनी बात यह है कि माया इस समय सूबे में दिनों-दिन बढ़ते और लोकप्रिया होते राहुल फैक्टर से परेशन और डरी हुई है। राहुल मिशन 2012 की कड़ी में इन दिनों पूर्वी यूपी के दौरे पर हैं। सिर से पैर तक भ्रष्टाचार में सनी हुई माया सरकार पर राहुल रूक-रूककर घातक और कठोर प्रहार कर रहे हैं उससे सरकार की बड़ी फजीहत हो रही है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में घोटाले के मुद्दों को राहुल ने ही उठाया था और आरटीआई के तहत सरकार से जानकारी मांगी थी। खुद के दामन पर कीचड़ उछलते देख माया ने एनआरएचएम की जांच और आडिट कैग से करवाने का आदेश आनन-फानन जारी कर दिया। असल में माया और लगभग सभी दूसरों दलों ने राहुल को कभी सीरियस तरीके से लिया ही नही। राहुल को बच्चा, मुन्ना और चाकलेट बेबी कहकर सभी उन्हें पालिटिक्स का ट्रैनी समझते रहे। लेकिन मिशन 2012 की सफलता के लिए माया सरकार को हर मौके पर घेरने और सरकार को कटघरे में खड़ा करने से चूके नहीं। भट्ठा पारसौल की घटना ने राहुल के हाथ में एक बड़ा मुद्दा थमा दिया। पुलिस चैकसी और पहरे को धता बताकर जिस तरह राहुल भट्ठा पारसौल किसानों के बीच जा पहंुचे उसने पूरे देश को चैंका दिया। पदयात्रा और अलीगढ़ के नुमाइश मैदान में किसान महापंचायत कर राहुल ने बसपा, रालोद के साथ लगभग सभी विपक्षी दलों को हिला दिया। 2009 के आम चुनावों में राहुल फैक्टर ने ही कांगे्रस को 21 सीटे दिलाई थी बताते चले कि 2004 के चुनावों में कांग्रेस ने 4 सीटें जीती थीं। वहीं राहुल के मिशन 2012 की टीम जिसमें दिग्विजय सिंह, रीता बहुगुणा जोषी, प्रमोद तिवारी, जगदंबिका पाल, बेनी प्रसाद वर्मा, जतिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, पीएल पुनिया और श्रीप्रकाष जायसवाल शमिल हैं, माया सरकार को सत्ता से बेदखल करने में दिन रात एक किये हुए हैं। हो सकता है कल तक सियासी गलियारों में राहुल यूपी में बिग फैक्टर न रहे हो लेकिन आज राहुल फैक्टर माया और अन्य दलों की टेंशन की वजह है।

किसी जमाने में ब्राहाण, दलित और मुस्लिम कांगे्रस का वोट बैंक समझा जाता था, लेकिन प्रदेश में सपा, बसपा और अन्य दलों के उभरने से कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक उसकी बपौती न रहा। ब्राहाण, दलित और मुस्लिम वोट बैंक को टारगेट करके राहुल मिश 2012 को सफल बनाने में जुटे हैं और माया राहुल के हर कदम और चाल को नौटंकी करार देकर अपना भय, चिंता और घबराहट छुपाने का असफल प्रयास कर रही है। आम चुनावों में कांग्रेस को बढ़त दिलाकर राहुल ने जहां वाहवाही बटोरी तो वहीं बिहार विधानसभा चुनावों में उनका कोई असर दिखाई नहीं दिया। समूचे विपक्ष और खासकर बसपा खुद को फ्रंटफुट रखने की चाहे जितनी कोषिश करे लेकिन सच्चाई से मुंह नहीं फेरा जा सकता है। विपक्ष के हमलों, बयानबाजी और आलोचना से बेपरवाह राहुल मिषन 2012 की पगडंडी पर सधे कदमों से चले जा रहे हैं। माया को यह भूलना नहीं चाहिए कि पिछले विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी को भाी पूर्ण बहुमत मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं था। आज माया सरकार के खिलाफ जो माहौल बन रहा है, उसमें राहुल की नौटंकी माया पर भारी भी पड़ सकती है।

Wednesday, July 20, 2011

नवंबर में हो सकते हैं यूपी विधानसभा चुनाव

प्रदेश की दिनों-दिन बदहाल होती कानून व्यवस्था और विपक्षी दलों के हमलों से परेशान मायावती ने इसी साल विधानसभा चुनाव करवाने का मन बना लिया है। सूत्रों की माने तो सरकार ने अंदर ही अंदर इसकी तैयारी भी कर ली है और अगले माह मानसून सत्र के दौरान सरकार यूपी विधानसभा चुनाव की सिफारिष कर सकती है। कहा तो ये जा रहा है कि खुफिया रिपोर्टो के आधार पर सरकार ने निर्धारित समय से छह माह पूर्व ही चुनाव करवाने का मन बनाया है लेकिन असलियत यह है कि भ्रष्टाचार, तीन-तीन सीएमओ की हत्या, रेप की खेप, दलित अत्याचार की बढ़ती घटनाओं, मजदूर, किसान की बदहाली का लंबी होती कहानियों और राहुल गांधी की सक्रियता ने बसपा सुप्रीमों की नींदें उड़ा रखी हैं। वहीं अपने मंत्रियों, विधायकों और पदाधकारियों की हरकतों ने भी माया की मुसीबतों में इजाफा किया है। दिनों-दिन विरोधी माहौल के बढ़ते आभा मंडल से घबराई माया ने इसी साल संभवतः नवंबर माह में चुनाव करवाने का मन बना लिया है। खुफिया रिपोर्टो के अनुसार अगर सरकार निर्धारित समय से पूर्व चुनाव करवा लेती है तो वो दुबारा सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती है। सत्ता के नषे में चूर माया पर आज चहु ओर से मुसीबतों का पहाड़ टूटा हुआ है। सरकार के विरूद्व जनता का गुस्सा और विरोध का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। सत्ता विरोधी वातावरण और विरोधियों की चालों से निपटने के लिए माया ने निर्धारित समय से पूर्व चुनाव करवाने का इरादा कर लिया है, पिछले दिनों राहुल की किसान पंचायत के बाद माया ने पार्टी पदाधिकारियों की मीटिंग के दौरान बसपाईयों को राहुल की काट तो बताई ही थी वहीं चुनाव के लिए कमर कसने का फरमान भी सुनाया था। अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो इसी साल नवंबर में विधानसभा चुनाव का अखाड़ा सज जाएगा।

गौरतलब है कि राहुल गांधी यूपी सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द बने हुए हैं। राहुल के साथ उनकी टीम मिशन 2012 में दिन रात एक किये है। दिग्विजय सिंह, रीता बहुगुणा जोशी, पीएल पुनिया, बेनी प्रसाद वर्मा, जगदम्बिका पाल आदि कांग्रेसी नेता माया सरकार को घेरने का कोई मौका चूकते नहीं हैं। कांग्रेस के अलावा सपा, भाजपा, रालोद और पीस पार्टी भी चुनावी दंगल में कूदने को पूरी तरह से तैयार है। बसपा की तर्ज पर सपा, भाजपा और अन्य दल संभावित उम्मीदवारों की धोषणा आए दिन कर रहे हैं। प्रदेश में छोटे दलों ने एक संयुक्त मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ने का मन बनाया है। रालोद, पीस पार्टी, बीएस4 आदि लगभग दर्जनभर दल मिलकर बड़े दलों की गुणा-भाग ध्वस्त करने की तैयारियों में जुटे हुए हैं। अंदर ही अंदर सबकी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। असल में जिन मुद्दों को मायावती सत्ता के नशे में चूर होकर हल्के में ले रही थी वहीं अब उनकी गले की फांस बनते जा रहे हैं। राहुल को यूपी में बिग फैक्टर ने समझने वाली माया आज सबसे अधिक राहुल से ही भयभीत है। भट्ठा पारसौल की घटना से लेकर अलीगढ़ में किसान पंचायत ने माया को हिला कर रख दिया है। सपा और रालोद भी अंदर ही अंदर यही चाहते हैं कि राहुल फैक्टर के और अधिक ऐक्टिव होने से पूर्व चुनाव उनकी सेहत के मुफीद होगा क्योंकि अगर कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक उसकी ओर रूख करता है तो निश्चित तौर पर दलित, अल्पसंख्यक, पिछड़ी जातियों और किसानों की राजनीति करने वाले कई दलो की दुकानों के षटर डाउन हो जाएंगे वहीं कांग्रेस सोशल इंजीनियरिंग के मुख्य घटक ब्राहाण वोट को भी प्रभावित करने में सक्षम है। ऐसे में सोशल इंजीनियरिंग की हवा से फूले बसपा के हाथी की हवा निकलने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।

मायावती ऊपर से तो कठोर और सख्त दिखाई देती हैं। अपने पहले तीन कार्यकाल में उनकी यही छवि आम जनमानस के दिलों में बसी थी। सूबे की नौकरशाही उनके सामने पड़ने से घबराती थी। अपराधी और काले कामों में लिप्त हाथ यूपी से बाहर अपना ठिकाना ढूंढते थे। लेकिन 2007 में पूर्ण बहुमत के दम पर अपनी सरकार बनाने के बाद से ही माया ने मनमर्जी और तानाशाही का ऐसा राज चलाया कि मानो उन्हें दुबारा जनता के दरबार में हाजिरी लगानी ही नहीं है। पिछले चार सालों में बड़ी से बड़ी मुसीबत को हवा में उड़ाते हुए माया ने मनमाफिक और मुनमुताबिक जो चाहा वो किया। प्रदेश की जनता के खून-पसीने की कमाई के अरबों रूपयों को स्मारकों, पार्कों और मूर्तियों में लगाकर मायावती ने एक तानाशाह की भांति जनता के हक के पैसे को अपनी ख्वाहिशों और निजी लाभ के लिए व्यर्थ गंवा डाला। माया ने सरकार के चार साल के रिपोर्ट कार्ड को खूब तबीयत से सजाया संवारा तो जरूर है लेकिन जमीनी हकीकत किसी से छिपी नहीं है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और प्रशासन के मामले में सरकार हर मोर्च पर असफल रही है। प्रदेष में शराब माफिया का राज है। अपने चेहते ठेकेदारों और माफियाओं को औने-पौने दामों में चीनी और कपड़ा मिले बेचकर माया ने प्रदेश की जनता और श्रमिकों के साथ धोखा किया है। पिछले चार सालों में प्रदेष में माफिया और ठेकेदारों का साम्राज्य स्थापित और मजबूत हुआ है। सरकार का लगभग हर मंत्री, विधायक और बसपा पदाधिकारी परोक्ष या अपरोक्ष रूप से ठेकेदारी और दलाली में लिप्त है। कानून व्यवस्था को बढ़ा चढ़ाकर पेश करने वाली मायावती की पार्टी के कई मंत्री, विधायक और पदाधिकारी सीधे तौर पर अपराधों में लिप्त हैं और जेल की षोभा बढ़ा रहे हैं। प्रदेश में नियम, कानून की सरेआम धज्जिया उड़ाई जा रही है। सूबे के लगभग हर विभाग में सीएम फंड के नाम से खुली वसूली पिछले चार साल से जारी है। महिलाएं, बुजुर्ग, किसान, छात्र, शिक्षक, वकील, कर्मचारी अर्थात समाज का हर वर्ग माया सरकार की ज्यादितयों से परेशान है। कुछ समय पूर्व तक जो लोग ये कहा करते थे कि माया को टक्कर दे पाने की हिम्मत किसी दल में नहीं है आज उनके सुर बदले हुये हैं। अब ये चर्चा आम है कि माया के लिए ये चुनाव आसान नहीं होगा। राजनीतिक गलियारों और आम आदमी के बीच चल रही इन चर्चाओं और जमीन हकीकत से बसपा सुप्रीमों भी अनजान नहीं है, इसलिए स्थिति के बद से बदतर होने से पूर्व ही चुनाव करवाने का दांव चलकर मायावती अपने विरोधियों का धूल चटाने के मंसूबे पका चुकी है।

कांग्रेस आलाकमान के माउथ पीस हैं दिग्विजय

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की बैटरी इन दिनों फुल चार्ज है। अपने विवादित बयानों के लिए मशहूर दिग्विजय कांग्रेस में फिलहाल वहीं भूमिका निभा रहे हैं जो किसी जमाने में अमर सिंह सपा में निभाया करते थे। पूरे एक दशक तक मध्य प्रदेश पर राज करने वाले दिग्गी को धीर, गंभीर स्वभाव और कार्य कुशल नेता समझा जाता है। हिन्दी पट्टी के राज्यों में दिग्गी की अच्छी पकड़ और मान-सम्मान है। यूपी में राहुल के मिशन 2012 को सफल बनाने की मुहिम में जुटे दिग्विजय अपनी छवि और कद भूलकर विवादित बयानबाजी और सड़कछाप हरकतों पर आमादा हैं। सोनिया और राहुल के मुंहलगे दिग्गी कांग्रेस आलाकमान का माउथ पीस बनकर एक सधे हुये तीरअंदाज की भांति चुनावी निशाना साधने में लगे हैं। ऐसे में कभी उनके निशाना पर बाबा रामदेव, कभी अन्ना हजारे और अक्सर आरएसएस आ जाती है। हालिया मुंबई धमाकों में हिंदु संगठनों पर निशाना साधकर दिग्गी एक बार फिर विवादों में घिरे है लेकिन इन सब से बेफ्रिक दिग्गी भोपाल में भाजयुमो के कार्यकर्ताओं के साथ सड़क छाप गुण्डों की भांति हाथा पायी करने पर गर्व महसूस कर रहे हैं। किसी जमाने में धीर-गंभीर दिग्गी की गिनती आज जोकरों और मानसिक रूप से दिवालिये नेता के रूप में होने लगी है। पता नहीं किस स्वार्थवष दिग्गी खुद अपनी छवि धूमिल करने को उतारू हैं। माले गांव बम विस्फोट, 26/11 के मुंबई हमले से ठीक पहले एटीएस चीफ हेंमत करकरे से बातचीत का खुलासा, लादेन के बारे में सम्मानजनक टिप्पणी, बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के खिलाफ तीखी आलोचना एंव धमकी और मुंबई में हालिया सीरियल बम विस्फोट के लिए हिंदु संगठनों के खिलाफ बोलने तक का दिग्गी राजा ने जब-जब अपना मुंह खोला एक नये विवाद को जन्म दिया। दिग्गी किसकी वाणी बोल रहे हैं और वो ऐसा क्यों बोल रहे हैं वो देश के आम आदमी को भी अब समझ आ चुका है।

गौरतलब है कि दिग्गी को यूपी में कांग्रेस को पुर्नजीवित करने की अहम् जिम्मेदारी कांग्रेस आलाकमान ने सौंपी थी उस समय यूपी में कांग्रेस को कोई पुरसाहाल नहीं था। राजनीतिक बनवास भोग रही कांग्रेस को मेन स्ट्रीम में लाने और सुर्खियों में बने रहने के लिए विवादित बयानबाजी का आसान और घटिया रास्ता दिविजय ने अपनाया और काफी हद तक वो इसमें कामयाब भी रहे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने इसमें दिग्गी का बखूबी साथ निभाया और मायावती और बसपा सरकार को निशाने पर रखकर उन्होंने भी विवादित बयानों का रिकार्ड स्थापित किया। जब दिग्गी को ये अहसास होने लगा कि मीडिया और विपक्षी दल उनके बयानों को तवज्जों दे रहे हैं तो उन्होंने अपने बयानों की विवादों की चाशनी में ओर डुबोना शुरू कर दिया। आज यूपी में कांग्रेस अपना परंपरागत वोट बैंक वापिस पाने को बेताब है ऐसे में दिग्विजय सिंह चुनावी रणनीति और कार्ययोजना के तहत ही सूबे के अल्पसंख्यक, दलित और पिछड़ी जातियों की सहानुभूति और वोट बैंक को ध्यान में रखकर जानबूझ कर विवादित बयानबाजी कांग्रेस आलाकमान की षै पर कर रहे हैं। कांग्रेस का निषाना सूबे का मुस्लिम वोट बैंक है जो आज राजनीतिकं दोराहे पर खड़ा है। कांग्रेस को लगता है कि हिंदु संगठनों की निंदा और हिदु आंतकवाद को प्रचारित और स्थापित करके वो मुस्लिम वोट पाने में कामयाब हो जाएगी और दिग्विजय इसी थ्योरी पर काम कर रहे हैं। दुर्दांत आंतकवादी ओसाम बिन लादेन को ‘लादेन जी’ और आजमगढ़ जिले के संजरपुर जाकर कट्टरपंथियों को सहलाना-फुसलाना कांग्रेस की चुनावी फिल्म का ही हिस्सा था।

कांग्रेस आलाकमान को लगता है कि यूपी में उन्हें अपनी खोई हुयी जमीन तभी वापिस मिल पाएगी जब उनका परंपरागत वोट बैंक उनके झण्डे के तले आ जाएगा। गौरतलब है कि मुस्लिम, दलित और पिछड़ी जातिया बरसों-बरस तक कांग्रेस का मजबूत और पक्का वोट बैंक रही हैं। माया की बसपा और मुलायम की सपा ने कांग्रेस के मजबूत किले में सेंध लगाकर उसे कुर्सी की दौड़ से बाहर ही कर दिया था। पिछले आम चुनावों में कांग्रेस को मिली सफलता से उत्साहित होकर कांग्रेस आलाकमान खासकर राहुल ने अपना सारा ध्यान यूपी में लगा रखा है। जिस तरह से राहुल और उनके विश्वस्त मंत्री और नेता यूपी में सक्रिय हैं वो राहुल के मिषन 2012 का ही हिस्सा है। इसी कड़ी में दिग्विजय सिंह राहुल और सोनिया गांधी का माउथपीस बनकर वो सब कुछ अपनी जुबान से उगल रहे हैं जिसकी रचना कांग्रेस के रणनीतिकारों ने यूपी के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर रची है। विवाद बढ़ने और मीडिया के ष्षोर मचाने पर कांग्रेस खुद को दिग्विजय के बयान से अलग कर तो लेती है लेकिन उसे जो कहना होता है वो दिग्विजय के जरिये कहलवाकर मुस्लिमों, दलितों, अल्पसंख्यकों को कदम-कदम पर ये जता देती है कि कांग्रेस ही आपके हक और हकूक के लिए लड़ने वाली अकेली पार्टी है।

देष की सुरक्षा और दूसरे अहम मसलों पर विवादित बयान देकर अगर दिग्गी ये सोचते हैं कि उन्हें राहुल और सोनिया का आषीर्वाद मिलता रहेगा तो वो भयंकर भूल कर रहे हैं क्योंकि राजनीति में रिषतों से अधिक जरूरत का महत्व होता है आज कांग्रेस अपने परंपरागत वोट बैंक को वापिस पाने का बैचेन है उसके लिए उसे दिग्गी जैसे सिरफिरे नेता की जरूरत है और जब जरूरत पूरी हो जाएगी उस दिन दिग्गी को दूध में से मक्खी की तरह बाहर कर दिया जाएगा। हो सकता है ये बात आज दिग्गी को समझ न आए लेकिन इतिहास में दिग्गी जैसे महानुभावों के कई किस्से दर्ज हैं शायद दिग्गी के पास उन किस्सों को पढ़ने की फुर्सत नहीं है। जनता भी कांग्रेस और दिग्विजय के इरादे का बखूबी समझती है सोनिया-राहुल के अंधभक्त और माउथपीस दिग्गी राजा अपनी छवि को खुद ही मिटाने पर उतारू हैं, भगवान उन्हें सदबुद्वि दे।

पुनिया साहब, यूपी के बाहर भी दलित रहते हैं

यूपी के बाराबंकी से कांग्रेसी सांसद एवं पूर्व नौकरशाह पन्ना लाल पुनिया को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष बनाकर केंद्र सरकार ने उनके कंधों पर भारी जिम्मेदारी डाल रखी है। लेकिन एससी आयोग का राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बावजूद पुनिया का सारा ध्यान और राजनीति केवल यूपी में मायावती सरकार को घेरने, यूपी में कांग्रेस की खोई जमीन वापिस पाने तथा दलितों का सच्चा मसीहा बनने के इर्द-गिर्द ही मंडराती है। किसी जमाने में मायावती के सबसे विष्वस्त अफसर रहे पुनिया आज अपनी पुरानी लेडी बॉस की नींद हराम किये हुये हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि पुनिया जिस पद को आसीन हैं उस का कार्यक्षेत्र संपूर्ण भारत है या फिर केवल यूपी। क्यों पुनिया को यूपी से बाहर दलितों पर होने वाले अत्याचार, शोषण, अन्याय की घटनाएं दिखाई नहीं देती हैं। आखिरकर पुनिया एक संवैधानिक पद का निर्वाहन कर रहे हैं ऐसे में उनका एक विशुद्व राजनीतिज्ञ की भांति आचरण गंभीर सवाल पैदा करता है। पुनिया की इस दलित और वोट बैंक की राजनीति के चलते अनुसूचित जाति आयोग का काम काज और गरिमा को ठेस पहुंची है। वहीं पुनिया के यूपी प्रेम और वोट बैंक की ओछी पालिटिक्स के चलते देश भर में दलितों और अनुसूचित जाति से जुड़ी शिकायतों और समस्याओं के प्रभावी निराकरण में अनावश्यक विलंब और परेशानी हो रही है। सही मायनो में पुनिया ने राष्ट्रीय स्तर के आयोग को राजनीति की वहज से एक प्रदेष के सीमित दायरे में बांध दिया है, जिसके चलते देशभर के दलितों और अनुसूचित जाति के लोगों को दुःख-तकलीफ और अन्य अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।


गौरतलब है कि नौकरशाह से राजनेता बने पुनिया का कार्यपालिका और विधायिका दोनों से पुराना नाता रहा है। किसी जमाने में पुनिया की गिनती मायावती के चेहते अफसरों में होती थी। पूर्व में माया सरकार में पुनिया सीएम के मुख्य सचिव की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाया करते थे। पुनिया के पूर्व अनुभव और दलित होना ही उनके लिए मुफीद साबित हुआ और सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने राजनीति का रास्ता चुन लिया। माया और बसपा का तिया-पांचा करने के लिए ही कांग्रेस ने उन्हें अपने कैंप में जगह दी। कांग्रेस की सोच यह थी कि यूपी में माया को टक्कर देने के लिए किसी मजबूत दलित नेता की जरूरत है और पुनिया को पार्टी में उसी खाली स्थान भरने के लिए लाया गया और उन्हें राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष भी बनाया गया। जिस खास मकसद से पुनिया को कांग्रेस में लाया गया था उसमें तो वो कामयाब रहे लेकिन उनके केवल यूपी पर केन्द्रित होने का खामियाजा देश भर में दलित और अनुसूचित जाति सुमदाय के लोग भुगत रहे हैं।

सोनिया और राहुल के विश्वस्त पुनिया कदम-कदम पर यूपी की माया सरकार को घेरने के मौका तलाशते हैं और खुद को मायावती के बाद दलितों का सबसे बड़ा नेता और मसीहा साबित करने में ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। बसपा की बामसेफ की तर्ज पर यूपी में कामसेफ बनाकर पुनिया ने कर्मचारी वर्ग को कांग्रेस के पाले में लानेका सफल दाव चल दिया है। बाबा रामदेव पर तीखे प्रहार करके पुनिया मीडिया में छाये रहने की कला भी बखूबी जानते है और यूपी में अनुसूचित जाति और दलितों पर होने वाले अत्याचार और अन्याय की घटनाओं पर वो व्यक्तिगत दौरे कर त्वरित कार्यवाही करते हैं लेकिन पता नहीं पुनिया साहब को यूपी से बाहर देश के कोने-कोने में आये दिन दलितों और अनुसूचित जाति के साथ होने वाले अत्याचार, अपराध और अन्याय दिखाई क्यों नहीं देते हैं। दूर दराज की बात तो अलग है अभी हाल ही में पंजाब के मुक्तसर जिले की अपर सत्र न्यायाधीश परवीन बाली को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने बिना किसी कारण के पद से हटाकर अनोखी मिसाल देश के सामने पेश की है। एक दलित महिला एवं जज परवीन बाबी ने अपनी लगन, मेहनत और योग्यता के बलबूते सीनियर जुडिशल सर्विस में एससी कोटे में प्रथम व जनरल कोटे में पांचवा स्थान पाकर सिविल जज की नौकरी हासिल की थी। 2008 बेच की इस महिला दलित जज को बिना किसी कारण उसके पद से हटाकर हाई कोर्ट ने देश भर के महिला अधिकारों के लड़ने-भिड़ने वाले संगठनों और देशवासियों का सोचने पर विवष किया है कि आखिरकर कहां हमारा समाज बदला है। पुनिया साहब को इस बात का संज्ञान लेकर इस मामले की छान-बीन करवानी चाहिए और एक प्रतिभावान दलित महिला जज का न्याय और उसका अधिकार दिलवाने के लिए प्रयास करना चाहिए।

पुनिया साहब मूलतः हरियाणा के निवासी हैं ऐसे में उन्हें बखूबी मालूम होगा कि हरियाणा में यूपी से अधिक जाति संघर्ष की घटनाएं होती हैं और वहां पर दलितों के प्रति भेदभाव और हिंसा की घटनाएं यूपी से किसी भी मामले में कम नहीं होती हैं। हरियाणा के मिर्चपुर में दलितों के साथ जो कुछ हुआ था वो पूरे देश की जनता जानती हैं। हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान के अलावा देश के कई अन्य राज्यों में कांग्रेसी सरकारें हैं और वहां भी आये दिन दलितों और अनुसूचित जाति समुदाय पर अत्याचार और अन्याय की खबरें सुनने को मिलती हैं लेकिन पुनिया साहब का सारा ध्यान यूपी और मायावती को घेरने में बीतता है। परवीन बाली तो पढ़ी-लिखी और जज के पद पर आसीन थी तब भी उसे एक दलित और महिला होने का अभिशप झेलना पड़ा। देश में दलितों और अनुसूचित जाति की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अशिक्षित और मूलभूत सुविधाओं और संविधान प्रदत अधिकारों से वंचित है। ऐसे में देश के हजारों गांवों और कस्बों में रहने वाली दलित और अनुसूचित आबादी किस हाल में जी रही होगी का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है। लेकिन हमारे कर्ता-धर्ता शुद्व राजनीति में मस्त हैं। पुनिया साहब को लखनऊ और यूपी के अलावा भी देश के दूसरे राज्यों का भी दौरा करना चाहिए। पुनिया साहब ये माना कि आप कांग्रेस के सांसद हैं और सोनिया राहुल की कृपा से आपको राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष का पद मिला हुआ है लेकिन राजनीति के साथ ही साथ अपने काम और धर्म को मत भूलिए क्योंकि जिस जनता ने आपको वोट देकर इस स्थान पर पहंुचाया है वो आपको आपकी हैसियत भी बता सकती है। इसलिए आपसे निवेदन है कि यूपी ही नहीं देश भर में दलितों और अनुसूचित जाति के कल्याण और भलाई के लिए भी समय निकालिए और सच्चे मन से अपनी बिरादरी और इस देश की जनता का भला करिए।

Thursday, June 30, 2011

माया इसी साल करवा सकती हैं विधानसभा चुनाव

भट्ठा पारसौल की घटना ने यूपी के सियासी पारे को चढ़ा दिया है। जिस तरह यूपी सरकार और कांग्रेस पार्टी में एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है उसने यूपी के सियासी हलकों में हलचल मचा रखी है। यूपी पुलिस के तथाकथित पुख्ता सुरक्षा बंदोबस्त को धता बताकर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी मोटर साइकल से सुबह-सवेरे भट्ठा पारसौल के ग्रामीणों के बीच जा पहंुचने से माया सरकार की जो किरकिरी हुई उसका बयान नहीं किया जा सकता है। लगभग 12 घंटे के सियासी ड्रामे के बाद यूपी पुलिस ने फौरी तौर पर राहुल की गिरफ्तारी दिखाई और कुछ ही घंटों बाद उन्हें दिल्ली बार्डर पर छोड़कर गले में फंसी राहुल नाम की हड्डी से छुटकारा पाया। राहुल ने वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित होकर या फिर किसी अन्य निजी या दलीय स्वार्थ के वशीभूत होकर भट्ठा पारसौल में गांव वालों के बीच वक्त बिताया, उनके दुःख-दर्दे को सुना, समझा और अनुभव किया हो लेकिन एक बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि जब यूपी पुलिस भट्ठा पारसौल के आस-पास दो किलोमीटर के दायरे में चिड़िया को भी उड़ान नहीं भरने दे रही थी तो वहां राहुल गांधी का पहुंचना कोई छोटी घटना नहीं है। अपनी झेंप मिटाने के लिए पहले यूपी सरकार का बयान आया कि भट्ठा पारसौल में रात को ही धारा 144 को हटा लिया गया था लेकिन फिर उसी रात राहुल को उन्हीं धाराओं में बंद करना आखिरकर खिसयानी बिल्ली खंभा नोचने की कहावत को ही सिद्व करता है। किसानों के दुःख-दर्दे और उनके साथ यूपी पुलिस के अमानवीय व्यवहार और बर्बरता का जिक्र राहुल ने भट्ठा पारसौल के किसानों के समूह के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी बताया है और राहुल ने यूपी सरकार पर किसानों की मौत के झूठे आंकड़ें और बर्बरता के फोटो और अन्य सुबूत भी पेश किए हैं। किसान विरोधी विचारधारा और भट्ठा पारसौल में जो कुछ भी माया सरकार और उनके जाबांज अफसरों ने किया उसके लिए पूरे देश भर में  माया सरकार के किसान और जन विरोधी छवि का निर्माण हुआ है। और जिसने भी भट्ठा पारसौल की हकीकत को सुना, देखा या पढ़ा उसने तीखे शब्दों में यूपी सरकार को भला-बुरा जरूर कहा।

भट्ठा पारसौल की घटना ने बैठे-बैठाए विपक्ष को मायावती के खिलाफ एक ठोस व बड़ा मुद्दा थमा दिया है। मायावती ने भी कांग्रेस और विपक्षी दलों पर तीखे वार किए हैं और उन्हें अपने गिरेबां में झांकने की सलाह भी दे डाली। अपनी सरकार के चार साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में मायावती ने प्रदेश के विकास हेतु करोड़ों रूपये की योजनाओं की घोषणा कर विकासमुखी सरकार के दर्शन करवाने की कोशिश तो जरूर की लेकिन भट्ठा पारसौल की घटना मायावती का पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं ले रही है। मायावती को बखूबी ये मालूम है कि विपक्ष उनकी सरकार को सत्ता से बाहर करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। भट्ठा पारसौल की घटना को कांग्रेस ने जोर-षोर से उछाला है और केंद्र से यूपी में राष्ट्रपति शासन की मांग भी की है। केंद्रीय गृहमंत्री पी0 चिदंबरम से लेकर कांग्रेस के यूपी कोटे के केंद्रीय मंत्री और सांसद गाहे-बगाहे यूपी सरकार पर निशाने  साधने से चूकते नहीं है। राहुल गांधी यूपी सरकार और विशेषकर बहन मायावती के सबसे बड़ा सिरदर्द बने हुए हैं। राहुल के साथ उनकी टीम मेम्बर दिग्विजय सिंह, रीता बहुगुणा जोषी, पीएल पुनिया, बेनी प्रसाद वर्मा, जगदम्बिका पाल आदि कांग्रेसी नेता माया सरकार पर तीखे प्रहार करते ही रहते हैं। कांग्रेस के अलावा सपा, भाजपा, रालोद और पीस पार्टी भी चुनावी दंगल में कूदने को पूरी तरह से तैयार है। बसपा की तर्ज पर सपा, कांग्रेस, भाजपा और अन्य दल अभी से संभावित उम्मीदवारों की लगातार धोषणाएं कर रहे हैं। अंदर ही अंदर सब की तैयारी लगभग पूरी हो भी चुकी है। प्रदेश में छोटे दलों ने एक संयुक्त मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ने का मन बनाया है। रालोद, पीस पार्टी, बीएस4 आदि लगभग दर्जनभर दल मिलकर बड़े दलों की गुणा-भाग ध्वस्त करने की तैयारियों में जुटे हुए हैं। मायावती हर काम में मनमर्जी चलाती हैं और जहां उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पाती वहां वो या तो नया कानून बना देती हैं या फिर कानून को ताक पर रखकर मनमानी करने से बाज नहीं आती हैं। प्रदेश में धरना, प्रदर्षन और आंदोलन के लिए कानून बनाकर मायावती ने लोकतंत्र का गला घोंटने की तैयारी की है। इस कानून का व्याप्क तौर पर प्रदेश और देश  में विरोध हो रहा है। विपक्षी दलों के साथ ही साथ जन संगठनों ने इस कानून का भारी विरोध किया है। पंचायत चुनावों में धन और बाहुबल के सहारे बसपा ने अपने चेहतों को खास सीटों पर बिठाया था उसी तर्ज पर मेयर चुनाव की प्रक्रिया में भी परिवर्तन कर अपनों को मेयर की सीट पर बैठाने के सपने देख रही मायावती को राजभवन से झटका उस समय लगा जब राज्यपाल ने संशोधित कानून पर हस्ताक्षर ही नहीं किए। नाराजगी, सिर-फुटौव्वल, गुटबाजी से बचने के लिए पंचायत चुनावों में किसी भी दल ने चुनावी टिकट नहीं दिया था। लेकिन अपरोक्ष रूप से सभी दल अपने उम्मीदवारों का समर्थन और उन्हें जिताने की तिकड़मे भिड़ाते रहे। मायावती चाहती थी कि प्रदेश में निकाय चुनाव बिना पार्टी के चुनाव चिन्ह के हों लेकिन मायावती की इस चालबाजी को उच्च न्यायालय ने रोक लगाकर माया के सपने चकनाचूर कर दिए हैं। असल में माया अपने दल की कमजोरियों को बखूबी जानती और समझती हैं। माया को पता है कि शहरी क्षेत्रों में बसपा के पास कोई बड़ा जनाधार नहीं है ऐसे में निकाय चुनावों में भाजपा, कांग्र्रेस और सपा का पलड़ा ही भारी रहेगा। और अगर निकाय चुनावों का विधानसभा चुनावों का लिटमस टेस्ट मान लिया जाए तो प्रदेश में बसपा के विरूद्व हवा बह सकती है जिससे बसपा को भारी नुकसान होगा। हाई कोर्ट के निर्णय के बाद ही माया ने विधानसभा चुनावों की तैयारियों को और जोर-शोर से शुरू कर दिया। सरकार के चार साल पूरे होने पर आयोजित समारोह में माया ने कार्यकर्ताओं और पार्टी पदाधिकारियों को चुनाव के लिए तैयार रहने का ऐलान कर ही दिया है। माया कोई भी रिस्क नहीं लेना चाहती कि विपक्ष उन पर हावी हो पाए इसलिए संभावना यह व्यक्त की जा रही है कि दिनों दिन प्रदेश में विपक्षी दलों के मुखर विरोध और तीखे हमलों के साथ अपने ही दल के नेताओं, मंत्रियों और विधायको की करतूतों से परेशान मायावती इसी साल अक्टूबर या नवंबर में चुनाव करवाने का मन बना रही हैं।

विपक्ष माया से खार खाए बैठा है और वो कोई भी ऐसा मौका जिससे माया सरकार की बदनामी और किरकरी हो अपने हाथ से छोड़ना नहीं चाहता है। चुनाव होने में अभी एक साल का समय शेष है और इस एक साल में हवा किस तरफ बह जाए किसी को इसका अंदाजा नहीं है। रिवायत के अनुसार जो गद्दी पर होता है दोष भी उसके माथे पर लगता है और जो भी नफा-नुकसान होता है वो उसी के खाते में जाता है। जहां मायवती को गद्दी पर रहते हुए चुनाव लड़ने का फायदा मिलेगा वहीं सरकार ने अपने कार्यकाल में प्रदेश के किसान, गरीब, महिलाओं, पिछड़ों, दलितों और जरूरतमंदों की बेहतरी के लिए जो भी कुछ किया है उसका हिसाब-किताब माया को प्रदेश की जनता को देना होगा। विपक्ष लगातार माया सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाता आ रहा है। सरकार अपने बचाव में चाहे लाख दलीले दे लेकिन दाल में कुछ काला है, कि संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। जिस प्रकार प्रदेश में उधोग-धंधे चौपट हो रहे हैं, निवेशक प्रदेश से मुंह फेर चुके हैं, बेरोजगारी का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है, सरकार सरकारी चीनी मिलों को औने-पौने दामों पर अपने चेहतों को बांट रही है और राजस्व के सबसे बड़े स्त्रोत आबकारी में जो मनमानी, गुण्डागर्दी, खुली लूट और एकछत्र राज चलवाया जा रहा है वो किसी से छिपा नहीं है। प्रदेश में विकास कार्यों के नाम पर जो खुली लूट हो रही है उसका हिसाब माया को चुनाव के समय तो देना ही होगा। वहीं समय रहते बसपा का कुनबा संभालने, व्यवस्थित करने में भी मायावती को कसरत तो करनी ही होगी, वहीं मंत्रियों, नेताओं, विधायकों और मुंहलगे अफसरों की करतूतों पर डैमेज कंट्रोल करना भी कोई आसान बात नहीं है। देखा जाए तो मायावती चारों ओर से घिरी हुई है और पूरा विपक्ष केवल एक ही मकसद अर्थात बसपा सरकार को हटाने के मकसद साथ चुनाव मैदान में उतरेगा।

माया सरकार के काम-काज के पिछले चार साल का रिर्काड देखा जाए तो सरकारी किताबो और फाइलों में चाहे जो भी बड़े-बड़े दावे किए जाएं लेकिन असलियत यह है कि माया ने साल 2007 में गद्दी पर बैठते ही सूबे में पार्कों, स्मारकों, दलित महापुरूषों और खुद अपनी मूर्तियां लगवाने के अलावा कोई नया या अनूठा काम नहीं किया है जिसके उसकी पीठ थपथपाई जा सके। वहीं सरकारी विभागों में बढ़ता भ्रष्टाचार, धांधली, कानून व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति माया सरकार की पेशानी पर बल डालने के लिए काफी है। माया सरकार पर जब भी विकास विरोधी होने के आरोप लगे उसने केंद्र सरकार पर आरोप लगाकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करती ही नजर आई लेकिन हकीकत में उसने काम करने की गंभीर कोशिश की भी नहीं है। लगभग हर मुद्दे पर माया सरकार केंद्र सरकार पर आरोप लगाकर ही अपनी नाकामियों को ढकने का जो नाटक करती रही है उसका खामियाजा भी इन चुनावों में उसे भुगतना होगा। अगर ये मान भी लिया जाए कि केंद्र ने प्रदेश के विकास हेतु वांछित धनराशी नहीं भेजी है लेकिन जो भी धन केंद्र से प्रदेश सरकार को प्राप्त हुआ है अगर उसी को ईमानदारी से विकास कार्यों में लगाया जाता तो प्रदेश की सूरत में बदलाव आ सकता था। मानाकि प्रदेश बड़ा है और समस्याएं भी कम नहीं है लेकिन छोटे-छोटे कदमों और प्रयासों से ही बड़े-बड़े कामों को अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है। लेकिन माया सरकार का हर कदम और बयान राजनीति से प्रेरित होता है ऐसे में सरकार और सरकारी अमला दिल खोलकर सरकारी खजाने को लूट रहा है और जनता को दिखाने के लिए माया केंद्र सरकार पर यूपी की अपेक्षा का रटा-रटाया आरोप लगाकर अपना पल्ला आसानी से झाड़ लेती हैं। जो इक्का-दुक्का भले काम माया के शासन में हुए भी हैं उन्हें सरकारी मशीनरी ठीक तरह से प्रचारित ही नहीं कर पाई और जनता के बीच विपक्षी दलों का एक ही मैसेज गया कि मायावती का सारा ध्यान मूर्तियों, पार्कों और स्मारकों में ही लगा है। वहीं मायावती ने पिछले चार सालों में प्रदेश के आम आदमी से रूबरू होने की कोई नीति या कवायद ही नहीं कि माया केा उनके चेहते अफसरों और मंत्रियों ने जो समझा दिया माया ने आंख मूँद  कर उसे सत्य माना लेकिन कुर्सी के आगे पीछे चक्कर लगाने वाले अफसर सत्ता बदलते ही गिरगिट की भांति रंग बदल लेते हैं। ऐसे में जनता की नाराजगी का सीधा नुकसान माया को ही भुगतना होगा उनके चेहते अफसरों को नहीं ऐसे में आम आदमी से माया की दूरी उनके लिए बड़ा सिरदर्द बनेगी। मार्च माह के प्रदेष दौरों के दौरान मायावती को कई स्थानों पर जनता की नारजगी का सामना करना पड़ा था। वहीं प्रदेश में बढ़ते अपराध, दलितों के साथ बढ़ते अत्याचार, बलात्कार और महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों का ग्राफ मायावती के लिए चिंता का बड़ा कारण है। वही विपक्ष चुनावी बेला में माया सरकार के एक दर्जन से अधिक दागी मंत्रियों और विधायकों का मुद्दा भी जोर-शोर से उछालेगा।

प्रदेश में तय समय से चुनाव होने में अभी लगभग एक साल का समय शेष  है लेकिन विपक्ष के तीखे तेवरों और हमलों से बिलबिलाई और झुंझलाई मायावती ये कभी नहीं चाहेगी कि विपक्ष को बैठे-ठाले उनकी सरकार को घेरने के मुद्दे मिल जाए। अभी लगभग सभी दल निकाय चुनावों की तैयारियों में जुटे हुए हैं क्यों कि निकाय चुनाव के नतीजे आगामी विधानसभा चुनावों पर व्यापक असर डालेंगे वहीं अभी हाल ही में पांच प्रदेषों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे भी यूपी की सियासत पर खासा असर डाल सकते हैं। वहीं दल बदल की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। अभी हाल ही में बाराबंकी जिले के प्रभावशाली  बसपा नेता फरीद महफूज किदवाई ने बसपा छोड़ अपने पुराने समाजवादी परिवार में शामिल हो गए हैं। किदवाई का सपा में जाना बसपा के लिए भारी झटका है। किदवाई की भांति दूसरे कई विधायक भी चुनावी बेला में बसपा का दामन छोड़ कर किसी और का दामन थाम लें तो क्यों अचरज की बात नहीं होगी। वहीं एक ही महीने में बसपा की दो विधायकों शेखर तिवारी को इंजीनियर मनोज गुप्ता और विधायक आनंद सेन को शशि  हत्याकांड में हुई उम्रकैद की सजा ने भी बसपा की छवि को गहरा धक्का लगाया है। वहीं राजधानी लखनऊ में दो-दो सीएमओ की हत्याओं ने बिगड़ती कानून व्यवस्था, सरकारी महकमों में व्यापत भ्रष्टाचार और ठेकेदार, नेताओं और अफसरों की मिलीभगत का खोल कर रख दिया है। वर्तमान विधानसभा में बसपा के 226, सपा के 87, भाजपा के 48, कांग्रेस के 20, रालोद के 10, राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी के 1 और 9 निर्दलिय विधायक हैं। संख्या के हिसाब से तो बसपा का पलड़ा भारी लगता है लेकिन माया के इन चार सालों के कार्यकाल में जो कुछ भी हुआ है वो बसपा के खिलाफ ही जाता है। इन हालातों में माया जितनी देरी करेंगी उनके मुसीबतों में लगातार इजाफा होता जाएगा और विपक्ष को उन्हें घेरने काफी समय मिलेगा। ऐसे में माया समय से पहले चुनाव करवा सकती हैं। सूबे में जो सियासी हवाएं बह रही हैं उनसे समय से पहले चुनाव होने की खुशबू आ रही है।

Wednesday, June 29, 2011

मशाल बुझनी नहीं चाहिए

जंतर-मंतर में अनशन कर गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के विरूद्व जो शंखनाद किया है वो असल में काबिलेतारीफ है। बरसों-बरस से भ्रष्टाचार की चक्की में  पिस रही देश  की जनता को जगाने और आम आदमी को उसके भीतर छिपी शक्ति का एहसास अन्ना के आंदोलन ने करा दिया। लोक पाल बिल की ड्राफ्टिंग कमेटी में सिविल सोसायटी के सदस्यों को शामिल करवाकर अन्ना ने प्रशासन और संवैधानिक मसलों पर आम आदमी की सच्ची भागीदारी को सुनश्चित भी किया है। भ्रष्टाचार देश की व्यवस्था और तंत्र में लगी वो लाइलाज बीमारी है जो सरे आम देश के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्वास्थ्य को लगातार खराब कर रही है। सरकारी महकमों से लेकर देश के कोने-कोने में भ्रष्टाचार का भूत सीना तान कर विचरण कर रहा है और सब कुछ जानते, समझते हुए भी देश को आदमी बिना किसी कष्ट और प्रतिरोध के भ्रष्ट व्यवस्था का शीश  झुकाकर या फिर निजी स्वार्थों को साधने के लिए पोषक और हितेषी बना हुआ है। लाखों भ्रष्टाचारियों की भीड़ में अगर इक्का-दुक्का आवाज भ्रष्टाचार के खिलाफ उठती भी है तो वो भीड़ में  दब कर रह जाती है। ऐसे विपरित और विषम परिस्थितियों में अन्ना ने जिस हिम्मत और संघर्ष की राह सारे देश को दिखाई है उसने आम आदमी को भ्र्रष्टाचार से लड़ने की हिम्मत देने के साथ ही साथ एक नयी सोच को भी जन्म दिया है कि भ्रष्टाचार से मिलकर लड़ा और जीता जा सकता है।
आजादी से लेकर अगर आज तक कच्चा-चिट्ठा खंगाला जाए तो सैंकड़ों घोटालों और गड़बड़ियों की लंबी फेहरिस्त आपको मिलेगी। दिल्ली के तख्त पर चाहे किसी भी दल की सरकार रही हो सच्चाई यह है कि देश को लूटने और भ्रष्टाचार का ग्राफ ऊपर चढ़ाने में किसी ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। लगभग सभी दल और सैंकड़ों नेता भ्रष्टाचार के दलदल में धंसे हुए हैं। हाल ही में उजागर हुए आदर्श हाउसिंग, राष्ट्रमंडल खेल और 2जी स्पेक्ट्रम घोटालों ने देष की अर्थव्यवस्था को तो बुरी तरह प्रभावित किया ही है वहीं अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर भी देश की छवि को गहरा धक्का लगा है। आज देश  में हर क्षेत्र और विभाग में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों का बोलबाला और कब्जा है। भ्रष्ट व्यवस्था घुन की भांति देश के आम जनमानस के हिस्से के अनाज से लेकर विकास का पैसा और सामग्री चट कर रही है और गरीब आदमी आज भी तिल-तिल कर मरने को मजबूर है। भ्रष्टाचार के कारण गरीबों के लिए संचालित की जा रही लाखों-करोड़ों रूपयों की योजनाएं नाकाम साबित हो रही है। योजनाओं का लाभ अपात्रों या फिर काले धन के रूप में सरकारी अफसरों, मंत्रियों और बाबुओं के बैंक बैंलेस को ही बढ़ा रहा है। अनाज, स्वास्थ्य सेवाएं, रोजगार, विकास, पर्यावरण, शिक्षा और अन्य अनेक क्षेत्रों में देश के आम आदमी और गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले नागरिकों के लिए जो भी योजनाएं चलाई जाती हैं वो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं। सरकारी अमला और एजेंसियां लंबी चौड़ी कागजी कार्रवाई से सरकारी फाइलों पर ही विकास, उत्थान, उन्मूलन और झूठे आंकड़ें की बाजीगरी को ही अपनी उपलब्धि मानते हैं। जनता का दुःख-दर्दे और पीड़ा सुनने का समय किसी के पास भी नहीं है। जिन तथाकथित प्रतिनिधियों को हमने और आपने चुनकर संसद और विधानसभा में भेजा है वो अपने और अपनों के लिए सुख-सुविधाएं और आराम के तमाम दूसरे साधन जुटाने में ही व्यस्त हैं।

राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था के अनुसार देश में आम आदमी के पास राजनीतिक दलों की मदद लेना या उनका पिछलग्गू बनना एक तरह से मजबूरी ही है। क्यों कि राजनीतिक दलों के अलावा देश की जनता के पास ऐसा कोई बड़ा संगठन या मंच उपलब्ध नहीं है जिसका प्रयोग वो देश की सरकार को जगाने और अपनी दुःख-तकलीफ बताने के लिए कर सकें। सरकार को घेरने के लिए विपक्षी दल ही आम आदमी का एकमात्र सहारा बनते हैं। लेकिन अंदर ही अंदर सब राजनीतिक दल अपने वोट बैंक और दल की नीतियों को ध्यान में रखकर ही आंदोलनों का खाका खींचते हैं और अपने हितों के लिए ही आम आदमी की अपार ताकत को ‘यूज’ करते हैं। परिणामस्वरूप आम आदमी की असली आवाज कहीं दबकर रह जाता है। राजनीतिक दल अपना हित साधने के बाद जनहित से जुड़े मुद्दों और मसलों को किनारे रख देते हैं ऐसे में आम आदमी खुद को अपाहिज, असमर्थ और अनाथ अनुभव करने लगते हैं। मंच के अभाव में बरसों बरस जनता राजनीतिक दलों की फुटबाल बनी रही और हमारे तथाकथित नेता जनता को इधर से उधर उछालते रहे। राजनीतिक दलों की मिलीभगत और षडयंत्र को अन्ना के अनशन ने छिन्न-भिन्न कर दिया है। आज लगभग प्रत्येक राजनीतिक दल अन्ना और उनकी टीम से घबराया हुआ है। अन्ना ने आम आदमी को एक सशक्त और ठोस मंच प्रदान किया है। असलियत यह है कि अंदर ही अंदर देश का आम आदमी भ्रष्टाचार से ऊब चुका है और भ्रष्टाचार से स्थायी रूप से निजात चाहता है। जंतर-मंतर पर उमड़े जनसमूह और देश के कोने-कोने से मिले जनसमर्थन ने अन्ना के मनोबल को तो बढ़ाया ही वहीं सरकार को भी ये चेता दिया कि जनता को कम करके आंकना या उनके धीरज की परीक्षा लेना ठीक नहीं है। भ्रष्टाचार के विरूद्व देश भर में बने वातावरण ने हाल ही में पांच प्रदेशों में हुए विधानसभा चुनाव परिणामों पर व्याप्क प्रभाव डाला है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में सत्ताधारी दलों की जो दुर्गति जनता ने की है वो भ्रष्टाचार के विरूद्व आम आदमी की भावनाओं और क्रोध का ही प्रदर्शन तो है।

भ्रष्टाचार किसी भी देश के माथे पर कलंक तो है ही वहीं देश के आर्थिक स्त्रोतों और संसाधनों का भी भारी क्षति पहुंचाता है। भ्रष्टाचार के कारण देश में विकास कार्य बाधित होते हैं और आदमी विकास की लहर से वंचित रह जाता है। देश के आम आदमी को असल में ये मालूम ही नहीं है कि उसके कल्याण और उत्थान के लिए हर साल करोड़ों रूपये का बजट पास होता है। नेता, अफसर और ठेकेदार की तिगड़ी मिलकर भ्रष्टाचार का पालन-पोषण करती है और मिलकर मलाई काटती है। इस देश में आम आदमी इतना बेबस और असमर्थ है कि वो देश की संसद तक तो क्या इलाके के कारपोरेटर तक अपनी आवाज नहीं पहुंचा सकता है। सरकारी मकड़जाल और पेचीदा नीतियां आम आदमी को कुछ समझने का मौका ही नहीं देती हैं। जिस देश में आधे से अधिक आबादी निरक्षर और गांवों में निवास करती हो वहां चालाक, धूर्त और भ्रष्ट सरकारी अमला भोली-भाली जनता को अपने चंगुल में फंसाकर फाइलों और सरकारी कागजों में विकास की गंगा बहा देता है। विडम्बना यह है कि देश की पढ़ी लिखी जनता के पास इतनी फुर्सत ही नहीं है कि वो देश में हो रहे अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार और आम आदमी से जुड़े मुद्दों का विरोध कर सके। जनता की इसी मजबूरी और हालात का लाभ चालाक, स्वार्थी और धूर्त तथाकथित नेता उठाते हैं और जनता का शोषण करते रहते हैं।

अन्ना ने भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ने और साफ-सुथरी व्यवस्था के लिए जो पाक अभियान षुरू किया है उससे देश के आम आदमी को बड़ी उम्मीद और आस है। कहावत है कि एक अकेला चना, भाड़ नहीं फोड़ सकता है उसी तरह एक अकेले अन्ना या उनकी टीम के सदस्य भी भ्रष्टाचार तक आंकठ में डूबी व्यवस्था और तंत्र का चाल-चेहरा और चरित्र अपने दम पर बदल नहीं सकते हैं। अन्ना की असली षक्ति हम-आप और हर भारतीय है। आज आवशयकता इस बात की है कि अन्ना ने भ्रष्टाचार के घने अंधेरे को चीरने के लिए जो मशाल जलाई है उसे हम सब को मिलकर मशाल को जलाए रखना होगा। क्योंकि भ्रष्टाचार के विरूद्व लड़ाई लंबी और मुशकिलें भरी है। ऐसे में हम सब को कंधे से कंधे और कदम से कदम मिलाकर काम करना और चलना होगा तभी आसुरी और भ्रष्ट ताकतों से हम लोहा ले पाएंगे। क्योंकि ये सच्चाई है कि जब जनता एक मंच पर आकर सस्वर चिल्लाने लगती है तो शक्तिशाली सत्ता और सिंहासन हिलने लगते हैं।